आपका डेटा कौन और कैसे इस्तेमाल कर रहा है? AI ने बढ़ाई निजता की चिंता

एआई के दौर में डिजिटल निजता सिर्फ ‘Accept’ बटन तक सीमित नहीं रह सकती। जानिए सहमति की सीमाएं, डेटा सुरक्षा, एल्गोरिद्मिक जवाबदेही और नागरिक के संवैधानिक अधिकारों की नई चुनौतियां।

4पीएम न्यूज नेटवर्क: डिजिटल दुनिया में किसी ऐप या वेबसाइट पर ‘Accept’ दबाना आज रोजमर्रा की आदत बन चुका है। लेकिन क्या यह क्लिक वास्तव में नागरिक की समझी-बूझी सहमति है? एआई और बड़े पैमाने पर डेटा प्रोसेसिंग के दौर में यही सवाल भारत के संवैधानिक और कानूनी विमर्श के केंद्र में आ गया है। रिसर्च स्कॉलर (लॉ) रितु राज मिश्रा के विश्लेषण के मुताबिक, अब निजता की सुरक्षा को केवल सहमति तक सीमित रखना पर्याप्त नहीं माना जा सकता।

पुट्टस्वामी फैसले ने बदली निजता की तस्वीर

सुप्रीम कोर्ट के केएस पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ फैसले ने निजता को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार के रूप में स्थापित किया। इसके बाद भारत में डेटा संरक्षण को लेकर कानूनी चर्चा को नई दिशा मिली। डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण कानून भी सहमति और अनुपालन के जरिए डेटा सुरक्षा का ढांचा मजबूत करने की कोशिश करता है।

हालांकि, वास्तविक दुनिया में लंबे नियम-कायदे, जटिल प्राइवेसी पॉलिसी और डिजिटल सेवाओं पर बढ़ती निर्भरता के बीच लोग अक्सर बिना पूरी जानकारी पढ़े ही सहमति दे देते हैं। यही स्थिति ‘कंसेंट फैटिग’ यानी सहमति की थकावट की ओर इशारा करती है।

एआई ने सहमति की सीमाएं और बढ़ाईं

जनरेटिव एआई और मशीन लर्निंग सिस्टम विशाल डेटा सेट से ऐसे पैटर्न निकाल सकते हैं, जिनकी कल्पना डेटा जुटाते समय संभव नहीं होती। ऐसे में किसी व्यक्ति से भविष्य में उसके डेटा के हर संभावित इस्तेमाल और जोखिम को पहले से समझकर सहमति देने की अपेक्षा व्यावहारिक रूप से कठिन हो जाती है।

यहीं से सवाल उठता है कि क्या डिजिटल निजता की पूरी जिम्मेदारी नागरिक पर डालना उचित है।

अब संस्थागत जवाबदेही पर जोर जरूरी

लेख के अनुसार, डेटा सुरक्षा के लिए संस्थागत और संरचनात्मक जवाबदेही को मजबूत करना जरूरी है। वित्तीय साख, भर्ती और सरकारी योजनाओं में इस्तेमाल होने वाले स्वचालित निर्णय सिस्टम के लिए पारदर्शिता, स्वतंत्र ऑडिट और Algorithmic Impact Assessment जैसे उपाय महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

इसके साथ डिजिटल नुकसान की परिभाषा को केवल डेटा चोरी या आर्थिक नुकसान तक सीमित न रखते हुए डार्क पैटर्न, व्यवहारगत हेरफेर और सूचना से वंचित करने जैसी परिस्थितियों तक विस्तारित करने पर भी विचार जरूरी है।

राष्ट्रीय सुरक्षा या लोक व्यवस्था के नाम पर मिलने वाली राज्य की छूट भी वैधानिकता, आवश्यकता और आनुपातिकता जैसे संवैधानिक सिद्धांतों की न्यायिक समीक्षा से परे नहीं होनी चाहिए। एआई युग में असली चुनौती केवल डेटा बचाने की नहीं, बल्कि नागरिक की स्वायत्तता, गरिमा और संवैधानिक स्वतंत्रता को सुरक्षित रखने की है।

रिपोर्ट – अमरेंद्र पांडेय, गोरखपुर

यह भी पढ़ें: गोरखपुर के ब्लाइंड स्कूल में छात्र की मौत, CCTV फुटेज ने खड़े किए कई सवाल

Related Articles

Back to top button