Middle East तनाव का बड़ा असर? गुजरात के उद्योगों पर संकट, तेल–ट्रेड पर मंडराया खतरा
इजरायल और अमेरिका के ईरान पर हमलों के बाद मध्य पूर्व में फैले तनाव ने अब वैश्विक युद्ध की आशंका पैदा कर दी है..

4पीएम न्यूज नेटवर्क: इजरायल और अमेरिका के ईरान पर हमलों के बाद मध्य पूर्व में फैले तनाव ने अब वैश्विक युद्ध की आशंका पैदा कर दी है..
इस संकट की लहरें भारत तक पहुंच चुकी हैं.. और खासतौर पर गुजरात के उद्योगों पर इसका बुरा असर पड़ रहा है.. गुजरात भारत का प्रमुख औद्योगिक राज्य है.. जहां पेट्रोकेमिकल, डायमंड, टेक्सटाइल और निर्यात आधारित कई सेक्टर मजबूती से खड़े हैं.. लेकिन अब कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल.. समुद्री व्यापार मार्गों पर अस्थिरता.. और शिपिंग लागत बढ़ने से इन उद्योगों की चिंता बढ़ गई है.. उद्योगपति और विशेषज्ञों का कहना है कि अगर यह युद्ध लंबा चला तो.. उत्पादन लागत आसमान छू सकती है.. निर्यात रुक सकता है और लाखों नौकरियां खतरे में पड़ सकती हैं.. सरकार को तुरंत ठोस कदम उठाने की जरूरत है.. ताकि गुजरात की अर्थव्यवस्था बचाई जा सके..
28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर बड़े हमले शुरू किए थे.. इन हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता आयतोल्लाह अली खामेनेई समेत कई बड़े नेता मारे गए.. ईरान ने बदले में इजरायल, अमेरिकी ठिकानों और खाड़ी देशों पर मिसाइलें दागीं.. सबसे बड़ा खतरा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर मंडरा रहा है.. ईरान ने इस महत्वपूर्ण जलमार्ग को बंद कर दिया है.. जहां से दुनिया का 20 फीसदी तेल गुजरता है.. भारत के लिए यह और भी गंभीर है.. क्योंकि हमारा 50 फीसदी कच्चा तेल इसी रास्ते से आता है.. गुजरात के बंदरगाह जैसे मुंद्रा और कांडला इसी क्षेत्र से जुड़े हैं.. और यहां से देश का 40 फीसदी एक्सपोर्ट-इंपोर्ट होता है.. इस वजह से गुजरात के उद्योग सबसे पहले प्रभावित हो रहे हैं..
पेट्रोकेमिकल सेक्टर गुजरात की रीढ़ है.. राज्य में रिलायंस के जामनगर जैसे बड़े प्लांट हैं.. जो प्लास्टिक, केमिकल और फर्टिलाइजर बनाते हैं.. ये सब कच्चे तेल और एलपीजी से बनते हैं.. युद्ध शुरू होने के बाद कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ी हैं.. ब्रेंट क्रूड 82 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया है.. जो जनवरी 2025 के बाद सबसे ऊंचा स्तर है.. अगर युद्ध 4-5 हफ्ते चला तो कीमतें 90-110 डॉलर तक जा सकती हैं..
इससे गुजरात के पेट्रोकेमिकल प्लांट्स की उत्पादन लागत 15-20 फीसदी बढ़ सकती है.. मोरबी जैसे इलाकों में सिरेमिक उद्योग भी पेट्रोकेमिकल से जुड़ा है.. यहां प्रोपेन गैस की सप्लाई रुक गई है.. उद्योग संगठनों का कहना है कि केवल 3 दिन का ईंधन बचा है.. अगर टैंकर नहीं आए तो उत्पादन बंद करना पड़ेगा.. और हजारों मजदूर बेरोजगार हो जाएंगे..
मोरबी सिरेमिक हब में 60 फीसदी यूनिट्स प्रोपेन पर चलती हैं.. गल्फ देशों से आने वाली सप्लाई रुकने से गैस डिस्ट्रीब्यूटरों ने अलर्ट जारी कर दिया है.. गुजरात गैस कंपनी भी नए कनेक्शन नहीं दे रही.. क्योंकि उनका खुद का स्टॉक कम हो रहा है.. पेट्रोकेमिकल उद्योग के लिए एलपीजी बहुत जरूरी है.. भारत का 90 फीसदी एलपीजी आयात मध्य पूर्व से आता है.. और उसमें 95 फीसदी होर्मुज से गुजरता है.. युद्ध की वजह से शिपिंग कंपनियां रास्ता बदल रही हैं..
जिससे देरी और खर्च दोनों बढ़ रहे हैं.. गुजरात के पेट्रोकेमिकल निर्यातक अब नए ऑर्डर लेने में हिचकिचा रहे हैं.. क्योंकि लागत बढ़ने से प्रॉफिट मार्जिन घट रहा है.. विशेषज्ञों का अनुमान है कि अगर तेल 10 डॉलर महंगा हुआ.. तो भारत का करंट अकाउंट डेफिसिट 0.4 फीसदी बढ़ जाएगा.. और जीडीपी ग्रोथ 0.15 फीसदी कम हो सकती है.. गुजरात इनमें सबसे आगे है.. क्योंकि यहां का उद्योग तेल पर निर्भर है..
डायमंड इंडस्ट्री गुजरात की सबसे बड़ी निर्यात कमाने वाली इंडस्ट्री है.. सूरत को डायमंड सिटी कहा जाता है.. यहां से दुनिया के 9 में से 10 डायमंड कट और पॉलिश होते हैं.. लेकिन युद्ध ने इस सेक्टर को सीधा झटका दिया है.. इजरायल और दुबई दोनों ही महत्वपूर्ण बाजार हैं.. 2024-25 में सूरत से इजरायल को 548 मिलियन डॉलर के डायमंड एक्सपोर्ट हुए थे.. 2025-26 में भी यह 514 मिलियन डॉलर तक पहुंच गए थे..
इजरायल से रॉ मटेरियल भी आता है.. युद्ध की वजह से इजरायल एयरपोर्ट बंद हैं.. और फ्लाइट्स रद्द हो रही हैं.. दुबई में भी मिसाइल हमलों से ट्रेडिंग हब प्रभावित हुआ है.. सूरत के डायमंड ट्रेडर ने बताया कि रोज 400-500 पार्सल दुबई जाते थे.. लेकिन अब सब रुक गया है.. इंपोर्ट भी 250-300 पार्सल रोज होता था.. वह भी बंद हो गया है.. अगर युद्ध लंबा चला तो हाई वैल्यू डायमंड का कारोबार ठप हो जाएगा..
सूरत के डायमंड कारोबारियों की चिंता बढ़ गई है.. दुबई ग्लोबल ट्रेडिंग हब है, जहां से रफ डायमंड और गोल्ड आता है.. 2024-25 में दुबई से 11,000 मिलियन डॉलर का इंपोर्ट हुआ था.. युद्ध में दुबई एयरपोर्ट पर हमले की खबरें आई हैं.. जिससे पैकेजिंग और ट्रांसपोर्ट रुक गया है.. एसजीसीसीआई के पदाधिकारियों ने चेतावनी दी कि अगर स्थिति सुधरी नहीं तो लेऑफ शुरू हो जाएंगे.. सूरत में डायमंड सेक्टर 10 लाख से ज्यादा लोगों को रोजगार देता है..
जिसको लेकर एक ट्रेडर ने बताया कि उन्होंने दुबई जाने का प्लान रद्द कर दिया.. क्योंकि फ्लाइट्स नहीं हैं.. पूरा कारोबार ठप पड़ने की कगार पर है.. वैश्विक युद्ध की आशंका से खरीदार भी ऑर्डर नहीं दे रहे.. इससे सूरत की अर्थव्यवस्था को बड़ा नुकसान हो सकता है..
टेक्सटाइल सेक्टर भी तेल की कीमतों से सीधे जुड़ा है.. गुजरात का सूरत टेक्सटाइल हब है.. जहां पॉलिएस्टर और मैन-मेड फाइबर बनते हैं.. ये दोनों पेट्रोलियम प्रोडक्ट से तैयार होते हैं.. युद्ध के बाद कच्चा तेल महंगा होने से यार्न और रॉ मटेरियल की कीमतें 15-20 फीसदी बढ़ गई हैं.. एसजीसीसीआई के वाइस प्रेसिडेंट अशोक जिरावाला ने कहा कि अगर तेल की कीमतें ऊंची रहीं तो टेक्सटाइल प्रोडक्शन महंगा हो जाएगा.. और निर्यात मुश्किल हो जाएगा.. सूरत से टेक्सटाइल का बड़ा हिस्सा अमेरिका, यूरोप और खाड़ी देशों को जाता है.. लेकिन शिपिंग रूट अस्थिर होने से कंटेनर मिलना मुश्किल है.. फ्रेट रेट 200-300 फीसदी बढ़ गए हैं.. और मरीन वॉर रिस्क इंश्योरेंस 60 फीसदी महंगा हो गया है.. इससे छोटे निर्यातकों का मुनाफा खत्म हो रहा है..
सूरत के टेक्सटाइल उद्योग में हजारों यूनिट्स हैं.. जो रोज लाखों मीटर कपड़ा बनाती हैं.. युद्ध की वजह से रॉ मटेरियल की सप्लाई चेन टूट रही है.. कई फैक्टरियों में प्रोडक्शन कम हो गया है.. अगर युद्ध 2-3 महीने चला तो लेऑफ की स्थिति आ सकती है.. उद्योगपति कहते हैं कि सरकार को तुरंत सब्सिडी देनी चाहिए या वैकल्पिक इंपोर्ट रूट खोलने चाहिए.. रूस और अमेरिका से ज्यादा तेल लाने की कोशिश हो रही है.. लेकिन वह भी महंगा और समय लेने वाला है.. गुजरात के टेक्सटाइल निर्यात में सालाना अरबों डॉलर का कारोबार है.. यह सेक्टर राज्य की जीडीपी में बड़ा योगदान देता है.. वहीं अब वैश्विक युद्ध की स्थिति में इसका बचाव जरूरी है..
निर्यात आधारित सेक्टर भी बुरी तरह प्रभावित हैं.. राजकोट का इंजीनियरिंग गुड्स सेक्टर गल्फ देशों को कास्टिंग और ऑटो कंपोनेंट भेजता है.. यहां 20-25 फीसदी एक्सपोर्ट गल्फ पर निर्भर है.. युद्ध से शिपिंग कंपनियां 2000 डॉलर प्रति कंटेनर अतिरिक्त चार्ज लगा रही हैं.. इससे छोटे निर्यातक ऑर्डर पूरा नहीं कर पा रहे.. मुंद्रा पोर्ट पर भी कंटेनर की कमी हो रही है.. क्योंकि जहाज होर्मुज से बचकर लंबा रूट ले रहे हैं.. इससे ट्रांजिट टाइम बढ़ गया है.. और सामान समय पर नहीं पहुंच रहा.. गुजरात का कुल एक्सपोर्ट-इंपोर्ट 40 फीसदी इसी पोर्ट से होता है.. अगर स्थिति बनी रही तो पूरे राज्य की अर्थव्यवस्था ठप हो सकती है..
समुद्री व्यापार मार्गों पर अस्थिरता सबसे बड़ा खतरा है.. ईरान ने होर्मुज बंद करने के बाद कई जहाजों पर हमले किए हैं.. इससे इंश्योरेंस प्रीमियम आसमान छू रहा है.. गुजरात के निर्यातकों को अब पहले से 60 फीसदी ज्यादा इंश्योरेंस देना पड़ रहा है.. एयर फ्रेट भी महंगा हो गया है.. क्योंकि कई एयरपोर्ट बंद हैं.. जहां हाई वैल्यू सामान जल्दी भेजना पड़ता है.. वहां यह बहुत नुकसानदायक है.. जिसको लेकर विशेषज्ञ कहते हैं कि अगर युद्ध फैला तो ग्लोबल शिपिंग कंपनियां पूरी तरह गल्फ रूट छोड़ देंगी.. इससे गुजरात जैसे राज्य, जहां निर्यात पर निर्भरता है, सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे..
तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव से महंगाई भी बढ़ रही है.. पेट्रोल-डीजल महंगा होने से ट्रांसपोर्ट कॉस्ट बढ़ेगी.. गुजरात के किसान और छोटे उद्योग इससे प्रभावित होंगे.. एलपीजी की कमी से घरेलू.. और औद्योगिक दोनों क्षेत्र प्रभावित हैं.. मोरबी में प्रोपेन की कमी से सिरेमिक यूनिट्स बंद होने की कगार पर हैं.. अगर उत्पादन रुका तो राज्य का राजस्व भी कम होगा.. एसजीसीसीआई ने चेतावनी दी है कि पूरा साउथ गुजरात प्रभावित हो रहा है.. डायमंड, टेक्सटाइल और केमिकल सेक्टर मिलकर लाखों करोड़ का कारोबार करते हैं.. युद्ध की वजह से यह सब खतरे में है..
उद्योग संगठनों ने सरकार से अपील की है.. एसजीसीसीआई के प्रेसिडेंट ने कहा कि तेल की कीमतें बढ़ने से यार्न 15-20 फीसदी महंगा हो गया है.. सरकार को तुरंत स्टॉकपाइल बढ़ाना चाहिए या रूस से ज्यादा इंपोर्ट करना चाहिए.. गुजरात सरकार को भी स्पेशल पैकेज देना चाहिए.. जिसमें फ्यूल सब्सिडी, इंश्योरेंस सपोर्ट और एक्सपोर्ट प्रमोशन शामिल हो.. केंद्र सरकार ने अभी तक केवल नागरिकों की सुरक्षा पर फोकस किया है.. लेकिन इंडस्ट्री के लिए कोई ठोस प्लान नहीं आया.. विशेषज्ञ कहते हैं कि अगर जल्दी कदम नहीं उठाए गए तो गुजरात के उद्योग 6-12 महीने तक रिकवर नहीं कर पाएंगे..
वहीं उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि यह सिर्फ शुरुआत है.. अगर युद्ध फैला तो और बड़े असर होंगे.. गुजरात को अपने उद्योगों को बचाने के लिए तैयार रहना होगा.. राज्य सरकार और केंद्र दोनों को मिलकर काम करना चाहिए.. व्यापारियों का कहना है कि हर घंटा मायने रखता है.. अगर आज कदम नहीं उठाए गए तो कल बहुत देर हो जाएगी.. गुजरात के पेट्रोकेमिकल, डायमंड, टेक्सटाइल.. और निर्यात सेक्टर की सुरक्षा अब देश की प्राथमिकता होनी चाहिए..
मध्य पूर्व का यह संकट दिखाता है कि कैसे एक क्षेत्रीय युद्ध पूरे विश्व को प्रभावित कर सकता है.. गुजरात जैसे राज्य, जहां उद्योग मजबूत हैं.. उन्हें सबसे ज्यादा सतर्क रहना होगा.. उद्योगपति, मजदूर और सरकार—सबको मिलकर इस चुनौती का सामना करना है.. तेल की कीमतें, समुद्री रूट और एयर ट्रांसपोर्ट इन तीनों पर नजर रखनी होगी.. अगर स्थिति नियंत्रण में आई तो गुजरात के उद्योग फिर से मजबूत हो सकते हैं.. लेकिन फिलहाल चिंता का माहौल है.. और सरकार से ठोस कार्रवाई की मांग तेज हो रही है..



