किसानों की जमीन पर हाई-टेंशन लाइन, इसुदान गढ़वी ने ‘खेडुत स्वाभिमान’ सम्मेलन से भरी हुंकार
भरूच में आयोजित ‘खेडुत स्वाभिमान’ सम्मेलन में किसानों की जमीन पर हाई-टेंशन लाइन बिछाने के मुद्दे को लेकर आवाज बुलंद हुई...

4पीएम न्यूज नेटवर्कः भरूच में आम आदमी पार्टी के गुजरात प्रदेश अध्यक्ष इसुदान गढ़वी की विशेष उपस्थिति में ‘खेडूत स्वाभिमान’.. यानी किसानों के स्वाभिमान को लेकर एक महत्वपूर्ण सम्मेलन आयोजित किया गया.. इस सम्मेलन में किसानों से जुड़े कई गंभीर मुद्दों पर चर्चा हुई.. लेकिन सबसे प्रमुख मुद्दा किसानों की जमीन से उनकी सहमति के बिना गुजारी जा रही हाई-टेंशन बिजली लाइनों का रहा..
सम्मेलन में किसानों की ओर से यह सवाल प्रमुखता से उठाया गया कि आखिर उनकी जमीन, उनके खेत.. और उनकी आजीविका से जुड़े फैसले उनकी सहमति के बिना कैसे लिए जा सकते हैं.. किसानों का कहना है कि सरकार और बड़ी कंपनियों की परियोजनाओं के लिए उनकी जमीन का इस्तेमाल किया जा रहा है.. लेकिन इसके बदले उन्हें उचित और सम्मानजनक मुआवजा नहीं दिया जा रहा.. किसानों का आरोप है कि सरकार कंपनियों के साथ मिलकर उनके खेतों के ऊपर से धड़ल्ले से हाई-टेंशन लाइनें गुजार रही है.. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि सरकार किसानों की है या कंपनियों की..
किसानों के लिए जमीन सिर्फ एक संपत्ति नहीं होती.. खेत उनके परिवार की आजीविका का आधार होते हैं.. कई पीढ़ियों से किसान इसी जमीन पर खेती करते आए हैं.. ऐसे में जब खेतों के बीच से या उनके ऊपर से हाई-टेंशन लाइनें गुजरती हैं.. तो इसका असर केवल जमीन के इस्तेमाल तक सीमित नहीं रहता, बल्कि खेती, भविष्य की योजनाओं.. और परिवार की आर्थिक सुरक्षा पर भी पड़ता है..
खेडूत स्वाभिमान सम्मेलन में इसी मुद्दे को लेकर किसानों के अधिकारों की आवाज बुलंद की गई.. सम्मेलन में यह स्पष्ट संदेश दिया गया कि.. विकास के नाम पर किसानों के अधिकारों की अनदेखी नहीं की जानी चाहिए.. अगर किसी परियोजना के लिए किसानों की जमीन या खेतों का इस्तेमाल किया जा रहा है.. तो सबसे पहले किसानों की सहमति.. और उनके उचित हितों का ध्यान रखना जरूरी है..
किसानों की मांग है कि उन्हें ऐसा मुआवज़ा मिलना चाहिए.. जो उनके नुकसान और जमीन के वास्तविक मूल्य के अनुरूप हो.. केवल एक बार की औपचारिक राशि देकर किसानों की समस्या का समाधान नहीं किया जा सकता.. किसानों का कहना है कि उन्हें उनकी जमीन के उपयोग.. और उससे होने वाले लंबे समय के प्रभाव को ध्यान में रखते हुए उचित विकल्प दिए जाने चाहिए.. सम्मेलन में मुआवज़े को लेकर कई विकल्पों की बात सामने रखी गई.. इनमें बाजार भाव से चार गुना मुआवजा 25 वर्षों की अवधि के आधार पर मुआवजा मासिक किराया या फिर परियोजना से होने वाले मुनाफे में किसानों की हिस्सेदारी जैसे विकल्प शामिल हैं..
किसानों का कहना है कि अगर उनकी जमीन और खेत किसी परियोजना के लिए इस्तेमाल किए जा रहे हैं.. तो उन्हें केवल तत्काल नुकसान के आधार पर नहीं.. बल्कि लंबे समय तक होने वाले प्रभाव को ध्यान में रखकर मुआवज़ा मिलना चाहिए.. मसलन, यदि किसी किसान के खेत से हाई-टेंशन लाइन गुजरती है.. तो उसके खेत के उपयोग, खेती की व्यवस्था.. और भविष्य में जमीन के इस्तेमाल पर कई तरह की पाबंदियां या कठिनाइयां उत्पन्न हो सकती हैं.. ऐसे में किसान चाहते हैं कि मुआवजे की व्यवस्था भी केवल एक बार भुगतान तक सीमित न हो.. बल्कि लंबे समय तक किसानों के हितों की रक्षा करे..
इसी वजह से किसानों की ओर से यह मांग रखी गई कि उन्हें कई विकल्प दिए जाएं.. और अंतिम निर्णय उनकी सहमति से हो.. किसानों को बाजार भाव के आधार पर उचित मुआवज़ा मिले.. 25 वर्षों की अवधि को ध्यान में रखते हुए भुगतान की व्यवस्था हो.. मासिक किराये का विकल्प दिया जाए या फिर परियोजना से होने वाले मुनाफे में किसानों को हिस्सेदारी दी जाए.. इनमें से जो विकल्प किसान को उचित लगे.. उसे स्वीकार करने का अधिकार किसान के पास होना चाहिए.. सम्मेलन में यह संदेश भी दिया गया कि जब तक किसान मुआवज़े के मुद्दे पर संतुष्ट.. और सहमत नहीं होते, तब तक कंपनी या सरकार के प्रतिनिधियों को किसानों के खेतों में प्रवेश की अनुमति नहीं दी जाएगी..
वहीं यह रुख केवल विरोध के लिए विरोध नहीं.. बल्कि किसानों के अधिकारों और उनकी सहमति के सवाल को सामने लाने की कोशिश के रूप में प्रस्तुत किया गया.. किसानों का कहना है कि.. उनके खेतों में किसी भी परियोजना से जुड़ा काम शुरू करने से पहले उनके साथ बातचीत होनी चाहिए.. और उनकी उचित मांगों पर सहमति बननी चाहिए.. इस पूरे मुद्दे को लेकर भरूच में आयोजित ‘खेडूत स्वाभिमान’ सम्मेलन ने एक बड़े राजनीतिक.. और किसान आंदोलन का संकेत भी दिया है.. यहां उठी आवाज़ को केवल एक जिले तक सीमित नहीं माना जा रहा है..
इसुदान गढ़वी ने इस मुद्दे को गुजरात के किसानों से जोड़ते हुए कहा कि हाई-टेंशन लाइनों का मामला केवल भरूच तक सीमित नहीं है.. गुजरात के 23 जिले इस समस्या से प्रभावित बताए जा रहे हैं.. ऐसे में यह सवाल अब केवल भरूच के किसानों का नहीं.. बल्कि पूरे गुजरात के किसानों के अधिकारों का सवाल बनता जा रहा है..
अगर अलग-अलग जिलों के किसान एक ही तरह की समस्या का सामना कर रहे हैं.. तो आने वाले समय में इस मुद्दे पर व्यापक स्तर पर किसानों के एकजुट होने की संभावना है.. सम्मेलन से यही संदेश देने की कोशिश की गई कि किसान अपनी जमीन, अपने अधिकार और उचित मुआवज़े के लिए सामूहिक रूप से आवाज़ उठाएंगे..
किसानों का कहना है कि वे विकास के विरोधी नहीं हैं.. वे चाहते हैं कि राज्य में विकास हो, बिजली की व्यवस्था मजबूत हो और जरूरी परियोजनाएं आगे बढ़ें.. लेकिन विकास की कीमत केवल किसान ही क्यों चुकाए.. अगर किसी परियोजना से सरकार और कंपनियों को लाभ मिलता है.. तो उसमें प्रभावित किसानों के अधिकारों और हितों को भी बराबर महत्व दिया जाना चाहिए..



