अरुण पुरी जी, क्यों लल्लनटॉप की करा रहे हैं फजीहत ?

- पेड़ की कहानी लिखकर जड़ का नाम भूल गया इंडिया टुडे ग्रुप का लल्लनटॉप
- सोशल मीडिया पर बहस तेज है और लोग सवाल पूछ रहे
- ऐसे पत्रकारों के भरोसे चल रहा हिंदी का बड़ा डिजिटल मंच जिन्हें क्रेडिट लिखना भी शायद भारी पड़ रहा है
4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी। जी हां कुर्तकों के सहारे शाहीन प्रकरण में बजाए गलती को स्वीकार करने के लल्लनटॉप द्वारा खुद को जस्टिफाई करने की कोशिशों ने उसे एक बार फिर ट्रोलर्स के निशाने पर ला खड़ा कर दिया है। सोशल मीडिया पर बहस तेज है और लोग सवाल पूछ रहे हैं कि जब किसी मीडिया संस्थान के पत्रकार के साथ ज्यादती होती है और उसी घटना पर दूसरा संस्थान रिपोर्टिंग करता है तो क्या उस पत्रकार की संस्थागत पहचान बताना पत्रकारिता की सामान्य परंपरा का हिस्सा नहीं है?
अरूण पुरी जी आखिर ऐसी कौन सी मजबूरी थी जिसमें लल्लनटॉप द्वारा 4PM का नाम नहीं लिया गया। दिल्ली में 4PM की पत्रकार शाहीन और नफीसा के साथ हुई घटना ने मीडिया जगत में सवाल खड़े किए। मामला सामने आया तो सभी मीडिया संस्थानों ने इसे उठाया। शाहीन और नफीसा की बात सुनी गई घटना पर बहस हुई पुलिस की भूमिका पर सवाल उठे। लल्लनटॉप ने भी इंटरव्यू किया यानी कहानी अच्छी लगी चेहरा अच्छा लगा मामला अच्छा लगा दर्शक भी मिले व्यूज भी मिले बस एक चीज शायद अच्छी नहीं लगी 4PM का नाम।
रिपोर्टिंग किसकी और मलाई किसकी?
लल्लनटॉप से कोई यह नहीं कह रहा कि शाहीन और नफीसा की कहानी मत दिखाइए बिल्कुल दिखाइए पूरी खबर दिखाइए इंटरव्यू कीजिए उनकी आवाज को देश के कोने-कोने तक पहुंचाइए लेकिन जब आप ऐसा कर रहे हो तो फिर यह दर्शकों को यह भी बताइए कि शाहीन/ नफीसा किस संस्थान के पत्रकार हैं। क्योंकि पत्रकार की पहचान मिटाकर उसकी कहानी को चमका देना पत्रकारिता का मूल स्वभाव नहीं हो सकता और अगर 4PM का नाम लेना ब्रांड प्रमोशन है तो फिर यह सवाल भी लाजिमी है कि दूसरे पत्रकार के नाम से उसकी खबर की पहचान बचाए रखना किस श्रेणी में आएगा?
पेड़ की कहानी लिखकर जड़ का नाम भूल गया
संपादक संजय शर्मा की आपत्ति का केंद्र यही है कि पत्रकारिता में सिर्फ कैमरा चलाना काफी नहीं है। जिसने सवाल उठाया उसका नाम भी होना चाहिए जिसने रिपोर्टिंग की उसकी पहचान भी होनी चाहिए और जिस संस्थान ने अपने पत्रकार के साथ खड़े होकर लड़ाई शुरू की उसका संदर्भ भी गायब नहीं होना चाहिए। यही वह बात है जिसे लेकर 4PM ने लल्लनटॉप पर सवाल उठाए हैं। और अब रजत के पलटवार ने इस विवाद को दूसरा आयाम दे दिया है। उन्होंने संजय शर्मा पर यह आरोप लगाया कि वह घटना को 4PM के मार्केटिंग इवेंट में बदलना चाहते हैं। यह गंभीर आरोप है। लेकिन इसका जवाब भी उतना ही सीधा होना चाहिए कि अगर न्याय की मांग करना मार्केटिंग है तो फिर पत्रकारों के अधिकारों की हर लड़ाई को किस खाते में डाला जाएगा? मैं वहां था से बड़ी चीज है कहानी कहां से शुरू हुई रजत का यह कहना महत्वपूर्ण है कि वह एम्स पहुंचे और शाहीन के साथ रहे। लेकिन किसी घटनास्थल पर मौजूदगी पत्रकारिता की पूरी परिभाषा नहीं है। पत्रकारिता केवल यह नहीं पूछती कि कौन वहां था वह यह भी पूछती है कि घटना सामने कैसे आई पहली रिपोर्टिंग किसने की मामले को सार्वजनिक विमर्श में किसने उठाया पीडि़त की आवाज को किसने प्लेटफॉर्म दिया और सबसे जरूरी सवाल कि आखिर जब दूसरे सभी मीडिया संस्थानों ने शाहीन-नफीसा के दर्द को उसके संस्थान के नाम के साथ रिलीज किया तो फिर लल्लनटॉप ने 4PM का नाम क्यों सेंसर किया।
संजय शर्मा का सवाल ब्रांड नहीं पत्रकारिता का है
शहीन प्रकरण में लल्ल्नटॉप की रिपोर्टिंग का हाल ठीक वैसा ही है जैसे किसी क्रिकेट मैच में बल्लेबाज के चौके-छक्के तो दिखाए जाएं लेकिन स्कोरबोर्ड पर टीम का नाम ही न लिखा जाए। अब सवाल उठेगा तो उठेगा ही भाई अगर कहानी शाहीन और नफीसा की थी तो यह भी तो कहानी का हिस्सा था कि दोनों 4PM की पत्रकार हैं। फिर 4PM का नाम लेने में ऐसी क्या आफत थी। क्या नाम लेने से इंटरव्यू का व्यूअरशिप ग्राफ गिर जाती क्या स्क्रीन पर 4PM लिखते ही एल्गोरिद्म नाराज हो जाता या फिर कहीं ऐसा तो नहीं कि व्यूज अपने क्रेडिट पराया वाला कोई नया डिजिटल पत्रकारिता मॉडल विकसित हो रहा है। किसी पत्रकार की मदद करना और पत्रकारिता में उस पत्रकार की संस्थागत पहचान बताना क्या दोनों एक साथ नहीं हो सकते? क्या एम्स जाने के लिए 4PM का नाम हटाना जरूरी था क्या थाने जाने के लिए 4PM का नाम काटना जरूरी था क्या शाहीन की आवाज उठाने के लिए शाहीन जिस संस्थान से जुड़ी हैं उस संस्थान का उल्लेख करना कोई अपराध है बिल्कुल नहीं यही तो सवाल है कि आखिर ऐसा क्यों किया गया?




