नल लगे, फोटो खिंची… पानी गायब! नमामि गंगे योजना के बीच प्यासा है बांदा का गुरेह गांव

बांदा के गुरेह गांव में नमामि गंगे योजना के तहत नल और पाइपलाइन तो बिछी, लेकिन पानी आज तक नहीं पहुंचा। भीषण गर्मी में ग्रामीण बूंद-बूंद पानी के लिए परेशान हैं और प्रशासन से समाधान की मांग कर रहे हैं।

4 पीएम न्यूज नेटवर्क: सरकार का दावा है,“हर घर जल”, लेकिन बांदा के गुरेह गांव की हकीकत इस दावे से बिल्कुल अलग तस्वीर पेश कर रही है। यहां नल तो लगाए गए, पाइपलाइन भी बिछी, उद्घाटन भी हुआ और तस्वीरें भी खिंचीं, लेकिन पानी आज तक नहीं पहुंचा। भीषण गर्मी के बीच गांव की करीब 50 प्रतिशत आबादी बूंद-बूंद पानी के लिए संघर्ष कर रही है। हैंडपंप सूख चुके हैं, पानी की टंकियां खाली पड़ी हैं और घरों में लगे नल सिर्फ दिखावे का हिस्सा बनकर रह गए हैं। नमामि गंगे योजना के तहत शुरू हुई जल आपूर्ति व्यवस्था अब ग्रामीणों के लिए उम्मीद नहीं, बल्कि सवाल बन चुकी है।

‘हर घर जल’ का सपना, लेकिन घर-घर प्यास

बांदा के गुरेह गांव में नमामि गंगे योजना के तहत जलापूर्ति व्यवस्था स्थापित की गई थी। गांव में पाइपलाइन बिछाई गई, नल लगाए गए और लोगों को भरोसा दिलाया गया कि अब पानी की समस्या खत्म हो जाएगी। लेकिन महीनों बाद भी हालात नहीं बदले। ग्रामीणों का कहना है कि नलों से आज तक नियमित पानी नहीं आया। कई घरों में लगे नल सिर्फ सरकारी योजना की मौजूदगी दिखाने के लिए हैं, जबकि वास्तविकता में लोगों को आज भी दूर-दराज से पानी लाना पड़ रहा है।

भीषण गर्मी में पानी के लिए संघर्ष

गर्मी बढ़ने के साथ स्थिति और गंभीर हो गई है। गांव के अधिकांश हैंडपंप सूख चुके हैं और जो कुछ जलस्रोत बचे हैं, वहां लंबी कतारें लग रही हैं। सुबह होते ही महिलाएं सिर पर मटके और हाथों में बाल्टी लेकर कई किलोमीटर दूर पानी लेने निकल पड़ती हैं। बच्चों, बुजुर्गों और बीमार लोगों के लिए यह स्थिति और भी कठिन हो गई है। पीने के पानी की कमी अब सीधे स्वास्थ्य और दैनिक जीवन को प्रभावित कर रही है।

ग्रामीणों की पीड़ा: “नल लगे, पानी नहीं आता”

गांव निवासी दिनेश सिंह ने अपनी परेशानी बताते हुए कहा,  “नल तो लगा दिए, लेकिन पानी नहीं आता। बहुत दूर से पानी लाना पड़ता है। बहुत परेशानी है।” यह सिर्फ एक व्यक्ति की शिकायत नहीं, बल्कि पूरे गांव की साझा पीड़ा है। लोगों का कहना है कि योजना के नाम पर सिर्फ औपचारिकता पूरी की गई, जबकि असली जरूरत आज भी अधूरी है।

“यहां योजना नहीं, सिर्फ प्रचार बहा”

ग्रामीणों के बीच सबसे बड़ा आक्रोश इस बात को लेकर है कि कागजों में योजना पूरी दिख रही है, लेकिन जमीन पर पानी नहीं पहुंचा। स्थानीय लोगों का कहना है कि यहां विकास से ज्यादा प्रचार हुआ। उद्घाटन, निरीक्षण और सरकारी दावों के बीच गांव की प्यास अनसुनी रह गई। उनका आरोप है कि जिम्मेदार विभाग ने सिर्फ पाइपलाइन और फोटो तक काम सीमित रखा, जबकि असली जलापूर्ति व्यवस्था कभी मजबूत नहीं की गई।

अपर जिलाधिकारी को सौंपा प्रार्थना पत्र

स्थिति से परेशान ग्रामीणों ने अपर जिलाधिकारी (नमामि गंगे) को प्रार्थना पत्र देकर तत्काल समाधान की मांग की है। उन्होंने मांग की है कि गांव में नियमित जलापूर्ति सुनिश्चित की जाए, खराब व्यवस्था की जांच हो और जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई की जाए। अब गांव वालों की नजर प्रशासनिक कार्रवाई पर टिकी है। उनका सवाल साफ है, क्या इस बार सिर्फ कागज चलेगा, या वास्तव में पानी भी आएगा?

योजना और ज़मीनी सच्चाई के बीच बड़ा अंतर

लोगों का मानना है कि जल जीवन मिशन और नमामि गंगे जैसी योजनाओं की सफलता केवल पाइपलाइन बिछाने से नहीं, बल्कि अंतिम व्यक्ति तक पानी पहुंचाने से तय होती है। अगर योजना वाले गांवों में ही लोग प्यासे हैं, तो यह केवल स्थानीय विफलता नहीं, बल्कि निगरानी और जवाबदेही की बड़ी कमी का संकेत है। बांदा का गुरेह गांव इसी सवाल को सामने ला रहा है।

रिपोर्ट- इक़बाल खान

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