राजनीति को अपराधमुक्त करने का रास्ता: नेताओं के मामलों के लिए स्पेशल कोर्ट जरूरी

सांसदों और विधायकों के खिलाफ लंबित आपराधिक मामलों को जल्द निपटाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में पेश किए अपने रिपोर्ट्स में वरिष्ठ अधिवक्ता और एमिकस क्यूरी विजय हंसारिया ने कई अहम सुझाव दिए हैं.

4पीएम न्यूज नेटवर्क: सांसदों और विधायकों के खिलाफ लंबित आपराधिक मामलों को जल्द निपटाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में पेश किए अपने रिपोर्ट्स में वरिष्ठ अधिवक्ता और एमिकस क्यूरी विजय हंसारिया ने कई अहम सुझाव दिए हैं.

भारतीय राजनीति में आपराधिक मामलों का सामना कर रहे नेताओं को लेकर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं। इस मुद्दे पर अलग-अलग समय में बहस और चर्चाएं भी होती रही हैं. इसके बावजूद संसद में ऐसे जनप्रतिनिधियों की मौजूदगी बनी हुई है, जिनके खिलाफ कई आपराधिक मामले दर्ज हैं.

अब सुप्रीम कोर्ट में सांसदों और विधायकों के खिलाफ लंबित आपराधिक मामलों को जल्द निपटाने के लिए कई अहम सुझाव सामने आए हैं. कोर्ट में पेश की गई ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, मौजूदा और पूर्व सांसदों-विधायकों के खिलाफ 4,192 आपराधिक मामले ट्रायल के स्तर पर लंबित हैं. इनमें 519 मामले 10 साल से ज्यादा पुराने हैं.

मामलों की निगरानी के लिए सुप्रीम कोर्ट के स्तर पर लगातार कोशिशों के बावजूद लंबित मामलों की संख्या 2018 के बाद से लगभग उसी स्तर पर बनी हुई है. ऐसे में सवाल है कि राजनीति के अपराधीकरण को रोकने और जनप्रतिनिधियों के खिलाफ मामलों का तेजी से फैसला कराने के लिए क्या नया सिस्टम बनाया जा सकता है?
क्या है पूरा मामला?

सांसदों और विधायकों के खिलाफ आपराधिक मामलों की सुनवाई में तेजी लाने की मांग को लेकर 2016 में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की गई थी.मामलों की निगरानी के लिए सुप्रीम कोर्ट के स्तर पर लगातार कोशिशों के बावजूद लंबित मामलों की संख्या 2018 के बाद से लगभग उसी स्तर पर बनी हुई है.

वरिष्ठ अधिवक्ता और एमिकस क्यूरी विजय हंसारिया ने सुप्रीम कोर्ट के सामने ताजा स्टेटस रिपोर्ट पेश की है. रिपोर्ट में अलग-अलग हाईकोर्ट से मिले आंकड़ों और उनकी वेबसाइटों पर उपलब्ध जानकारी के आधार पर सांसदों-विधायकों के खिलाफ लंबित मामलों की स्थिति बताई गई है.

एमिकस क्यूरी कौन होता है?

कानून के छात्रों के लिए एमिकस क्यूरी एक अहम शब्दावली है. यह एक लैटिन शब्द है, जिसका शाब्दिक अर्थ है , ‘न्यायालय का मित्र’. एमिकस क्यूरी, कोई पक्षकार नहीं होता, बल्कि एक स्वतंत्र और निष्पक्ष व्यक्ति या संस्था होती है, जिसे न्यायालय किसी मामले में सहायता के लिए नियुक्त करता है.

रिपोर्ट के मुताबिक, 2025 में सांसदों और विधायकों के खिलाफ 1,243 मामलों का निपटारा हुआ, लेकिन इसी दौरान 1,050 नए मामले दर्ज भी हुए. यानी नए मामलों के जुड़ने की रफ्तार भी लंबित मामलों को कम करने में बड़ी चुनौती बनी हुई है.

4,192 मामलों में कितने पुराने केस?

519 मामले 10 साल से ज्यादा पुराने

754 मामले 5 से 10 साल पुराने

563 मामले 3 से 5 साल पुराने

करीब 1,095 मामले 3 साल से कम पुराने
क्यों जल्दी फैसला नहीं हो पा रहा?

एमिकस की रिपोर्ट में देरी के कई कारण बताए गए हैं. इनमें सांसदों-विधायकों के मामलों की सुनवाई करने वाली अदालतों पर सामान्य मुकदमों का भी बोझ होना सबसे बड़ी वजह है.इसके अलावा आरोपी का अदालत में पेश न होना, गवाहों को समन पहुंचाने में देरी, गवाहों का अदालत में पेश नहीं होना, बार-बार तारीख मिलना, जांच में देरी और फॉरेंसिक रिपोर्ट आने में लगने वाला समय भी ट्रायल को लंबा खींचता है.

कुछ मामलों में जारी किए गए वारंट भी समय पर तामील नहीं हो पाते हैं,यह भी मुकदमे में देरी की वजह बनता है. इसका साफ अर्थ यह है कि सिर्फ विशेष अदालत बना देने से समस्या खत्म नहीं हो रही है- अदालतों के पास इन मामलों को प्राथमिकता से सुनने के लिए पर्याप्त समय और संसाधन होना भी जरूरी है.

अब क्या है एमिकस क्यूरी ने सुझाव दिया है कि1 साल में फैसला करने का फॉर्मूला?

सांसदों और विधायकों के लिए बनाई गई डेज़िग्नेटेड स्पेशल कोर्ट इन मामलों को प्राथमिकता से सुने. सामान्य मामलों के अतिरिक्त बोझ के साथ इन मामलों को न चलाएं.

चार्ज फ्रेम होने के बाद मुकदमे को सामान्य तौर पर एक साल के भीतर पूरा किया जाए. वहीं, तीन साल से ज्यादा पुराने मामलों की सुनवाई दिन-प्रतिदिन के आधार पर कराने का सुझाव दिया गया है.

जनप्रतिनिधियों के खिलाफ मुकदमा वर्षों तक चलता न रहे. जनता को लंबे समय तक यह पता न चले कि आरोपों का कानूनी नतीजा क्या निकला.

दो बार सुनवाई पर नहीं आने पर किस तरह के एक्शन का सुझाव?

रिपोर्ट में आरोपी की गैरहाजिरी को लेकर भी सख्त व्यवस्था का सुझाव दिया गया है.अगर कोई आरोपी लगातार दो सुनवाइयों में अदालत में पेश नहीं होता, तो उसके खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी करने का प्रस्ताव है. इसके साथ ही गवाहों की उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए नामित अभियोजन अधिकारियों को जिम्मेदारी देने की बात कही गई है.

हाईकोर्ट के लिए क्या सुझाव दिया गया है?

हाईकोर्ट की वेबसाइट पर इन मामलों की जानकारी रियल टाइम आधार पर उपलब्ध कराई जाए. आदेश पारित होने के एक सप्ताह के भीतर ऑर्डर शीट अपलोड किया जाए.

एक ऐसा मॉडल पोर्टल बनाने की भी बात कही गई है, जिसमें जिलेवार जानकारी उपलब्ध हो. मामलों को उनकी उम्र के हिसाब से अलग-अलग श्रेणियों में दिखाया जाए.

सांसद-विधायकों के जल्द के निपटने से क्या फायदा?

सवाल सिर्फ मुकदमे जल्दी खत्म करने का नहीं है. इसका सीधा संबंध राजनीति में आपराधिक छवि वाले लोगों की मौजूदगी और जवाबदेही से है. दूसरा, किसी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक मामला लंबित होना और उसका अपराध साबित होना दो अलग बातें हैं. ऐसे में किसी भी जनप्रतिनिधि को लंबे समय तक ट्रायल में फंसाए रखना सही नहीं है. तेज ट्रायल का सुझाव उन्हें बेमतलब के तनावों से भी बचा सकता है.

क्या सिर्फ 1 साल की समय-सीमा से समस्या खत्म हो जाएगी?

अगर अदालतों में जजों की कमी, गवाहों की अनुपस्थिति, जांच में देरी और फॉरेंसिक रिपोर्ट में लंबा समय जैसी समस्याएं बनी रहती हैं, तो केवल समय-सीमा तय करने से कुछ नहीं होगा. समस्या जस की तस बनी रहेगी.विशेष अदालतों को पर्याप्त संसाधन देना, हाईकोर्ट की नियमित निगरानी, गवाहों की समय पर उपस्थिति और मामलों की डिजिटल मॉनिटरिंग ही केसेज के जल्दी निपटान में मदद करेंगे.

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