पासपोर्ट का पासा…हेमंत बिस्वा को बचाने की कोशिश ?

  • सरकार की नई परिभाषा या कानून का नया खेल?
  • असम चुनाव में कांग्रेस नेता खेड़ा

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। पासपोर्ट एक ऐसा दस्तावेज है जिसे आम आदमी अपनी पहचान अपनी नागरिकता और अपनी विश्वसनीयता का सबसे बड़ा सरकारी प्रमाण मानता आया है। पासपोर्ट बैंक में चाहिए, पासपोर्ट नौकरी में चाहिए, विदेश जाना हो तो भी पासपोर्ट चाहिए, वीजा चाहिए हो तब भी पासपोर्ट चाहिए, अपनी पहचान साबित करनी हो तो पासपोर्ट चाहिए लेकिन अचानक सरकार बताती है कि पासपोर्ट तो महज एक ट्रैवल डॉक्यूमेंट है। इस जानकारी के बाद बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि क्या देश के करोड़ों नागरिक इतने वर्षों से भ्रम में जी रहे थे और उससे भी बड़ा सवाल यह है कि यह बात हमे अभी क्यों बताई जा रही है। कुछ महीने पीछे जाईये तो पता चलता है कि पासपोर्ट के चलते असम के मुखिया हेमंत बिस्वा सरमा के परिवार पर कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने विस चुनाव से पहले गंभीर आरोप लगाकर उन्हें और बीजेपी को असहज स्थित में ला खड़ा कर दिया था। उसकी जांच चल रही है और सरकार को जल्द ही इस प्रकरण पर नई जानकारी साझा करने का दबाव है। जानकारों के मुताबिक विदेश मंत्रालय का यह बयान उसी दिशा में एक कदम हो सकता है ।

सिर्फ टिकट काटने जैसी औपचारिकता नहीं है पासपोर्ट मामलों में

भारत में पासपोर्ट जारी करने की प्रक्रिया केवल टिकट काटने जैसी औपचारिकता नहीं है। इसके लिए नागरिक को अपनी पहचान, पता, जन्मतिथि नागरिकता और अन्य जानकारियों की घोषणा करनी पड़ती है। गलत जानकारी देने या तथ्य छिपाने पर पासपोर्ट अधिनियम तथा अन्य लागू कानूनों के तहत कार्रवाई का प्रावधान है। इसलिए व्यवहारिक स्तर पर पासपोर्ट केवल यात्रा का साधन नहीं बल्कि सरकार द्वारा जारी एक अत्यंत महत्वपूर्ण पहचान संबंधी दस्तावेज भी बन जाता है। इसी संदर्भ में उत्तर प्रदेश के चर्चित अब्दुल्ला आजम मामले की चर्चा होती है। दो पासपोर्ट से जुड़े आरोप में लंबे समय तक राजनीतिक और कानूनी विमर्श का विषय बने रहे। अदालतों में बहस हुई जांच हुई और मामला गंभीर माना गया। इससे यह धारणा मजबूत हुई कि एक से अधिक पासपोर्ट रखना या गलत जानकारी देकर पासपोर्ट प्राप्त करना साधारण प्रशासनिक त्रुटि नहीं बल्कि गंभीर कानूनी विषय है। दूसरी ओर असम की राजनीति में कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने चुनाव के दौरान मुख्यमंत्री हेमंत बिस्वा सरमा की पत्नी पर एक से अधिक पासपोर्ट रखने का आरोप लगाया था। इन आरोपों पर राजनीतिक बयानबाजी हुई और पूरा महौल गर्म हो गया। बस यही से एक नया प्रश्न जन्म लेता है। जब ऐसे आरोप सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा हों और उसी समय सरकार यह स्पष्ट करे कि पासपोर्ट केवल ट्रैवल डॉक्यूमेंट है तो विपक्ष और नागरिकों के मन में संदेह उठना स्वाभाविक है। यहां यह भी समझना जरूरी है कि ट्रैवल डॉक्यूमेंट और महत्वपूर्ण दस्तावेज दोनों बातें एक साथ सही नहीं हो सकती हैं।]

विदेश मंत्रालय के मुताबिक सिर्फ ट्रेवल डाक्यूमेंट है पासपोर्ट

विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि भारतीय पासपोर्ट एक यात्रा दस्तावेज है नागरिकता का अंतिम और निर्णायक प्रमाण नहीं। विदेश मंत्रालय के इस बयान के बाद देश की राजनीतिक में बमचक मच गयी है क्योंकि अभी तक आम धारणा यही रही है कि पासपोर्ट केवल भारतीय नागरिकों को ही जारी किया जाता है। मंत्रालय के बयान ने एक बड़े सार्वजनिक और राजनीतिक सवाल को जन्म दिया है कि यदि पासपोर्ट केवल यात्रा दस्तावेज है तो फिर उसके निर्माण उसके दुरुपयोग और विशेष रूप से एक से अधिक पासपोर्ट रखने के मामलों को कानून इतना गंभीर क्यों मानता है? यहीं से बहस शुरू होती है।

राजनीति में संयोग बहुत कम होते हैं

एक तरफ उत्तर प्रदेश में दो पासपोर्ट रखने के आरोप में आजम खां के बेटे विधायक अब्दुल्ला आजम को कई वर्षो तक जेल में रहना पड़ा और कानूनी लड़ाई लडऩी पड़ी। पासपोर्ट का मुद्दा अदालतों में गंभीर अपराध के रूप में बहस का विषय बनता है। पासपोर्ट के नाम पर जांच के नाम पर डुप्लीकेसी के नाम पर फर्जी पासपोर्ट प्रकरण में न जाने कितने लोग जेलों में है और कितनों पर केस चल रहे हैं ऐसे में यहीं से शुरू होता है असली सवाल अगर पासपोर्ट केवल यात्रा का साधन है तो दो पासपोर्ट रखने पर इतनी सख्त धाराएं क्यों लगती हैं? अगर पासपोर्ट इतना सामान्य दस्तावेज है तो उसे गलत जानकारी देकर बनवाने पर मुकदमे क्यों दर्ज होते हैं? अगर यह केवल ट्रैवल डॉक्यूमेंट है तो अदालतें इसे पहचान नागरिकता और वैधानिक घोषणा के महत्वपूर्ण दस्तावेजों में क्यों गिनती रही हैं? क्या कानून बदल गया? क्या उसकी व्याख्या बदल गई? या फिर राजनीतिक जरूरतों के हिसाब से शब्दों के अर्थ बदलने लगे हैं? हम किसी को दोषी घोषित नहीं कर रहे। हम किसी पर फैसला नहीं सुना रहे 4PM सिर्फ पाठकों के मन में उपजे सवाल उठा रहा है। सवाल उस व्यवस्था का है जिसमें एक ही दस्तावेज अलग-अलग परिस्थितियों में अलग अलग महत्व का दिखाई देने लगता है। आखिर पासपोर्ट सिर्फ ट्रैवल डॉक्यूमेंट है या फिर सुविधा के हिसाब से उसका महत्व तय किया जा रहा है?

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