पीएम से बहस को लेकर कांग्रेस व भाजपा में बढ़ा तनाव

मोदी से खुली बहस की मांग पर अड़ गए नेता प्रतिपक्ष

  • राहुल गांधी बोले- मोहन भागवत को बना लें जज
  • विदेशी ताकतों से संबंध किसके हैं और किस तरह के है बहस में पता चल जाएगा

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नयी दिल्ली। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को खुली बहस की चुनौती मंगलवार को फिर दोहराई और कहा कि प्रधानमंत्री किसी भी मंच और स्थान का चयन कर सकते हैं। उन्होंने तंज कसते हुए यह भी कहा कि प्रधानमंत्री बहस के लिए आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत को जज भी बना सकते हैं। केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रीजीजू ने राहुल गांधी की चुनौती पर तंज कसते हुए कहा कि उच्च स्तर की बहस परिपक्व लोगों के बीच होती है।
बीते सोमवर को प्रधानमंत्री को बहस की चुनौती देने के 24 घंटे बाद गांधी ने एक वीडियो संदेश जारी कर कहा कि प्रधानमंत्री को विपक्ष को देशद्रोही बताने और विदेशी ताकतों से कथित संबंधों के आरोपों पर खुलकर चर्चा करनी चाहिए। गांधी ने कहा, 24 घंटे हो गए मोदी जी। मैंने आपको चुनौती दी है। आप कहते हैं कि विपक्ष देशद्रोही है। किसी भी मंच पर, आप जगह चुनिए और मेरे साथ बहस कीजिए। देशद्रोही कौन है? विदेशी ताकतों से संबंध किसके हैं और किस तरह के हैं? जल्दी से जल्दी कीजिए, डरिए मत। उनका कहना है, एक तरफ आप बैठेंगे और एक तरफ मैं बैठूंगा। जिसको आप जज बनाना चाहते हैं, बना दीजिए। मोहन भागवत जी को बिठा दीजिए और फिर बहस करते हैं। कांग्रेस नेता ने कहा कि बहस में देश की वित्तीय व्यवस्था, वित्तीय ढांचे, अमेरिका के साथ हुए समझौते, उद्योगपति गौतम अदाणी से जुड़े एक मामले और जेफ्री एपस्टीन प्रकरण सहित कई मुद्दों पर चर्चा होनी चाहिए। उन्होंने सवाल उठाया कि अमेरिका के साथ समझौता इतनी जल्दी कैसे हुआ, इसके बारे में मंत्रिमंडल को जानकारी क्यों नहीं दी गई और इस प्रक्रिया में पारदर्शिता क्यों नहीं रखी गई? गांधी ने अदाणी मामले का उल्लेख करते हुए भी सरकार से सवाल पूछे। उन्होंने कहा कि इन सभी मुद्दों पर खुलकर चर्चा होनी चाहिए, ताकि सच्चाई सामने आ सके।

शीर्ष स्तर की बहस परिपक्व लोगों के बीच होती है: रीजीजू

रीजीजू ने गांधी पर पलटवार करते हुए ‘एक्स’ पर पोस्ट किया, शीर्ष स्तर की बहस परिपक्व लोगों के बीच होती है। उन्होंने आरोप लगाया कि भारत के दुश्मनों के एजेंडे को आगे बढ़ाते हुए दूसरों पर विदेशी समर्थन लेने का आरोप लगाना आत्म-उपहास जैसा है। दरअसल, प्रधानमंत्री मोदी ने शनिवार को गुजरात में राष्ट्रीय एकता दिवस के कार्यक्रम में विपक्ष पर निशाना साधा था और कहा था कि जब देश बाहरी चुनौतियों का सामना कर रहा था, तब देश के भीतर कुछ ताकतें झूठ और अफवाह फैलाकर अस्थिरता पैदा करने की कोशिश कर रही थीं।

राजनाथ, गडकरी, शिवराज व योगी मोदी को मनाएं

राहुल गांधी ने ‘एक्स’ पर एक अन्य पोस्ट में देश के युवाओं से पूछा कि क्या वे उनके और प्रधानमंत्री मोदी के बीच खुली बहस देखना चाहते हैं। उन्होंने केंद्रीय मंत्रियों राजनाथ सिंह, नितिन गडकरी और शिवराज सिंह चौहान के साथ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से भी प्रधानमंत्री को बहस के लिए मनाने की अपील की। उन्होंने लिखा कि ये सभी नेता प्रधानमंत्री के हितों को ध्यान में रखते हैं, इसलिए उन्हें मोदी को बहस के लिए राजी करना चाहिए।

दिल्ली एसआईआर में फॉर्म 6 पर अड़ा चुनाव आयोग

  • सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल, दिवाली की छुट्टियों के बाद सुनवाई

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। दिल्ली में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण-एसआईआर के दौरान मतदाता सूची से हटाए गए पुराने मतदाताओं से नए मतदाता के रूप में फॉर्म 6 भरवाने के चुनाव आयोग के कथित आग्रह का मामला बुधवार को सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया। वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने चीफ जस्टिस सूर्यकांत के समक्ष तत्काल सुनवाई के लिए मामले का उल्लेख किया। उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग अब भी उन मतदाताओं से फॉर्म 6 भरने को कह रहा है, जिनके नाम पहले से मतदाता सूची में थे लेकिन एसआईआर के दौरान हटा दिए गए हैं। गौरतलब है कि फॉर्म 6 का इस्तेमाल नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए किया जाता है।
28 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि पहले से मतदाता सूची में शामिल रहे और बाद में हटाए गए नागरिकों को नए मतदाता के तौर पर फॉर्म 6 भरने के लिए बाध्य करना चुनाव आयोग की गलती है. याचिकाकर्ताओं अंजलि भारद्वाज और अमृता जोहरी की ओर से प्रशांत भूषण, शेरिल डिसूजा और नेहा राठी पेश हुए। याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया था कि चुनाव आयोग मतदाताओं को खुद को नए आवेदक के रूप में पेश करने के लिए मजबूर कर रहा है, जबकि फॉर्म 6 में ऐसा गलत घोषणापत्र देना कानूनी कार्रवाई और जेल की सजा का कारण बन सकता है। सीजेआई ने यह भी ध्यान दिलाया कि चुनाव आयोग ने दावे और आपत्तियां दाखिल करने की अंतिम तारीख 30 अक्टूबर से बढ़ाकर 25 नवंबर कर दी है। पीठ ने कहा कि मामले पर दिवाली की छुट्टियों के बाद सुनवाई की जाएगी।

मुख्यमंत्री के दौरे न हो तो न हो सफाई

  • सफाई व्यवस्था की पोल खुली, रातों रात सक्रिय हुआ नगर निगम
  • करोड़ों का भुगतान पाने वाली लखनऊ स्वच्छता अभियान कंपनी पर लाखों का जुर्माना भी बेअसर

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
लखनऊ। शहर की सफाई व्यवस्था को लेकर नगर निगम के दावों की हकीकत एक बार फिर सामने आ गई। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सोमवार को चंदन अस्पताल पहुंचने के कार्यक्रम ने नगर निगम के जोन-4 की सफाई व्यवस्था की स्थिति उजागर कर दी। मुख्यमंत्री पूर्व मंत्री महेंद्र नाथ सिंह का हालचाल लेने अस्पताल पहुंचे थे, लेकिन उनके दौरे के बाद सफाई व्यवस्था को लेकर नगर निगम के अधिकारियों की सक्रियता ने कई सवाल खड़े कर दिए।
बताया जा रहा है कि मुख्यमंत्री ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के दौरान सफाई व्यवस्था पर नाराजगी जाहिर की थी। इसके बाद रातोंरात मंडलायुक्त से लेकर नगर निगम के अधिकारियों तक की सक्रियता बढ़ गई। अधिकारी मौके पर पहुंचने लगे। सुबह नगरीय निकाय निदेशक ने भी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से नाराजगी जताई। साथ ही स्पष्ट किया गया कि जिस स्तर पर लापरवाही सामने आएगी, संबंधित जिम्मेदार के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।

सफाई की निगरानी जोनल अधिकारी की जिम्मेदारी

हैरानी की बात यह भी है कि मुख्यमंत्री के दौरे के बाद जोनल अधिकारी से लेकर सफाई व्यवस्था से जुड़े कर्मचारी तक अस्पताल के बाहर नजर आने लगे। जबकि सफाई की निगरानी उनकी नियमित जिम्मेदारी है। ऐसे में जोनल अधिकारी के साथ जोनल सेनेटरी अधिकारी पंकज शुक्ला की भूमिका और जवाबदेही भी जांच के दायरे में आनी चाहिए।

निजी कंपनी की जवाबदेही कब होगी तय

लेकिन सबसे बड़ा सवाल उस निजी कंपनी की जवाबदेही को लेकर है, जिसे शहर की सफाई और प्रमुख मार्गों की स्वच्छता का जिम्मा सौंपा गया है। लखनऊ स्वच्छता अभियान प्राइवेट लिमिटेड को सफाई के नाम पर करोड़ों रुपये का भुगतान किया जा रहा है, लेकिन शहर की सडक़ों पर कूड़े के ढेर और सफाई में लापरवाही के आरोप लगातार सामने आ रहे हैं।नगर निगम की कार्रवाई भी सवालों के घेरे में है। कंपनी पर लाखों रुपये का जुर्माना लगाया जाता है, लेकिन क्या इसका असर उसकी कार्यप्रणाली पर दिखाई देता है? करोड़ों का भुगतान और उसके मुकाबले लाखों का जुर्माना—क्या इतनी कार्रवाई से कंपनी की जवाबदेही तय हो पा रही है? आरोप हैं कि कई स्थानों पर कूड़ा उठाने और सफाई के नाम पर केवल औपचारिकता निभाई जा रही है।

दो से अधिक बच्चे होने पर चुनाव न लडऩे देने वाले कानूनों की अब जरूरत नहीं : सुप्रीमकोर्ट

  • शीर्ष कोर्ट ने जनसांख्यिकीय बदलावों के कारण ऐसे कानूनों को बेमानी बताया

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि स्थानीय निकायों के चुनाव लडऩे के लिए 2 से अधिक बच्चे होने पर अयोग्य ठहराने वाले कानूनों की प्रासंगिकता अब चखत्म हो गई है। सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि जनसांख्यिकीय बदलावों के कारण, ऐसे प्रतिबंधों के पीछे का तर्क ही अब बेमानी हो गया है। अदालत ने कहा कि भारत की कुल प्रजनन दर 2003 में 3 थी, जब सुप्रीम कोर्ट ने जावेद बनाम हरियाणा राज्य मामले में दो बच्चों के नियम की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा था, जो अब घटकर 1.9 रह गई है।
अदालत ने गौर किया कि प्रजनन दर में आ रही यह गिरावट, जो अब 2.1 के रिप्लेसमेंट लेवल से भी नीचे चली गई है, जल्द ही एक ऐसे जनसांख्यिकीय बदलाव की ओर ले जाएगी, जिसमें आबादी की उम्र बढ़ेगी और काम करने वाली उम्र के लोगों की हिस्सेदारी कम हो जाएगी। जस्टिस नरसिम्हा ने अपना फैसला सुनाते हुए कहा, हमारा दृढ़ मत है कि दो से अधिक बच्चे होने पर दंड देने वाले कानूनों की प्रासंगिकता अब खत्म हो चुकी है। इन कानूनों का आधार यानी अत्यधिक जनसंख्या का डर पिछले कुछ दशकों में आए जनसांख्यिकीय बदलावों के कारण अब खत्म हो गया है।
कोर्ट ने आगे कहा, हमने स्पष्ट किया है कि कैसे 2003 में जावेद बनाम हरियाणा राज्य मामले में ऐसे कानूनों को सही ठहराए जाने के बाद से, भारत की कुल प्रजनन दर 3 से घटकर 1.9 पर आ गई है। सुप्रीम कोर्ट ने बताया, 2.1 की कुल प्रजनन दर को रिप्लेसमेंट रेट कहा जाता है, जो एक पीढ़ी को पूरी तरह से खुद को प्रतिस्थापित करने (यानी अगली पीढ़ी द्वारा जगह लेने) में सक्षम बनाती है। इसलिए, भले ही भारत की जनसंख्या अभी घट नहीं रही है, लेकिन कुल प्रजनन दर का रिप्लेसमेंट रेट’ से नीचे चले जाना जल्द ही एक ऐसे जनसांख्यिकीय बदलाव का कारण बनेगा, जिसमें आबादी की उम्र बढ़ेगी और काम करने वाली आबादी का हिस्सा कम हो जाएगा। कोर्ट ने आगे कहा, इसलिए, जनसंख्या वृद्धि को सीमित करने वाले कानूनों की प्रासंगिकता अब नहीं रही। यदि हम इन जनसांख्यिकीय बदलावों पर ध्यान नहीं देते हैं, तो भारत को गंभीर परिणामों का सामना करना पड़ेगा… इसी वजह से हमें इस मामले की कार्यवाही पर रोक लगानी पड़ी है, और हमने इसे एक बड़ी बेंच के पास भेज दिया है। इस टिप्पणी के साथ, कोर्ट ने ‘जावेद बनाम हरियाणा राज्य (2003) के मामले को एक बड़ी बेंच के पास भेज दिया है। उस मामले में तीन जजों की बेंच ने ‘हरियाणा पंचायती राज अधिनियम, 1994’ की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा था, जिसके तहत 2 से अधिक जीवित बच्चे होने पर उम्मीदवारों को स्थानीय चुनाव लडऩे के लिए अयोग्य घोषित कर दिया गया था।

एमएलसी चुनाव के बाद एनडीए में नहीं थम रही रार

  • सांसद राजीव प्रताप रूडी के बयान से गरमाई बिहार की सियासत
  • जदयू की हार, भाजपा पर निर्दलीय को शामिल करने का आरोप

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
पटना। विधान परिषद की शिक्षक एवं स्नातक सीटों पर हुए चुनाव ने एनडीए को तनाव में डाल दिया है। पहले तनाव परिणाम पर हुआ, जब जदयू अपने कोटे की चार में से तीन सीटों पर हार गया। लेकिन, दो निर्दलीय विधान पार्षदों-वंशीधर ब्रजवासी और राहुल राज को भाजपा में शामिल कराने के प्रयास के बाद तनाव बढ़ता ही जा रहा है।
हालांकि कानूनी बाधाओं के कारण दोनों निर्दलीय भाजपा में औपचारिक रूप से शामिल नहीं हो पाए। अब वे कह रहे कि भाजपा का समर्थन कर रहे हैं। उधर भाजपा के वरिष्ठ नेता और सांसद राजीव प्रताप रूडी ने यह कह कर अलग मोर्चा खोल दिया कि भाजपा नेतृत्व ने किसी राजपूत नेता की ऐसी हैसियत नहीं है कि उनके कहने पर कोई राजपूत चुनाव मैदान से हट जाए। उन्होंने कहा-आपको क्या लगता है कि आज बीजेपी किसी राजपूत नेता को इतना महत्व दे रही है कि उसकी कही बातों को लोग मान लें। राज्य में ऐसा कोई राजपूत नेता नहीं है, जिसके कहने पर इस जाति के लोग किसी दल को वोट दें।

आनंद के आरोप पर जवाब

रुडी की यह टिप्पणी सारण शिक्षक क्षेत्र से जदयू के पराजित उम्मीदवार आनंद पुष्कर के इस आरोप पर आई है कि भाजपा के तीन सांसद-राजीव प्रताप रुडी, जनार्दन सिंह सिग्रीवाल और राधामोहन सिंह ने इस चुनाव में गठबंधन धर्म का पालन करते हुए उनकी मदद नहीं की। रूडी, सिग्रीवाल और राधामोहन क्रमश: छपरा,महाराजगंज और पूर्वी चंपारण के भाजपा सांसद हैं। यह तीनों संसदीय क्षेत्र सारण शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र का हिस्सा है। पुष्कर का आरोप इसलिए महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि उन्हें पराजित करने वाले निर्दलीय राहुल राज भाजपा प्रदेश कार्यसमिति के सदस्य थे। बागी उम्मीदवार बनने के कारण उन्हें भाजपा ने छह वर्षों के लिए निष्कासित कर दिया था। लेकिन, जीत के बाद उन्हें भाजपा में शामिल कराने का प्रयास किया गया। इसमें रुडी की भी भूमिका थी।

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