अजित पवार के जाने से एनसीपी में हो गया खेला, बीजेपी की टेंशन बढ़ी, शरद पवार संभालेंगे कमान
अजित पवार के साथ के लोग कतई ये नहीं चाहते हैं कि सत्ता से दूरी बने जबकि यह बात भी तय है अगर कमान वापस शरद पवार के हाथ में गई तो पार्टी सत्ता से बाहर होगी, जो बीजेपी के लिए टेंशन पैदा करने वाली है

4पीएम न्यूज नेटवर्क: अजित पवार की अचानक मौत के बाद एक बार फिर एनसीपी की कश्ती डांवाडोल दिखाई दे रही है। एक ओर जहां बड़ी खबर सामने आई है कि मौत से पहले अजित पवार और शरद पवार में पार्टी के विलय को लेकर डील फाइनल हो गई थी तो वहीं दूसरी ओर अब अजित पवार वाली एनसीपी में भयंकर मतभेद दिखाई दे रहें हैं।
अजित पवार के साथ के लोग कतई ये नहीं चाहते हैं कि सत्ता से दूरी बने जबकि यह बात भी तय है अगर कमान वापस शरद पवार के हाथ में गई तो पार्टी सत्ता से बाहर होगी, जो बीजेपी के लिए टेंशन पैदा करने वाली है लेकिन इस सबके बीच एक 38 सेंकेंड की वीडियो लीक हुई, जो अजित पवार की जगह कौन लेगा ये तय करती हुई दिख रही है। ऐसे में बीजेपी न सिर्फ पूरे मामले में बुरा फंसी है बल्कि शरद पवार और अजित पवार के बीच हुई फाइनल डील होने से हड़कंप भी मचा हुआ है। किसने शरद पवार और अजित पवार के बीच की फाइनल डील को सुर्खियों में ला लिया है और कैसे बीजेपी की टेंशन बढ़ी है, और अजित दादा की कमान संभालने जा रहा है।
दोस्तों, महाराष्ट्र की सियासत में आजित पवार सिर्फ एक नाम नहीं, एक संस्था है। लेकिन 28 जनवरी 2026 की सुबह उस संस्था की एक मजबूत दीवार ढह गई। बारामती के रनवे पर लैंडिंग से ठीक पहले उप-मुख्यमंत्री अजित पवार का विमान क्रैश हुआ और सब कुछ राख हो गया। लेकिन क्या आप जानते हैं कि अजित पवार जिस वक्त आखिरी सांसें ले रहे थे, उस वक्त उनके पास महाराष्ट्र की तकदीर बदलने वाला एक गुप्त दस्तावेज था? एक ऐसा प्लान जो 8 फरवरी को दुनिया के सामने आने वाला था। इसके लिए उन्होंने अपने चाचा शरद पवार से एक सीक्रेट डील की थी। ये डील एनसीपी के एक होने को लेकर थी लेकिन अजित पवार की मौत ने उस डगर को इतना कठिन बना दिया है कि अब पार्टी के दो फाड़ होने की संभावना बढ़ गई है।
सत्ता का मोह और परिवार की विरासत के बीच फंसी एनसीपी का अब क्या होगा? क्या अजित दादा का आखिरी सपना उनके साथ ही जल गया? सूत्रों का दावा है कि अजित पवार और शरद पवार के बीच एक ऐसी बैठक हुई थी, जिसकी भनक किसी को नहीं लगी। पिछले दो सालों से चली आ रही कड़वाहट अचानक खत्म हो गई थी। अजित पवार के करीबी किरण गुजर का दावा है कि दोनों नेता इस बात पर सहमत हो गए थे कि अब बंटवारे का समय खत्म हुआ। एनसीपी को फिर से एक होना ही होगा। दावा तो यहां तक है कि प्लान तैयार था कि जिला परिषद चुनावों के ठीक बाद, यानी 8 फरवरी को एक भव्य मंच सजना था। वहाँ शरद पवार और अजित पवार को हाथ उठाकर ये ऐलान करना था कि हम फिर से एक हैं। इस विलय से महाराष्ट्र की पूरी राजनीति पलट जाती। महायुति और महाविकास अघाड़ी के समीकरण धरे के धरे रह जाते। लेकिन शायद कुदरत को ये मंजूर नहीं था। 28 जनवरी की सुबह विमान क्रैश हुआ और उस विलय की फाइल पर हमेशा के लिए डेथ वारंट लिख दिया गया।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार किरण गुजर ने बताया कि अजित पवार की शरद पवार, सुप्रिया सुले और अन्य नेताओं के साथ सकारात्मक बातचीत चल रही थी। संकेत मिल रहे थे कि शरद पवार भी इस कदम का समर्थन कर सकते हैं। हाल ही में हुए नगर निकाय चुनावों में राकांपा और राकांपा (शरद पवार) ने पुणे और पिंपरी-चिंचवड़ में मिलकर चुनाव लड़ा था। इसके अलावा, अगले महीने होने वाले जिला परिषद चुनावों के लिए भी गठबंधन बनाए रखने का फैसला किया गया था,इससे दोनों गुटों के बीच नजदीकियां और बढ़ी थीं। गुजर के मुताबिक, अजित पवार के पास विलय के बाद बनने वाली संयुक्त राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के भविष्य को लेकर एक स्पष्ट रोडमैप था। उनका मानना था कि एकजुट होकर ही बारामती और पूरे महाराष्ट्र की बेहतरी के लिए प्रभावी ढंग से काम किया जा सकता है। किरण गुजर ने दुख जताते हुए कहा कि कई सकारात्मक संभावनाएं उभर रही थीं, लेकिन इस त्रासदी ने अजित दादा को हमसे छीन लिया। अब उनकी मृत्यु के बाद यह और भी अधिक अनिवार्य हो गया है कि दोनों गुट एकजुट होकर बारामती और राज्य की बेहतरी के लिए काम करें।
अजित पवार का गुरुवार को अंतिम संस्कार हुआ, लेकिन शुक्रवार सुबह होते-होते उनकी पार्टी में वो डर हकीकत में बदलने लगा जो कई दिनों से सता रहा था। अजित दादा के जाते ही उनकी एनसीपी में दरारें पड़ गई हैं। अब डगर बहुत कठिन हो गई है। सूत्रों का कहना है कि अजित पवार गुट अब साफ तौर पर दो हिस्सों में बंटता नजर आ रहा है। पहला गुट उन नेताओं का है जो मानते हैं कि अजित दादा की आखिरी इच्छा विलय की थी, इसलिए हमें शरद पवार साहब के पास वापस लौट जाना चाहिए। लेकिन दूसरा गुट? दूसरा गुट सत्ता का साथ नहीं छोड़ना चाहता। ये वो नेता हैं जो महायुति (बीजेपी-शिंदे) सरकार में मलाईदार पदों पर हैं और वे जानते हैं कि शरद पवार के पास वापस जाने का मतलब है संघर्ष के दिनों में लौटना। ये नेता सत्ता के साथ बने रहने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं।
एनसीपी के इस बिखराव ने बीजेपी की रातों की नींद उड़ा दी है। बीजेपी का गणित बड़ा सीधा था कि अजित पवार के जरिए वे एकनाथ शिंदे की शिवसेना को कंट्रोल में रखते थे। अब अगर अजित पवार गुट बिखरता है और विधायक वापस शरद पवार के पास जाते हैं, तो सरकार में एकनाथ शिंदे का कद अचानक बहुत बड़ा हो जाएगा। बीजेपी कभी नहीं चाहेगी कि गठबंधन में कोई एक क्षेत्रीय दल उन पर भारी पड़े। इसीलिए बीजेपी के चाणक्य अब इस कोशिश में हैं कि अजित पवार गुट को कैसे भी एकजुट रखा जाए और उन्हें महायुति से बाहर न जाने दिया जाए। लेकिन इस सबके बीच बड़ा सवाल यह है कि अजित पवार की विरासत का असली वारिस कौन होगा? ये सवाल आज महाराष्ट्र के हर चौराहे पर पूछा जा रहा है। सबसे पहला नाम आता है उनकी पत्नी सुनेत्रा पवार का। लेकिन क्या वे इस बिखरी हुई पार्टी को संभाल पाएंगी?
दूसरी तरफ प्रफुल पटेल और सुनील तटकरे जैसे मंझे हुए खिलाड़ी हैं, जो खुद भी कमान संभालने की इच्छा रखते हैं। लेकिन खतरा ये है कि अगर किसी एक बाहरी को नेता बनाया गया, तो पवार परिवार के वफादार विधायक शरद पवार के पास भागने में देरी नहीं करेंगे। ऐसे में भयंकर पेंच फंसा हुआ है। और अजित पवार के निधन ने महाराष्ट्र की राजनीति को एक ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है जहाँ से वापसी का कोई रास्ता नहीं दिखता। विलय की जो डगर आसान लग रही थी, वो अब कांटों भरी हो गई है। अजित पवार का न होना… एनसीपी के लिए वो झटका है जिससे शायद ये पार्टी कभी उबर न पाए। सत्ता का मोह विधायकों को शरद पवार के पास जाने से रोक रहा है, और नेतृत्व की कमी उन्हें महायुति में डरा रही है। एक होने वाली थी एनसीपी… लेकिन एक हादसे ने सब तबाह कर दिया। लेकिन एक 38 सेंकेड का वीडियो बहुत कुछ बयान कर रहा है और ये वीडियो उस समय का है जब अजित दादा का पार्थिव शरीर पंच तत्व में विलीन हो रहा है।
दोनों बेटे अजित दादा की कमान संभालने को तैयार है। खासतौर से पार्थ पवार का स्टैंड क्लियर दिख रहा है। अब इसमें क्या होगा ये आने वाला समय बताएगा। लेकिन दूसरी ओर यह भी अहम है कि क्या शरद पवार अपने भतीजे की आखिरी अधूरी इच्छा को पूरा करने के लिए कोई नया चमत्कार करेंगे? या फिर अजित पवार की एनसीपी इतिहास के पन्नों में सिर्फ एक याद बनकर रह जाएगी?



