गुजरात में BJP को बड़ा झटका, कोऑपरेटिव चुनाव में मिली बड़ी हार
गुजरात के कोऑपरेटिव चुनावों में BJP समर्थित पैनल की हार ने राज्य की ग्रामीण राजनीति को लेकर चर्चा तेज कर दी है... दो बड़े कोऑपरेटिव...

4पीएम न्यूज नेटवर्कः गुजरात के कोऑपरेटिव सेक्टर में पिछले दो महीनों के दौरान दो चौंकाने वाले राजनीतिक नतीजे सामने आए हैं.. अगस्त के मध्य में बारडोली की श्री खेडूत सहकारी खांड उद्योग मंडली के चुनाव में BJP समर्थित पैनल को करारी हार का सामना करना पड़ा.. कांग्रेस समर्थित किसान परिवर्तन पैनल ने चुनाव में सभी 14 सीटों पर जीत दर्ज की.. इस जीत के साथ ही दक्षिण गुजरात की इस प्रमुख शुगर कोऑपरेटिव संस्था में लंबे समय से चले आ रहे BJP समर्थित पैनल के दबदबे को भी बड़ा झटका लगा.. इसके बाद इसी महीने अहमदाबाद जिले की धोलका APMC के चुनाव में भी कांग्रेस के करीबी माने जाने वाले किसान विकास पैनल ने सभी 10 सीटें जीतकर BJP समर्थित पैनल को हरा दिया..
बारडोली की श्री खेडूत सहकारी खांड उद्योग मंडली गुजरात की पहली शुगर कोऑपरेटिव फैक्ट्री मानी जाती है.. जिसकी शुरुआत 1955 में हुई थी.. संस्था के मुताबिक यह एशिया की सबसे बड़ी शुगर फैक्ट्रियों में से एक है.. यहां करीब 5,684 किसान सदस्य हैं और प्रतिदिन लगभग 10,000 टन गन्ने की पेराई करने की क्षमता है.. इस सहकारी संस्था के पास 21 मेगावाट का अपना पावर प्लांट भी है.. बताया जाता है कि इस पावर प्लांट से हर साल करीब 20 करोड़ रुपये की आय होने का अनुमान है.. यानी संस्था की आमदनी केवल चीनी के कारोबार तक सीमित नहीं है.. ऐसे में इस संस्था के चुनाव का महत्व केवल एक सामान्य कोऑपरेटिव चुनाव तक सीमित नहीं माना जा रहा है.. बल्कि इसका असर स्थानीय राजनीतिक समीकरणों पर भी देखा जा रहा है..
किसान परिवर्तन पैनल की जीत के बाद बारडोली में समर्थकों ने ट्रैक्टर चलाकर जश्न मनाया.. खास बात यह है कि ट्रैक्टर ही इस पैनल का चुनाव चिन्ह था.. इस जीत को कांग्रेस समर्थक खेमे ने किसानों के बीच अपनी पकड़ मजबूत होने के संकेत के तौर पर पेश किया.. हालांकि, कोऑपरेटिव चुनावों के नतीजों को सीधे विधानसभा या लोकसभा चुनावों के परिणाम से जोड़ना सही नहीं होगा.. इन चुनावों में स्थानीय मुद्दे, उम्मीदवारों के व्यक्तिगत संबंध, परिवार, बिरादरी.. और क्षेत्रीय समीकरण महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं.. इसके बावजूद जब किसी लंबे समय से प्रभावशाली पैनल को सभी सीटों पर हार का सामना करना पड़े.. तो वह राजनीतिक रूप से चर्चा का विषय जरूर बन जाता है.. बारडोली के नतीजे भी इसी वजह से गुजरात की राजनीति में खास ध्यान खींच रहे हैं..
बारडोली के बाद अहमदाबाद जिले की धोलका APMC के चुनाव ने भी राजनीतिक चर्चाओं को और तेज कर दिया.. यहां कांग्रेस के करीबी माने जाने वाले किसान विकास पैनल ने सभी 10 सीटों पर जीत हासिल की.. इस पैनल ने BJP समर्थित उस पैनल को हराया.. जिसका धोलका APMC पर तीन दशक से भी ज्यादा समय से कब्जा बताया जाता है.. इस चुनाव में हारने वालों में जिला BJP के महासचिव देवेश पटेल भी शामिल थे.. लगातार लंबे समय से किसी संस्था पर प्रभाव रखने वाले पैनल की इस तरह की हार ने स्थानीय स्तर पर BJP के संगठन और उसके चुनावी प्रबंधन को लेकर सवाल खड़े किए हैं.. हालांकि, इन सवालों को व्यापक राजनीतिक निष्कर्ष में बदलने से पहले यह समझना जरूरी है कि.. APMC चुनावों का अपना अलग सामाजिक और स्थानीय चुनावी ढांचा होता है..
गुजरात कांग्रेस के प्रवक्ता मनीष दोशी ने इन नतीजों को राज्य के ग्रामीण इलाकों में बदलते राजनीतिक माहौल से जोड़ते हुए दावा किया कि किसानों के बीच धीरे-धीरे नाराजगी बढ़ रही है.. धोलका चुनाव में पार्टी के टिकट को लेकर हुई अंदरूनी राजनीति भी चर्चा का विषय रही.. मनीष दोशी के मुताबिक BJP के टिकट पर चुनाव लड़ने वाले कई उम्मीदवारों ने पार्टी के खिलाफ बगावत कर दी.. उन्होंने पार्टी का टिकट लौटा दिया और किसान विकास पैनल को समर्थन देने का ऐलान किया.. अगर यह दावा स्थानीय स्तर पर सही साबित होता है.. तो यह केवल चुनावी हार का मामला नहीं.. बल्कि संगठन के भीतर असंतोष की ओर भी इशारा कर सकता है.. हालांकि इस दावे को कांग्रेस के राजनीतिक पक्ष के रूप में देखा जाना चाहिए और इसके स्वतंत्र सत्यापन की जरूरत होगी..



