दुश्मन न करे, दोस्त ने वो काम किया…
योगी के गढ़ में राज्यपाल का आईना, यूनिवर्सिटी की इमारत से हॉस्टल की थाली तक सवाल

- तीन महीने का अल्टीमेटम
- छात्र पहले से ही आंदोलनरत है ऐसे में आनंदीबेन पटेल का वक्तव्य आग में घी का करेगा काम
4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
लखनऊ। सियासत में सबसे खतरनाक सवाल वह नहीं होता जो विपक्ष पूछे। सबसे खतरनाक सवाल वह होता है जो अपने घर से उठे। क्योंकि विपक्ष का सवाल तो सत्ता की फाइल में राजनीतिक आरोप लिखकर दबा दिया जाता है। लेकिन जब राजभवन की आवाज मुख्यमंत्री के अपने गढ़ में व्यवस्था का हिसाब मांगने लगे तो फिर सूबे के राजनीतिक महौल का गर्म हो जाना स्वाभाविक हैं।
यूपी की राजनीति में यदि योगी सरकार की बात करें तो कभी संगठन में खटपट तो कभी सरकार में विरोधाभास की खबरें मीडिया की हेडलाइन बनती है। ऐसे में सूबे का मुखिया गवर्नर यदि किसी सार्वजनिक मंच से अपनी ही सरकार की कमियां गिनाने लगे वह भी मुख्यमंत्री के होम टाउन से तो फिर यह कोई आक्सिमक घटना नहीं रह जाती। घटना संकेत बन जाती है आने वाले कल की बड़ी राजनीतिक करवट की।
अपने ही घर से आई चिट्ठी इसी को कहते हैं सियासत
लेकिन यहीं से अगर राजभवन कहे पहले इसे ठीक कीजिए तो सवाल सिर्फ विश्वविद्यालय की दीवारों का नहीं रह जाता। सवाल बन जाता है दीवारों पर रंग चढ़ा है या व्यवस्था पर भी? राज्यपाल ने विश्वविद्यालय को तीन महीने में कमियां दूर करने का समय दिया है। लड़कों के हॉस्टलों में मेस व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठे और बाहर से आने वाले टिफिन के जरिए नशीले पदार्थ पहुंचने की आशंका तक जताई गई। यानी जिस शिक्षा व्यवस्था को सरकार युवा पीढ़ी के भविष्य की प्रयोगशाला बताती है वहां अब राजभवन को यह देखना पड़ रहा है कि छात्र खाना कहां से खा रहे हैं और टिफिन के साथ कुछ और तो नहीं पहुंच रहा!
ऐसे ही कुछ तब, हुआ जब…
मंच था दीक्षांत समारोह का। सामने डिग्रियां थीं मेडल थे उपलब्धियों की चमक थी और विश्वविद्यालय की शैक्षणिक तरक्की के दावे थे। लेकिन इसी चमक के बीच राज्यपाल और कुलाधिपति आनंदीबेन पटेल ने ऐसा आईना सामने रख दिया कि चमक के पीछे की धूल दिखाई देने लगी। सवाल विश्वविद्यालय की इमारतों पर उठा। सवाल निर्माण की गुणवत्ता पर उठा। सवाल हॉस्टलों की व्यवस्थाओं पर उठा। सवाल छात्रों के भोजन तक पहुंच गया। और बात यहां तक पहुंची कि राज्यपाल ने कहा कि अगर मुख्यमंत्री के शहर में ही भ्रष्टाचार या ऐसी कमियां हैं तो प्रदेश के बाकी हिस्सों में क्या हो रहा होगा? अब जरा इस एक सवाल की टाइमिंग समझते हैं। यह कोई साधारण जिला नहीं है। यह गोरखपुर है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की राजनीतिक पहचान का सबसे मजबूत भूगोल। वह शहर जहां से योगी की राजनीति ने लंबी छलांग लगाई जहां उनका प्रभाव किसी परिचय का मोहताज नहीं और जहां सरकार की उपलब्धियों का माडल पेश करना सत्ता के लिए सबसे आसान होना चाहिए।
जल्द से जल्द सुधार की चेतावनी दी
राज्यपाल ने सुधार के लिए तीन महीने का समय दिया है। यानी कहानी पूरी तरह से खत्म नहीं हुई बल्कि असल कहानी अब शुरू हुई है क्योंकि तीन महीने बाद सवाल पूछा जा सकता है कि क्या निर्माण की गुणवत्ता सुधरी? क्या हॉस्टल व्यवस्था सुधरी? क्या भोजन की गुणवत्ता की स्वतंत्र जांच हुई? क्या छात्रों की सुरक्षा को लेकर व्यवस्थाएं बेहतर हुईं? और सबसे बड़ा सवाल क्या राजभवन की आपत्तियों पर विश्वविद्यालय प्रशासन ने सिर्फ जवाब दिया या वास्तव में बदलाव किया?
सत्ता के भीतर सवाल और बाहर विपक्ष मुखर
उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव 2027 में होने हैं। राजनीतिक तैयारी और समीकरणों का दौर शुरू हो चुका है। सत्ता के भीतर संगठन को लेकर खींचतान की खबरें समय-समय पर सामने आती रही हैं। मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्रियों के बीच मतभेदों को लेकर भी राजनीतिक चर्चाएं होती रही हैं। यही कारण है कि ऐसे समय में राज्यपाल का गोरखपुर दौरा और वहां से सरकार की व्यवस्थाओं पर सवाल उठना राजनीतिक रूप से ज्यादा ध्यान खींचता है। क्योंकि चुनाव से पहले सरकार को सिर्फ विपक्ष नहीं घेरता। सरकार को अपने प्रदर्शन का रिपोर्ट कार्ड भी घेरता है। और अगर रिपोर्ट कार्ड किसी विरोधी दल के हाथ में हो तो सत्ता उसे राजनीतिक हमला कह सकती है। लेकिन अगर रिपोर्ट कार्ड राजभवन की मेज पर पहुंच जाए तो फिर बहस थोड़ी गंभीर हो जाती है।
राजभवन ने विपक्ष का काम कर दिया
विपक्ष वर्षों से सरकार पर शिक्षा व्यवस्था को लेकर सवाल उठाता रहा है। कांग्रेस हो चाहे सपा दोनों ही प्रमुख विपक्षी पार्टियों ने कभी यूपी के विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता पर सवाल उठाये तो कभी नियुक्तियों पर हमला बोला। कभी फीस पर सवाल कभी भर्ती पर सवाल कभी छात्र आंदोलनों पर सवाल। विपक्ष के इन सवालों के जवाब सरकार ने हमेशा यह कह कर दिये कि विपक्ष राजनीति कर रहा है। लेकिन अब अगर वही व्यवस्था संबंधी सवाल राजभवन से उठे तो जवाब किस खाते में जाएगा यही राजनीति का यही सबसे मजेदार मोड़ है। विपक्ष आरोप लगाए तो राजनीति। राज्यपाल सवाल पूछें तो प्रशासनिक समीक्षा लेकिन जनता दोनों को जोड़कर देखती है। यही वजह है कि समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने राज्यपाल की टिप्पणियों को आधार बनाकर सरकार पर हमला बोला है यानी जिस मुद्दे को विश्वविद्यालय प्रशासन शायद स्थानीय समस्या मानकर निपटाना चाहता था उसने कुछ ही घंटों में राजनीतिक रंग ले लिया। गौरतलब है कि चुनावी मौसम में रंग भले ही जल्दी उतर जाएं लेकिन आरोपों नहीं उतरते बल्कि उन्हें राजनीतिक चूल्हे पर लगतार उस वक्त तक गर्म किया जाता है जबतक चुनाव न हो जाए। यूपी की राजनीतिक की समझ रखने वाले इस पूरे प्रकरण पर यही कह रहे हैं कि चुनाव में यह आरोप जरूर असर दिखाएंगे क्योंकि इन आरोपों को किसी साधारण व्यक्ति ने नहीं लगाया है।




