केन-बेतवा परियोजना में करोड़ों का खेल! रात के अंधेरे में हो रहा घटिया निर्माण

बांदा में केन-बेतवा लिंक परियोजना की नहर निर्माण में घटिया सामग्री और मानकों की अनदेखी के गंभीर आरोप लगे हैं। रात में चोरी-छिपे काम, कमजोर सीसी टाप और करोड़ों की लूट के आरोपों ने प्रशासन और ठेकेदारों को सवालों के घेरे में ला दिया है।

4पीएम न्यूज नेटवर्क: बांदा में देश की बहुचर्चित और महत्वाकांक्षी केन-बेतवा लिंक परियोजना अब गंभीर सवालों के घेरे में है। किसानों की सिंचाई, जल संरक्षण और बुंदेलखंड के विकास की बड़ी उम्मीद मानी जा रही इस परियोजना पर अब घटिया निर्माण और करोड़ों रुपये के कथित घोटाले के आरोप लग रहे हैं।

बांदा ब्रांच और अलिहा रजबहा नहरों के जीर्णोद्धार कार्य में मानकों की अनदेखी, कमजोर निर्माण सामग्री के इस्तेमाल और विभागीय मिलीभगत के आरोपों ने प्रशासन की कार्यप्रणाली पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है। पूर्व क्षेत्र पंचायत सदस्य देवकुमार ने इस पूरे मामले को सार्वजनिक करते हुए ठेकेदार और अधिकारियों पर गंभीर आरोप लगाए हैं।

“दिन में दिखावा, रात में असली खेल”

स्थानीय लोगों और शिकायतकर्ता का सबसे बड़ा आरोप यह है कि नहरों पर सीसी (कंक्रीट) टाप का काम दिन में पारदर्शी तरीके से नहीं, बल्कि रात के अंधेरे में चोरी-छिपे कराया जा रहा है। यह सवाल अब प्रशासन के सामने खड़ा है कि आखिर ऐसा क्या है जिसे जनता और निगरानी से बचाने की कोशिश की जा रही है। यदि निर्माण कार्य मानकों के अनुसार हो रहा है, तो रात में जल्दबाजी और गोपनीयता की जरूरत क्यों पड़ रही है? यही बिंदु पूरे मामले को और गंभीर बना रहा है।

मानकों की खुली अनदेखी का आरोप

शिकायत में कई ऐसे तथ्य सामने आए हैं, जो निर्माण की गुणवत्ता पर सीधे सवाल उठाते हैं। आरोप है कि तय 20mm-10mm ग्रेनाइट गिट्टी की जगह स्थानीय स्तर की घटिया गिट्टी का इस्तेमाल किया जा रहा है। इससे निर्माण की मजबूती पर सीधा असर पड़ सकता है। इसी तरह, जहां 6 इंच बालू भराई होनी चाहिए थी, वहां केवल 1.5 से 2 इंच तक ही भराई की जा रही है। कंक्रीट मिश्रण में भी मानक के विपरीत 1:4:8 का कमजोर अनुपात अपनाने का आरोप है, जबकि परियोजना की प्रकृति को देखते हुए मजबूत मिश्रण अपेक्षित था।

सीमेंट और सीसी टाप में भी गड़बड़ी

शिकायतकर्ता के अनुसार, निर्माण में इस्तेमाल होने वाला सीमेंट 4 घंटे के भीतर उपयोग होना चाहिए, लेकिन इसे 7 से 8 घंटे बाद तक लगाया जा रहा है, जिससे उसकी गुणवत्ता प्रभावित होती है। इसके अलावा, जहां 4 इंच मोटाई का सीसी टाप होना चाहिए, वहां केवल 2.5 से 3 इंच में ही काम पूरा दिखाया जा रहा है। पानी की तराई भी लगभग नाममात्र बताई जा रही है, जो किसी भी कंक्रीट संरचना की मजबूती के लिए बेहद जरूरी मानी जाती है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि यह आरोप सही हैं, तो नहरों की उम्र और उनकी उपयोगिता दोनों गंभीर रूप से प्रभावित हो सकती हैं।

किसानों के हितों पर सीधा असर

केन-बेतवा लिंक परियोजना सिर्फ एक निर्माण कार्य नहीं, बल्कि बुंदेलखंड के हजारों किसानों की उम्मीद से जुड़ी योजना है। सिंचाई सुविधा बेहतर होने से खेती की लागत घटने और उत्पादन बढ़ने की उम्मीद की जा रही है। ऐसे में यदि निर्माण स्तर पर ही समझौता किया गया, तो इसका नुकसान केवल सरकारी धन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आने वाले वर्षों में किसानों को भी इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है। कमजोर नहरें, रिसाव और बार-बार मरम्मत जैसी समस्याएं पूरे उद्देश्य को प्रभावित कर सकती हैं।

करोड़ों की परियोजना पर कमीशनखोरी का साया

शिकायतकर्ता का आरोप है कि यह केवल तकनीकी लापरवाही नहीं, बल्कि सुनियोजित कमीशनखोरी का मामला है। घटिया सामग्री का इस्तेमाल कर लागत बचाई जा रही है और सरकारी धन की बंदरबांट की जा रही है। यदि ऐसा है, तो यह सिर्फ एक ठेकेदार की गलती नहीं, बल्कि विभागीय निगरानी तंत्र की विफलता भी मानी जाएगी। यही वजह है कि स्थानीय स्तर पर यह सवाल तेजी से उठ रहा है कि क्या अधिकारियों को यह सब दिखाई नहीं दे रहा, या फिर सब कुछ “सेटिंग” के तहत चल रहा है।

जांच, भुगतान रोकने और कार्रवाई की मांग

पूर्व क्षेत्र पंचायत सदस्य देवकुमार ने प्रशासन से स्पष्ट मांग की है कि पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच कराई जाए। उन्होंने कहा है कि-

  • दोषी अधिकारियों और ठेकेदारों पर सख्त कार्रवाई हो
  • जांच पूरी होने तक भुगतान पर तत्काल रोक लगाई जाए
  • निर्माण कार्य की गुणवत्ता की स्वतंत्र तकनीकी जांच कराई जाए

स्थानीय लोगों का भी कहना है कि यदि समय रहते कार्रवाई नहीं हुई, तो यह परियोजना शुरू होने से पहले ही भरोसे का संकट बन जाएगी।

सरकार की ड्रीम परियोजना पर सवाल

केन-बेतवा परियोजना केंद्र और राज्य सरकार दोनों की प्राथमिक योजनाओं में शामिल है। इसे बुंदेलखंड के जल संकट के स्थायी समाधान के रूप में देखा जाता है। ऐसे में यदि इसी परियोजना में भ्रष्टाचार की नींव डाली जा रही है, तो यह केवल वित्तीय अनियमितता नहीं, बल्कि विकास मॉडल पर भी सवाल है। अब नजर प्रशासनिक जांच और सरकारी कार्रवाई पर है। यह तय करेगा कि “हर खेत को पानी” का सपना मजबूत नींव पर खड़ा होगा या भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाएगा।

रिपोर्ट -इक़बाल खान

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