500 करोड़ का खेल? 6 सांसदों पर मचा बवाल, राउत ने खोला मोर्चा, शिंदे-बीजेपी की हालत खराब!
संजय राउत का आरोप है कि भाजपा और शिंदे गुट मिलकर लगातार “ऑपरेशन टाइगर” जैसी रणनीतियों के जरिए उद्धव ठाकरे की पार्टी को कमजोर करने में लगे हुए हैं।

4पीएम न्यूज नेटवर्क: महाराष्ट्र का सियासी पारा इन दिनों सातवें आसमान पर है। राज नेताओं के एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला लगातार जारी है। शिवसेना UBT के सांसदों के बगावत के बाद सियासी बयानबाजी का दौर बढ़ गया है।
इसी बीच हाल ही में शिवसेना UBT के नेता Sanjay Raut ने महाराष्ट्र की राजनीति में बड़ा विवाद खड़ा कर दिया। उद्धव गुट के 6 सांसदों के एकनाथ शिंदे की शिवसेना में जाने के बाद राउत ने तीखा हमला बोलते हुए कहा कि “500 करोड़ खर्च किए तब जाकर 6 तंदरुस्त गद्दार पैदा हुए, इनका मां-बाप कौन है?” यह बयान उन सांसदों को लेकर था जिन्होंने उद्धव ठाकरे का साथ छोड़कर शिंदे गुट का दामन थाम लिया। राउत का आरोप है कि यह सिर्फ राजनीतिक बदलाव नहीं बल्कि सत्ता, पैसे और दबाव की राजनीति का परिणाम है।
महाराष्ट्र की राजनीति पिछले चार वर्षों से लगातार उथल-पुथल का केंद्र बनी हुई है। 2022 में जब Eknath Shinde ने शिवसेना के बड़े हिस्से को अपने साथ लेकर बगावत की थी, तब राज्य की राजनीति पूरी तरह बदल गई थी। उस बगावत के कारण Uddhav Thackeray की सरकार गिर गई और बाद में शिंदे मुख्यमंत्री बने। इसके बाद चुनाव आयोग और अदालतों की प्रक्रियाओं के बीच शिवसेना का नाम और चुनाव चिन्ह भी शिंदे गुट को मिल गया। उद्धव गुट का दावा है कि यह केवल कानूनी लड़ाई नहीं थी बल्कि राजनीतिक ताकत और सत्ता के प्रभाव का परिणाम था।
आज महाराष्ट्र की राजनीति दो अलग-अलग शिवसेनाओं के बीच संघर्ष बन चुकी है। एक तरफ उद्धव ठाकरे हैं जो खुद को बालासाहेब ठाकरे की असली राजनीतिक विरासत का वारिस बताते हैं, दूसरी तरफ एकनाथ शिंदे हैं जो दावा करते हैं कि उन्होंने शिवसेना को उसकी मूल हिंदुत्ववादी विचारधारा पर वापस लाया है। इसी संघर्ष के बीच सांसदों और नेताओं का लगातार पाला बदलना महाराष्ट्र की राजनीति का नया सामान्य दृश्य बन गया है।
संजय राउत का आरोप है कि भाजपा और शिंदे गुट मिलकर लगातार “ऑपरेशन टाइगर” जैसी रणनीतियों के जरिए उद्धव ठाकरे की पार्टी को कमजोर करने में लगे हुए हैं। हाल के घटनाक्रम में उद्धव गुट के छह सांसदों के शिंदे गुट में जाने को भी इसी अभियान का हिस्सा बताया जा रहा है। राउत और उद्धव समर्थकों का कहना है कि यदि किसी पार्टी के नेता वैचारिक मतभेदों के कारण जाते तो बात अलग थी, लेकिन जब सत्ता और पद के लालच में लोग दल बदलते हैं तो यह लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत नहीं माना जा सकता।
उद्धव ठाकरे समर्थकों की सबसे बड़ी शिकायत भाजपा के खिलाफ यह है कि भाजपा महाराष्ट्र में अपने सहयोगियों को धीरे-धीरे कमजोर करके खुद को मजबूत करने की रणनीति अपनाती है। पहले शिवसेना और भाजपा दशकों तक साथ रहे। दोनों ने मिलकर हिंदुत्व की राजनीति की। लेकिन जब 2019 में मुख्यमंत्री पद को लेकर विवाद हुआ, तब दोनों दलों के रिश्ते बिगड़ गए। उसके बाद जो राजनीतिक घटनाक्रम हुआ उसने महाराष्ट्र की राजनीति को पूरी तरह बदल दिया।
उद्धव समर्थकों का मानना है कि भाजपा ने सत्ता में वापसी के लिए हर राजनीतिक तरीका अपनाया। भाजपा और शिंदे गुट इस आरोप को पूरी तरह खारिज करते हैं। उनका कहना है कि उद्धव ठाकरे ने स्वयं बालासाहेब ठाकरे की विचारधारा से समझौता किया और कांग्रेस तथा एनसीपी के साथ सरकार बनाई। शिंदे समर्थकों का तर्क है कि बगावत इसलिए हुई क्योंकि शिवसैनिकों की भावनाओं को नजरअंदाज किया जा रहा था। लेकिन उद्धव गुट का कहना है कि यह सिर्फ बहाना है और असली मकसद सत्ता हासिल करना था। यह बहस आज भी महाराष्ट्र की राजनीति में जारी है।
वहीं संजय राउत लगातार दावा करते रहे हैं कि बागी नेताओं को आर्थिक और राजनीतिक लाभ का लालच दिया जाता है। हालिया घटनाक्रम में उन्होंने आरोप लगाया कि सांसदों को करोड़ों रुपये और मंत्री पद जैसे प्रस्ताव दिए गए। हालांकि इन आरोपों के समर्थन में कोई आधिकारिक प्रमाण सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आया है, लेकिन राजनीतिक बयानबाजी में यह मुद्दा लगातार उठता रहा है।
महाराष्ट्र में विपक्ष का एक बड़ा वर्ग मानता है कि दल-बदल की राजनीति लोकतंत्र को कमजोर करती है। जनता किसी उम्मीदवार को एक पार्टी और विचारधारा के आधार पर वोट देती है, लेकिन यदि वही नेता बाद में दूसरी पार्टी में चला जाए तो मतदाताओं का विश्वास टूटता है। उद्धव गुट इसी मुद्दे को जनता के सामने उठाने की कोशिश कर रहा है। उनका कहना है कि जनता को तय करना चाहिए कि जिन नेताओं को उन्होंने एक विचारधारा के लिए चुना था, वे बाद में सत्ता के लिए अपना रास्ता क्यों बदल लेते हैं।
दूसरी ओर भाजपा और शिंदे गुट का दावा है कि जो नेता उनके साथ आ रहे हैं वे स्वेच्छा से आ रहे हैं। उनका कहना है कि यदि किसी पार्टी के भीतर असंतोष है तो नेता अपना राजनीतिक भविष्य चुनने के लिए स्वतंत्र हैं। लोकतंत्र में किसी को किसी पार्टी में रहने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। यही कारण है कि भाजपा और शिंदे गुट इन घटनाओं को लोकतांत्रिक प्रक्रिया बताते हैं जबकि विपक्ष इसे राजनीतिक तोड़फोड़ कहता है।
महाराष्ट्र की मौजूदा राजनीति का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि राज्य में अब वैचारिक राजनीति की जगह काफी हद तक सत्ता आधारित राजनीति दिखाई देती है। पहले शिवसेना, कांग्रेस, भाजपा और एनसीपी की स्पष्ट राजनीतिक पहचान थी। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में गठबंधनों और टूट-फूट ने मतदाताओं को भी भ्रमित किया है। जो दल कभी कट्टर विरोधी थे, वे साथ आए और जो दशकों तक सहयोगी रहे, वे अलग हो गए। इस कारण आम मतदाता के सामने यह सवाल खड़ा हो गया है कि आखिर विचारधारा की भूमिका कितनी बची है।
राउत ने एक ट्वीट करके भी इन बागी सांसदों को निशाना साधा। उन्होंने पोस्ट के जरिए कहा है कि उन्होंने कभी न हिम्मत हारी है और न कभी थके हैं. इसके साथ ही कहा कि वो महाराष्ट्र के गद्दरों के खिलाफ लड़ना जारी रखेंगे. ये पोस्ट तब सामने आया है जब हाल ही में पार्टी के 6 सांसदों ने शिंदे गुट का दामन थाम लिया. इसको लेकर आये दिन संजय राउत सक्रिय हैं और इन सांसदों को ‘गद्दार’ का टैग देते हुए कभी मुखपत्र सामना से तो कभी अपने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए निशाना साध रहे हैं.
संजय राउत ने अपने पोस्ट में लिखा, ‘ना थके कभी पैर ना कभी हिम्मत हारी है. लड़ना है महाराष्ट्र के गद्दारो के खिलाफ… होंसला है बुलंद सफर जारी है! जय महाराष्ट्र जय भवानी जय शिवाजी!’ इस पोस्ट के साथ उन्होंने एक तस्वीर भी साझा की है जिसमें वो हाथ में गन लिए हुए हैं. हालांकि, अपने पोस्ट में राउत ने किसी का नाम नहीं लिया, लेकिन इसे 6 बागी सांसदों से जोड़कर देखा जा रहा है. इस पोस्ट को पार्टी कार्यकर्ताओं के मनोबल को बढ़ाने और आगामी राजनीतिक संघर्ष के लिए तैयार रहने का आह्वान के रूप में भी देखा जा रहा है.
गौरतलब है कि संजय राउत की राजनीति हमेशा आक्रामक शैली के लिए जानी जाती है। हाल के दिनों में उन्होंने बागी सांसदों और भाजपा के खिलाफ कई तीखे बयान दिए हैं। कभी उन्होंने वफादारी पर सवाल उठाए, कभी बागियों को लेकर कटाक्ष किए और कभी भाजपा पर महाराष्ट्र की राजनीति को अस्थिर करने का आरोप लगाया। उनके बयानों से समर्थकों में उत्साह आता है, लेकिन विरोधी पक्ष इन्हें गैर-जिम्मेदाराना और विवादास्पद बताता है।
आज महाराष्ट्र की राजनीति में सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि आने वाले चुनावों में जनता किसे समर्थन देगी। क्या मतदाता उद्धव ठाकरे के साथ सहानुभूति दिखाएंगे या फिर सत्ता में मौजूद भाजपा-शिंदे गठबंधन को दोबारा मौका देंगे? यह सवाल अभी खुला हुआ है। लेकिन इतना निश्चित है कि शिवसेना की टूट, सांसदों की बगावत और लगातार चल रही राजनीतिक बयानबाजी आने वाले वर्षों तक महाराष्ट्र की राजनीति को प्रभावित करती रहेगी।
खैर कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि संजय राउत का “500 करोड़ खर्च करके 6 गद्दार पैदा हुए” वाला बयान केवल एक राजनीतिक टिप्पणी नहीं है, बल्कि महाराष्ट्र में चल रही बड़ी राजनीतिक लड़ाई का प्रतीक है। उद्धव ठाकरे गुट इसे लोकतंत्र और राजनीतिक नैतिकता की लड़ाई के रूप में पेश करता है, जबकि भाजपा और शिंदे गुट इसे वैचारिक सुधार और संगठनात्मक मजबूती का परिणाम बताते हैं।



