20 रुपए वाला प्याज आपको 70 रुपए में क्यों मिल रहा है? वजह जानकर चौंक जाएंगे
प्याज का रेट 70 रुपये KG तक पहुंच गया है. किसानों को सिर्फ ₹ 20 मिल रहे हैं. ऐसी क्या वजहें हैं, जिस प्याज पर किसानों को इतना कम रेट मिल रहा है, उसी पर ग्राहकों को 70 रुपये देने पड़ रहे हैं.

4पीएम न्यूज नेटवर्क: प्याज का रेट 70 रुपये KG तक पहुंच गया है. किसानों को सिर्फ ₹ 20 मिल रहे हैं. ऐसी क्या वजहें हैं, जिस प्याज पर किसानों को इतना कम रेट मिल रहा है, उसी पर ग्राहकों को 70 रुपये देने पड़ रहे हैं.
अभी मई महीने में किसानों को प्याज की खरीद पर एक रुपये मिलने की खबरों ने खूब सुर्खियां बटोरी थीं. हालांकि, आम ग्राहकों को तो तब भी बाजार में 35 रुपये किलो तक प्याज मिल रहा था. लेकिन अब ग्राहकों को यही प्याज 70 रुपये प्रति किलो की कीमत पर मिल रहा है. लेकिन किसानों को मंडियों में इस पर सिर्फ 20 रुपये के आसपास ही खरीद मिल रही है.
प्याज की कीमत बढ़ने के साथ ही आम आदमी के किचन का बजट बिगड़ने लगता है. आम आदमी से जुड़े मुद्दे के चलतेप्याज की कीमतों को लेकर होने वाला हर बड़ा उछाल राजनीतिक मुद्दा बन जाता है. सवाल यह है कि अगर किसान की खेत से प्याज मात्र 21 रुपये में बिक रहा है तो ग्राहक तक पहुंचते-पहुंचते उसकी कीमत तीन गुना से ज्यादा कैसे हो जाती है.
किसान की कीमत और ग्राहक की कीमत एक जैसी क्यों नहीं होती?
किसान आमतौर पर अपना प्याज खेत से निकालकर स्थानीय मंडी या व्यापारी को बेचता है.
यहां उसे जो कीमत मिलती है, वह अक्सर खेत या मंडी स्तर की कीमत होती है.
इसके बाद प्याज कई चरणों से गुजरता है.स्थानीय व्यापारी इसे खरीदता है, फिर इसकी छंटाई होती है.
गुणवत्ता के हिसाब से प्याज को अलग किया जाता है. फिर बड़े थोक बाजारों तक पहुंचाया जाता है.
इसके बाद प्याज को शहरों के थोक बाजारों, सब्जी मंडियों और फिर खुदरा दुकानदारों तक पहुंचाया जाता है.
हर चरण पर परिवहन, भंडारण, छंटाई, पैकिंग और व्यापारियों का मार्जिन जुड़ता जाता है.
डीजल की कीमत, ट्रक का किराया, टोल टैक्स और परिवहन में लगने वाला समय भी कीमत को प्रभावित करते हैं.
प्याज बड़ी मात्रा में बिकने वाला उत्पाद है. कुछ रुपये प्रति किलो का ढुलाई खर्च भी लाखों KG की सप्लाई में बड़ी रकम बन जाता है.
अचानक से प्याज का रेट 70 रुपये प्रति किलो पहुंचने के पीछे की वजहें क्या है?
किसान से 20 रुपये में खरीदा गया प्याज सीधे 70 रुपये में ग्राहक को नहीं बेचा जाता.लेकिन इसके बावजूद किसान और ग्राहक की कीमत में करीब 49 रुपये का अंतर इतना बड़ा है कि यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि सप्लाई चेन में किस स्तर पर सबसे ज्यादा कीमत बढ़ रही है.
दरअसल, खेत से निकला पूरा प्याज एक जैसी गुणवत्ता का नहीं होता.मंडी और थोक बाजार में प्याज की छंटाई की जाती है.छोटे आकार के, खराब गुणवत्ता वाले या सड़े हुए प्याज अलग किए जाते हैं.व्यापारी को बची हुई बिकने योग्य मात्रा से अपनी खरीद लागत और दूसरे खर्च निकालने होते हैं.यहीं से प्रति किलो लागत बढ़ने लगती है.प्याज को अलग-अलग गुणवत्ता के हिसाब से बेचने पर कीमत भी अलग होती है.अच्छी गुणवत्ता, बड़े आकार और बेहतर दिखने वाले प्याज का भाव अधिक होता है.
प्याज को अनाज की तरह लंबे समय तक बिना किसी नुकसान के नहीं रखा जा सकता.हालांकि इसे कुछ समय तक स्टोर किया जा सकता है. लेकिन नमी, गर्मी और खराब भंडारण व्यवस्था से प्याज सड़ने लगता है.अगर थोक व्यापारी ने बड़ी मात्रा में प्याज खरीदा और उसका कुछ हिस्सा खराब हो गया, तो बाकी प्याज की कीमत बढ़ाकर उसे नुकसान की भरपाई करनी पड़ सकती है.इसे व्यापारिक भाषा में वेस्टेज या खराबी का जोखिम कहा जा सकता है.
किसान और ग्राहक के बीच अक्सर एक ही व्यापारी नहीं होता.प्याज की सप्लाई चेन में कई स्तर हो सकते हैं. स्थानीय खरीदार, कमीशन एजेंट, मंडी व्यापारी, बड़े थोक कारोबारी, शहर का थोक विक्रेता और फिर खुदरा दुकानदार.हर व्यक्ति अपने खर्च और मुनाफे के हिसाब से कीमत में कुछ न कुछ जोड़ता है.यही वजह है कि किसान को मिलने वाला भाव और ग्राहक की कीमत में बड़ा अंतर पैदा होता है.समस्या तब और बढ़ जाती है जब किसी क्षेत्र में उत्पादन कम हो, दूसरी जगह से सप्लाई आने में देरी हो या बाजार में कुछ बड़े कारोबारियों के पास बड़ी मात्रा में स्टॉक हो.
70 रुपये किलो प्याज बेचने वाला दुकानदार जरूरी नहीं कि 21 रुपये किलो में प्याज खरीद रहा हो.वह शहर की थोक मंडी से काफी अधिक कीमत पर प्याज खरीद सकता है।उसके बाद दुकान तक ढुलाई, दुकान का किराया, मजदूर का खर्च, बिजली, खराब होने वाले प्याज का नुकसान और अपना मुनाफा भी जुड़ता है.रिटेलर छोटी मात्रा में सामान बेचता है, इसलिए प्रति किलो उसका खर्च थोक व्यापारी की तुलना में ज्यादा हो सकता है.
जब प्याज कम कीमत बिकता है तो कई व्यापारी और आढ़ती कोल्ड स्टोरेज में ही अपनी फसल को स्टॉक कर लेते हैं. उसे बाजार में बेचते ही नहीं है. ऐसे में जब बाजार में प्याज की कमी होने लगती है, जिसके चलते प्याज के रेट में इजाफा होने लगता है. फिर कहीं जाकर ये व्यापारी ज्यादा लाभ कमाने की लालच में प्याज को बाजार में उतारते हैं.
किसान अक्सर क्यों अपनी फसल सस्ते में बेच देता है?
किसान को अक्सर फसल तैयार होते ही बेचनी पड़ती है क्योंकि उसके पास लंबे समय तक भंडारण की पर्याप्त व्यवस्था नहीं होती.उसे अगली फसल के लिए जमीन तैयार करनी होती है और खेती के खर्च निकालने के लिए तुरंत नकदी की जरूरत होती है. किसान उत्पादन का सबसे बड़ा जोखिम उठाता है, लेकिन बाजार में कीमत बढ़ने का फायदा उसे नहीं मिल पाता है.



