आरोपों के मॉनसून में भीग गयी बीजेपी

- फंस गये भाजपाई छत्रप देते नहीं पड़ रहा जवाब
- असम, बिहार, महाराष्ट्र, यूपी, मध्य प्रदेश से उठ रहे सुलगते सवाल
- यूपी में चंदा चोरी, एमपी में जमीन आवंटन, बिहार में कानून व्यवस्था, असम में पासपोर्ट मामला और महाराष्ट्र में सियासी पार्टनरशिप पर सवाल
4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। बारिश सिर्फ पानी की नहीं होती कभी बारिश में सवाल बरसते हैं कभी आरोपों के बादल घिर आते हैं और कभी जनता के भरोसे पर संदेह की बूंदें टपकने लगती हैं। इस वक्त भारतीय जनता पार्टी शासित राज्यों में राजनीति का मौसम कुछ ऐसा ही दिखाई दे रहा है। हर सुबह एक नया सवाल दोपहर तक एक नया आरोप और शाम होते होते एक नया विवाद सामने आ ही जाता है। देश का राजनीतिक आसमान इन दिनों लगातार गरज रहा है। असम में मुख्यमंत्री हेमंत बिस्व सरमा के परिवार को लेकर सवाल उठा रहे हैं। उत्तर प्रदेश में राम मंदिर में चंदा चोरी से जुड़े आरोप थमने का नाम नहीं ले रहे। मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री मोहन यादव पर अपने रिश्तेदारों को प्राइम भूमि एलाट किये जाने के संगीन इल्जामों से महौल गर्म हैं। बिहार में सीएम सम्राट चौधरी के शासन में भरत तिवारी लाइव एनकाउंटर पर रायता फैल चुका है उनसे कानून व्यवस्था और चर्चित घटनाओं को लेकर लगातार जवाब मांगे जा रहे हैं। महाराष्ट्र में सहयोगियों के बदलते समीकरण सत्ता की सियासी परीक्षा ले रहे हैं। हर राज्य की कहानी अलग है हर विवाद का विषय अलग है और हर मामले की अपनी कानूनी और राजनीतिक पृष्ठभूमि है। विपक्ष इन बिखरे हुए आरोपों को एक राजनीतिक धागे में पिरो कर आरोपों की माला बना कर पीएम मोदी मोदी के गले में पहनाने की कोशिश में जुट गया है। यही इस दौर की सबसे बड़ी सियासी लड़ाई है। क्या यह महज चुनावी नैरेटिव गढऩे की रणनीति है? या सचमुच सत्ता के सामने जवाबदेही के ऐसे सवाल खड़े हो रहे हैं जिन्हें अब टाला नहीं जा सकता? क्या यह सिर्फ़ अलग अलग राज्यों की अलग अलग घटनाएं हैं? या फिर भारतीय राजनीति एक ऐसे आरोपों के मानसून में प्रवेश कर चुकी है जहां हर नई सुबह सत्ता से एक नया जवाब मांग रही है?
दूसरी गरज चमकी उत्तर प्रदेश में
राम के नाम पर राजनीति या राजनीति के नाम पर राम? देश की सबसे बड़ी आस्था सबसे बड़ा मंदिर और उसी मंदिर को लेकर राजनीतिक आरोप। आरोप भी इतने गंदे की पूछिये मत राम मंदिर के दान और प्रबंधन पर उठे सवालों का सिलसिला रूकने का नाम ही नहीं ले रहा। विपक्ष गंभीर मुद्रा में इस विषय से उठे सवालों के जवाब जनना चाह रहा है। समाजवादी पार्टी सबसे आगे। गौरतलब है कि इससे पूर्व में मंदिर निमार्ण के दौरान भी भ्रष्टाचार के सनसनीखेज आरोप सपा नेता पूर्व विधायक पवन पाण्डेय ने लगाये थे लेकिन उन सवालों के जवाब भी अभी तक नहीं मिले और भ्रष्टाचार का नया अध्याय खुल गया।
आरोपों का पहला बादल असम से
आरोपों का पहला बादल असम से उठा है। विपक्ष मुख्यमंत्री के परिवार को लेकर पासपोर्ट और नागरिकता जैसे मुद््दों पर सवाल उठा रहा है। आरोप लगाए जा रहे हैं। जवाब भी दिए जा रहे हैं। लेकिन सबसे बड़ा सवाल अभी भी वहीं खड़ा है कि अगर आरोप निराधार हैं तो पूरी पारदर्शिता के साथ उनका जवाब क्यों नहीं दिया जा रहा। आखिर इन आरोपों का अंत क्यों नहीं हो रहा। राजनीति में कभी-कभी आरोप से बड़ा होता है आरोपों का अधूरा जवाब। और यही असम में हो रहा है। विधानसभा चुनाव में जब कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने सीएम सरमा के परिवार को पासपोर्ट और दूसरे गंभीर आरोपों से घेरा था तब जांच की बात कहीं गयी थी। अब सवाल उस जांच पर भी पहुंच रहे हैं। जनता जवाब मांग रही है कि मामाल सूबे के शीर्ष व्यक्ति से रिलेट होने के चलते जांच में देरी हो रही है। क्योंकि नजीरे ऐसी बहुत सही है जहां विपक्षी नेताओं पर आरोप लगते ही कार्रवाई हो रही है और सत्ता पक्ष से जुड़े आरोपों को नजरअंदाज किया जा रहा है।
तीसरी बिजली मध्य प्रदेश में गिरी
जमीन सिर्फ मिट्टी नहीं होती सत्ता की नीयत भी मापती है। ज़मीन का हर टुकड़ा सिर्फ़ रजिस्ट्री नहीं होता वह सरकार की विश्वसनीयता का पैमाना भी बन जाता है। मध्य प्रदेश में विपक्ष मोहन सरकार पर गंभीर आरोप लगा रहा है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक सरकार ने प्रभावशाली लोगों को जमीन आंवाटन में लाभ पहुंचाया है। लार्भार्थियों में सीएम मोहन यादव के करीबी रिश्तेदार भी शाामिल है। जबकि सरकार कह रही है कि सब कुछ नियमों के मुताबिक हुआ। इस पूरे प्रकरण ने सरकार की छवि को दागदार बना दिया है और जनता इस मामले में सच जानना चाहती है कि वह क्या है।
चौथा मोर्चा बिहार
बिहार में कानून-व्यवस्था का मुद््दा एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में है। चर्चित तिवारी एनकाउंटर के बाद सत्ता और विपक्ष आमने-सामने हैं। एक ओर सरकार और पुलिस इस कार्रवाई को कानून के दायरे में हुई पुलिस कार्रवाई बताकर अपनी पीठ थपथपा रही है वहीं विपक्ष पूरे घटनाक्रम पर गंभीर सवाल उठा रहा है और निष्पक्ष जांच की मांग कर रहा है। बिहार की राजनीति में यह बहस केवल एक एनकाउंटर तक सीमित नहीं है। विपक्ष लगातार दावा कर रहा है कि राज्य में अपराध की घटनाएं चिंता का विषय हैं। इस एनकाउंटर में बागेश्वर धाम की एंट्री के बाद इस घटना का राष्ट्रीयकरण हो चुका है। बिहार के नए सीएम सम्राट चौधरी बैकफुट पर है और उन्हें जवाब देते नहीं बन रहा। पूरा प्रकरण लाइव होने से और भी ज्यादा सरकार की फजीहत हो रही है।
पांचवीं चुनौती महाराष्ट्र से मिल रही
महाराष्ट्र की राजनीति में बाउंसर नहीं गुगली चल रही है। बाहर की तरफ जाती हुई राजनीति कब भीतर घुस जाए पता नहीं। फडणवीस सरकार को लेकर डिप्टी सीएम एकनाथ शिंदे की ताजा टिप्पणी ने राजनीतिक सरगर्मी तेज कर दी है। वहीं विपक्ष लगातार सरकार को घेरने की कोशिश कर रहा है लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों की नजर केवल विपक्ष पर नहीं बल्कि सत्ता पक्ष के भीतर के समीकरणों पर भी टिकी है। सहयोगी दलों की नाराजगी की चर्चाएं अलग अलग नेताओं के सार्वजनिक बयान और समय समय पर सामने आने वाली असहमतियों की खबरें विपक्ष को यह कहने का मौका देती हैं कि सरकार की सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष नहीं बल्कि अपने ही कुनबे का संतुलन है। गठबंधन की सरकारें विश्वास के धागों से चलती हैं। जब वह धागे मजबूत होते हैं तो बड़े से बड़ा राजनीतिक तूफान भी सरकार का कुछ नहीं बिगाड़ पाता। लेकिन यदि उन्हीं धागों में गांठें पडऩे लगें तो मामूली राजनीतिक झटका भी बड़े संकट का संकेत बन सकता है। राजनीति में खामोशी भी कई बार बयान से ज्यादा मुखर होती है। सहयोगियों की फीकी पड़ती मुस्कान मंच पर घटती सहजता और सार्वजनिक मंचों से आने वाले अलग-अलग सुर विपक्ष के लिए नए सवाल गढऩे का अवसर बन जाते हैं। ऐसे में विपक्ष को हर दिन नया हमला करने की जरूरत भी नहीं पड़ती सत्ता के भीतर की हलचल ही बहस का विषय बन जाती है।




