मोदी-योगी के लिए खतरे की घंटी

स्नातक चुनाव— पढ़े-लिखों ने भी बीजेपी से फेरा मुंह

  • लखनऊ से पटना तक झटका, भाजपा के चुनावी गणित में भूकंप
  • सत्ता का सेमीफाइनल या भाजपा के पतन का ट्रेलर
  • स्नातक चुनाव ने बजाया बिगुल!
  • लखनऊ से वाराणसी और पटना तक नतीजों ने खोली रणनीति की कलई, पढ़े-लिखे मतदाता की नाराजगी
  • भीतरघात और कार्यकर्ताओं की उपेक्षा ने बढ़ाई मोदी-योगी की मुश्किलें

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
लखनऊ। जिस पढ़े-लिखे तबके को भाजपा अपनी सबसे भरोसेमंद ताकत मानती रही है उसी के चुनावी फैसले ने पार्टी के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं। लखनऊ से वाराणसी और वाराणसी से पटना तक स्नातक चुनाव के नतीजे अगर भाजपा के खिलाफ हवा का संकेत दे रहे हैं तो इसे महज कुछ सीटों की हार बताकर खारिज करना भारी भूल होगी।
स्नातक चुनाव के नतीजे सियासी संदेश दे रहे हैं कि भाजपा के वोट बैंक में सेंध लग चुकी है। पढ़ा-लिखा मतदाता भी अब सवाल पूछने लगा है। जगह जगह विरोध हो रहा है। जनता रोजगार से लेकर सुरक्षा की बात कर रही है। सार्वजनिक स्थानों पर अब विरोध में नारे लगने शुरू हो गये हैे। ऐसे में इन नतीजों ने मोदी-योगी की जोड़ी के सामने नई चुनौती पेश कर दी है जो संकेत दे रही है कि अब स्थिति पहले से ज्यादा गंभीर होती जा रही है। स्नातक चुनाव सामान्य चुनावों से अलग होते हैं। यहां मतदाताओं का दायरा सीमित होता है लेकिन राजनीतिक संदेश का दायरा बहुत बड़ा होता है। इस चुनाव में उतरने वाले मतदाता शिक्षा, रोजगार, महंगाई, व्यवस्था और अपने भविष्य जैसे सवालों से सीधे जुड़े होते हैं। भाजपा लंबे समय से अपने पक्ष में शिक्षित मध्यवर्ग के समर्थन का दावा करती रही है। ऐसे में जिन क्षेत्रों में पार्टी को मजबूत माना जाता रहा हो वहां उसके उम्मीदवारों को चुनौती मिलना केवल स्थानीय समीकरणों का मामला नहीं रह जाता। यह पार्टी की रणनीति संगठन और मतदाताओं से उसके रिश्तों की भी परीक्षा बन जाता है।


पटना शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में राजद ने भाजपा से छीनी सीट दरभंगा से जीती जनसुराज

बिहार में शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों में कई सीटों पर उलटफेर देखने को मिला है। पटना शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के प्रत्याशी डॉ. संजीव कुमार ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के वरिष्ठ नेता नवल किशोर यादव को हराकर जीत दर्ज की है। वहीं, दरभंगा शिक्षक सीट पर जन सुराज पार्टी के सुरेश राय ने कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मदन मोहन झा को पराजित किया। सारण शिक्षक सीट से भाजपा के बागी निर्दलीय उम्मीदवार डॉ. राहुल राज ने जीत हासिल की पटना से जीते राजद प्रत्याशी ने कहा है कि वह शिक्षक समाज से किए गए वादों को ईमानदारी और मजबूती के साथ पूरा करेंगे। विधान परिषद में शिक्षकों की आवाज बुलंद करेंगे और सरकार को उनकी समस्याओं के समाधान के लिए काम करने को बाध्य करेंगे। उन्होंने कहा कि पटना शिक्षक सीट पर 30 साल पुराने किले को तोडऩे के बाद वह आगे भी भाजपा सरकार के खिलाफ लड़ाई जारी रखेंगे।

मोदी के संसदीय क्षेत्र में भी सपा का परचम, आगरा शिक्षक सीट पर आकाश अग्रवाल की जीत

भाजपा की चुनावी रणनीति को चुनौती देते हुए समाजवादी पार्टी ने आगरा और वाराणसी की शिक्षक निर्वाचन सीटों पर जीत दर्ज की है। आगरा में डॉ. आकाश अग्रवाल ने सपा को जीत दिलाई, तो वाराणसी में लाल बिहारी यादव ने अपनी सीट बरकरार रखी। वाराणसी का परिणाम इसलिए भी राजनीतिक महत्व रखता है, क्योंकि यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संसदीय क्षेत्र है। आगामी विधानसभा चुनाव से पहले इन नतीजों ने भाजपा के सामने संगठन, कार्यकर्ताओं की नाराजगी और मतदाताओं के बदलते रुझान को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं।

बीजेपी के भीतर अंसतोष कलह और गुटबाजी चरम पर

यहीं से कहानी में असली मोड़ आता है। एक तरफ चुनावी नतीजों से भाजपा के सामने सवाल खड़े हो रहे हैं दूसरी तरफ संगठन के भीतर असंतोष और कार्यकर्ताओं की उपेक्षा की चर्चाएं पार्टी की चिंता बढ़ा रही हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ओर से संगठन को मजबूत करने जमीनी कार्यकर्ताओं से संवाद बढ़ाने और उनकी नाराजगी दूर करने की पहल की खबरें इस बेचैनी को और महत्वपूर्ण बना देती हैं। क्योंकि चुनाव केवल बड़े नेताओं के भाषणों विशाल सभाओं और चमकदार प्रचार अभियानों से नहीं जीते जाते। चुनाव जीतने के लिए बूथ पर खड़ा कार्यकर्ता चाहिए, मतदाता तक पहुंचने वाला संगठन चाहिए और ऐसा भरोसा चाहिए जो चुनाव की घोषणा के बाद नहीं पूरे पांच साल में बनता है।यह हम नहीं कह रहे राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन का आतंरिक सर्वे कह रहा है? कि कार्यकर्ता को लग रहा है कि उसकी याद संगठन को केवल चुनाव के समय आती है। उसकी मेहनत का सम्मान नहीं होता और फैसलों में उसकी आवाज नहीं सुनी जा रही है। यहां भी चुनौती वही है कि समय कम है और चुनाव सिर पर हैं। अगर विधानसभा चुनाव में चार महीने से भी कम समय बचा है, तो क्या इतनी कम अवधि में संगठन की दरारें भरी जा सकेंगी? क्या नाराज कार्यकर्ता फिर उसी ऊर्जा से मैदान में उतरेगा? क्या मतदाताओं का भरोसा दोबारा जीता जा सकेगा? और क्या भाजपा नेतृत्व इन नतीजों को चेतावनी मानकर अपनी रणनीति बदलेगा, या इन्हें स्थानीय चुनाव का सीमित असर बताकर आगे बढ़ जाएगा?

भाजपा की जीत और आगे

1- मेरठ शिक्षक
2- मेरठ स्नातक
3- बरेली-स्नातक
4- लखनऊ-शिक्षक
5- आगरा-स्नातक
6- गोरखपुर-शिक्षक

सपा की जीत और आगे

1- वाराणसी- शिक्षक
2- वाराणसी-स्नातक
3- झांसी-स्नातक
4- आगरा-शिक्षक
5- लखनऊ-स्नातक

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