भोजशाला विवाद: ASI ने कहा- संरक्षित स्मारकों पर लागू नहीं होता पूजा स्थल कानून
संरक्षित प्राचीन और ऐतिहासिक स्मारक या इमारतें पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम-1991 के दायरे से बाहर हैं.

4पीएम न्यूज नेटवर्क: संरक्षित प्राचीन और ऐतिहासिक स्मारक या इमारतें पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम-1991 के दायरे से बाहर हैं.
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में भोजशाला मामले में भी एएसआई ने अदालत के समक्ष यह स्पष्ट किया है. यह जरूर है कि संरक्षित इमारतों में इबादत या पूजा इजाजत मिलने पर की जा सकती है.
संरक्षित प्राचीन और ऐतिहासिक स्मारक या इमारतें पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम-1991 के दायरे से बाहर हैं. यह स्पष्ट प्रावधान है कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा संरक्षित स्मारक इस कानून के दायरे से बाहर हैं.
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में भोजशाला मामले में भी एएसआई ने अदालत के समक्ष यह स्पष्ट किया है. यह जरूर है कि संरक्षित इमारतों में इबादत या पूजा इजाजत मिलने पर की जा सकती है.
मुख्य बिंदु और अपवाद- प्राचीन स्मारक अपवाद (धारा 5): यह कानून उन प्राचीन और ऐतिहासिक स्मारकों या पुरातात्विक स्थलों पर लागू नहीं होता जो प्राचीन स्मारक और पुरातात्विक स्थल एवं अवशेष अधिनियम, 1958 के तहत आते हैं. अयोध्या अपवाद-राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद को भी इस अधिनियम की धारा 5 के तहत विशिष्ट रूप से बाहर रखा गया था.
सामान्य नियम (धारा 3 और 4): यह अधिनियम किसी भी पूजा स्थल के धार्मिक स्वरूप को बदलने पर रोक लगाता है और यह अनिवार्य करता है कि 15 अगस्त 1947 को किसी पूजा स्थल का जो धार्मिक स्वरूप था, उसे वैसा ही बनाए रखा जाए.
अन्य छूट-ऐसे मामले जो इस कानून के लागू होने से पहले ही अदालतों द्वारा अंतिम रूप से निपटाए जा चुके हैं. वे विवाद जिन्हें कानून लागू होने से पहले पक्षों ने आपसी सहमति से सुलझा लिया था. मौजूदा समय में पूजा स्थल कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में मामला लंबित है, जिसमें हिंदू पक्ष का तर्क है कि यह कानून न्यायिक उपचार के अधिकार को सीमित करते हैं.
एएसआई की मौजूदा व्यवस्था बुनियादों अधिकारों का हनन
इससे पहले मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय में भोजशाला मंदिर-कमाल मौला मस्जिद मामले की सुनवाई के दौरान हिंदू पक्ष ने मुस्लिम पक्ष के तर्कों का खंडन करते हुए शुक्रवार को कहा कि उसकी दायर जनहित याचिका कोई दीवानी मुकदमा नहीं है. हिंदू पक्ष ने कोर्ट से गुहार लगाई की कि वह भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) को 11वीं सदी के इस संरक्षित स्मारक का मूल धार्मिक स्वरूप बहाल करने का निर्देश दे क्योंकि एएसआई की मौजूदा व्यवस्था से उसके बुनियादी अधिकारों का हनन हो रहा है.
हिंदू पक्ष मानता है मंदिर और मुस्लिम पक्ष कमाल मौला मस्जिद
धार की भोजशाला को हिंदू समुदाय वाग्देवी (देवी सरस्वती) का मंदिर मानता है, जबकि मुस्लिम पक्ष इस स्मारक को कमाल मौला मस्जिद बताता है. यह विवादित परिसर एएसआई द्वारा संरक्षित है. मुस्लिम पक्ष का कहना है कि धार का विवादित स्मारक देश की आजादी की तारीख यानी 15 अगस्त 1947 को मस्जिद के रूप में वजूद में था, लिहाजा उपासना स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम 1991 के प्रावधानों के तहत इसका धार्मिक स्वरूप बदला नहीं जा सकता।
क्या है विवाद?
याचिकाकर्ताओं में शामिल संगठन हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस के वकील विष्णु शंकर जैन ने विवादित स्मारक को लेकर एएसआई के सात अप्रैल 2003 के एक आदेश को न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला और न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी की खंडपीठ के समक्ष चुनौती दी और स्मारक में केवल हिंदुओं को उपासना का अधिकार दिए जाने की गुहार लगाई. एएसआई के इस आदेश के तहत विवादित परिसर में हर मंगलवार को हिंदुओं और हर शुक्रवार को मुस्लिमों को उपासना की अनुमति दी गई है.



