पर्दा बहुत बड़ा है, लेकिन कहानी कहीं पीछे छूट गई

टॉक्सिक की समीक्षा

  • चार साल इंतजार करवाकर यश ने दिया टॉर्चर
  • यश, नयनतारा, रुक्मिणी वसंत, अक्षय ओबेरॉय, नयनतारा, कियारा आडवाणी, हुमा कुरैशी और तारा सुतारिया

मुंबई। किसी फिल्म से उम्मीद होना अच्छी बात है। लेकिन उम्मीद जब आसमान छूने लगे तो फिल्म के लिए वही उम्मीद सबसे बड़ा खतरा भी बन जाती है। यश की ‘टॉक्सिक-ए फेयरी टेल फॉर ग्रोन-अप्स’ के साथ कुछ ऐसा ही हुआ है।
्यत्रस्न के बाद यश की वापसी कोई सामान्य वापसी नहीं थी। चार साल से दर्शक इंतजार कर रहे थे। यश अब सिर्फ कन्नड़ सिनेमा के स्टार नहीं रहे। केजीएफ ने उन्हें देश के उन चुनिंदा अभिनेताओं में खड़ा कर दिया जिनके नाम पर सुबह छह बजे भी सिनेमाघर भर सकते हैं। इसलिए जब टॉक्सिक आई तो दर्शक सिर्फ नई फिल्म देखने नहीं गए। वे यह देखने गए कि राकी व यश अब क्या नया लेकर आए हैं। चार साल का इंतजार। के बाद यश की वापसी.. नाम ‘टॉक्सिक’। ट्रेलर में बंदूकें, ग्लैमर, सर्कस, खून-खराबा और रॉकिंग स्टार यश। लगा था इस बार थिएटर में कुछ बड़ा होने वाला है।फिर फिल्म देखी…अब लगता है कि चार साल इंतजार करवाना भी शायद फिल्म का हिस्सा था। तीन घंटे से ज्यादा की इस फिल्म से बाहर निकलते हुए पहला सवाल यही आता है- आखिर कहना क्या चाहते थे? फिल्म खूबसूरत दिखती है, बड़े सेट हैं…विजुअल्स हैं, ङ्कस्नङ्ग है, एक्शन है। बस एक छोटी-सी चीज गायब है- वह चीज जिसके लिए ज्यादातर लोग फिल्म देखने जाते हैं – कहानी।

 

  • लेखक-             गीतू मोहनदास, राघव विनय शिवगंगे और यश
    निर्देशक-          गीतू मोहनदास
  • निर्माता-           वेंकट के. नारायण और यश
    रिलीज डेट-      26 अगस्त 2026
    रेटिंग-              2/5

यहीं से टॉक्सिक की असली परीक्षा शुरू होती है

फिल्म देखकर पहली बात जो महसूस होती है, वह यह कि पैसा पर्दे पर दिखाई देता है। फिल्म बहुत बड़ी दिखती है। कैमरा शानदार है। सेट भव्य हैं। हर फ्रेम को स्टाइलिश बनाने की कोशिश की गई है। यश जब पर्दे पर आते हैं तो नजर उन पर टिकती है। उनका चलना, रुकना, सिगरेट पकडऩा, किसी को देखना, लडऩा-हर चीज को ‘मोमेंट’ बनाने की कोशिश हुई है। लेकिन लगभग तीन घंटे बाद जब आप सिनेमाघर से बाहर निकलते हैं तो एक सवाल पीछा करता है-कहानी कहाँ थी? यही टॉक्सिक की सबसे बड़ी कमजोरी है। यश हैं, स्टाइल है, पैसा है, लेकिन दिल कहाँ है?।

एक बड़ी फिल्म केवल बड़ी दिखाई देने से बड़ी नहीं बनती.

केजीएफ क्यों चली थी? क्या सिर्फइसलिए कि उसमें यश थे? नहीं। उसमें एक बेटा था। उसकी मां थी, गरीबी थी, एक वादा था। फिर उस लड़के की असंभव-सी यात्रा थी, दर्शक राकी की बंदूक से पहले उसकी भूख को समझ चुका था। टॉक्सिक में आपको बार-बार प्रभावित करने की कोशिश होती है, लेकिन बहुत कम बार आप किसी किरदार के लिए कुछ महसूस करते हैं।

कहानी गोवा, गैंगस्टर और रिश्तों का उलझा खेल
कहानी 194० से 197० के दशक के गोवा में सेट है। अपराध, स्मगलिंग और सत्ता की दुनिया के बीच राया (यश) अपना साम्राज्य खड़ा करता है। कहानी उसके माता- पिता और बहन गंगा (नयनतारा) के साथ उसके रिश्ते को भी दिखाती है। राया की जिंदगी में नादिया (कियारा आडवाणी) आती है। वहीं एलिजाबेथ (हुमा कुरैशी), टोनी (अक्षय ओबेरॉय), रेबेका (तारा सुतारिया) और मेलिसा (रुक्मिणी वसंत) जैसे किरदार उसकी दुनिया का हिस्सा बनते हैं। कागज पर पिता-पुत्र, भाई-बहन, प्यार, धोखा, अपराध और सत्ता- मसाला पूरा है। लेकिन पर्दे पर आते-आते गोलियां, ग्लैमर, आपत्तिजनक दृश्य और एक्शन इतना बढ़ जाता है कि कहानी को अपनी जगह ही नहीं मिलती।

एक्टिंग : यश हैं, किरदार पीछे छूट गया

यश राया और उसके बेटे रूमी, दोनों का डबल रोल निभाते हैं। उनका स्वैग है, चाल है, लुक है, एक्शन है। फैंस को सीटी बजाने के लिए पूरा सामान दिया गया है। लेकिन उनके किरदार बिल्कुल समझ नहीं आते…यश कभी गुस्से में हैं, कभी आशिक हैं, कभी भाई हैं, कभी बाप हैं और फिर अगले ही सीन में किसी की धुनाई कर रहे हैं। इमोशंस आने ही वाली होती है कि कैमरा घूमता है और साहब फिर से स्टाइल में खड़े हैं। नयनतारा जैसी अभिनेत्री से उम्मीद थी कि वह कहानी को भावनात्मक वजन देंगी, लेकिन उनका किरदार देखकर लगता है कि इतनी बड़ी अभिनेत्री को भी फिल्म ने कह दिया…. आप बस भाई को संभालिए, भारी-भरकम डायलॉग बोलिए… बाकी हम देखते हैं। कियारा आडवाणी की बात करें तो कैमरे ने उन्हें बहुत प्यार दिया है। इतना प्यार कि कई बार लगता है कि नादिया किरदार नहीं, फिल्म की ग्लैमर एम्बेसडर हैं। सर्कस, ग्लैमरस कपड़े, मर्मेड एक्ट, एरियल एक्ट, खूबसूरत शॉट्स- सबकुछ है। बस किरदार को हल्का और विस्तार से लिख दिया जाता तो शायद ऑडियंस और भी खुश होतीं। हुमा कुरैशी, तारा सुतारिया, अक्षय ओबेरॉय, संजीदा शेख और रुक्मिणी वसंत जैसे कलाकारों को देखकर लगता है कि कास्टिंग डायरेक्टर ने बहुत मेहनत की थी। फिर स्क्रीनप्ले ने आकर सबकी मेहनत से कहा- थैंक यू, अब आप पीछे बैठिए।

निर्देशन : आंखों को दावत दिमाग को सजा

गीतू मोहनदास ने फिल्म को छोटा सोचकर नहीं बनाया। सर्कस, गोवा, बड़े सेट, एक्शन और विजुअल्स.. हर चीज को बड़े स्तर पर दिखाने की कोशिश की गई है। लेकिन निर्देशन की सबसे बड़ी जिम्मेदारी सिर्फ फिल्म को भव्य दिखाना नहीं…कहानी को दर्शक तक पहुंचाना भी होती है। और यहीं फिल्म सबसे ज्यादा कमजोर पड़ती है। फिल्म में इतने स्टाइलिश शॉट हैं कि कई बार लगता है आप फिल्म नहीं, किसी महंगे फैशन शूट का एक्सटेंडेड वर्जन देख रहे हैं।

राइटिंग और स्क्रीनप्ले फिल्म के असली दुश्मन

फिल्म की असली दुश्मन कोई विलेन नहीं, इसकी राइटिंग है। पिता-पुत्र का रिश्ता है…भाई-बहन का इमोशनल एंगल है। प्यार है..धोखा है..अपराध है..सत्ता है। इतना सामान है कि एक अच्छी फिल्म आराम से बन सकती थी।एक सीन खत्म होता है तो अगला सीन शुरू। अगला खत्म होता है तो तीसरा। किरदार क्या कर रहा है, क्यों कर रहा है, उसके पीछे भावना क्या है- इन सबके बारे में सोचने का मौका फिल्म देती ही नहीं। तीन घंटे से ज्यादा की फिल्म में समय बहुत है…लेकिन स्क्रीनप्ले के पास उसे इस्तेमाल करने का तरीका नहीं है। हिंसा: मानो जैसे हीरो को गोली मारने से पहले अनुमति लेनी पड़ रही..रणबीर कपूर की एनिमल में हिंसा पर खूब बहस हुई, लेकिन वहां वह किरदार की मानसिकता से जुड़ी थी। इस फिल्म में कई जगह हिंसा बस तमाशा लगती है। यश को मारने सात-आठ लोग आते हैं और सबकी निशानेबाजी ऐसी कि लगता है हीरो को गोली मारने से पहले अनुमति लेनी पड़ रही है। भाई, कभी तो गोली सही जगह चला दो।

धैर्य की परीक्षा

रवि बसरूर केा म्यूजिक इतना तेज है कि कई जगह लगता है फिल्म आपसे बात नहीं कर रही, आप पर चिल्ला रही है। अब फिल्म की तारीफ कर देते हैं, क्योंकि आखिर कुछ तो है। राजीव रवि की सिनेमैटोग्राफी शानदार है। फिल्म देखने में महंगी लगती है और कई फ्रेम सच में कमाल के हैं। सर्कस का सेटअप, गोवा की दुनिया, एक्शन और यश के क्लोजअप अच्छे लगते हैं।

पब्लिक बोली- तीन घंटे की फिल्म सजा या मजा

सुबह 3 बजे सिनेमाघर पहुंचे दर्शक, डीजे के साथ ‘टॉक्सिक’ की रिलीज का मनाया जश्न; क्या फिल्म देखकर हुए निराश? लेकिन चार साल से यह सोचकर बैठे थे कि यश इस बार कोई दमदार, याद रहने वाली फिल्म लेकर आएंगे, तो निराशा होगी…बहुत निराशा। तकनीकी तौर पर फिल्म मजबूत है, लेकिन बिखरी राइटिंग, कमजोर डायलॉग, खराब एडिटिंग और उलझा स्क्रीनप्ले सब पर भारी पड़ जाता है। यश की स्क्रीन प्रेजेंस और कुछ अच्छे सीन ही गिनी-चुनी अच्छी बातें हैं। यश ने मेहनत पूरी की है, लेकिन फिल्म उनकी मेहनत के साथ न्याय नहीं कर पाती। तीन घंटे से ज्यादा तक बैठकर इसे झेलने के बाद कहानी याद रहे न रहे, टॉर्चर जरूर याद रहता है।

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