चुनाव से पहले कांग्रेस को मिली मजबूती, AIMIM नेता ने थामा कांग्रेस का दामन

इसी कड़ी में हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी की अगुवाई वाली AIMIM के राष्ट्रीय प्रवक्ता रहे आसिम वकार ने अब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का दामन थाम लिया है।

4पीएम न्यूज नेटवर्क: इन दिनों देश की राजनीति में एक नाम बेहद चर्चा में बना हुआ है। जिसकी लोकप्रियता दिन बा दिन बढ़ती जा रही है। पहले जहाँ कहा जाता था कि पीएम मोदी के सामने कोई ऐसा विपक्षी चेहरा नहीं है।

लेकिन आज आलम ये है कि उसी नेता से प्रभावित होकर दूसरी पार्टियों के नेता अपनी पार्टी छोड़कर उनका दामन थाम रहे हैं। हम बता कर रहे हैं कांग्रेस नेता राहुल गांधी की जिनकी लोकप्रियता का आलम भाजपाइयों को हजम नहीं हो रहा है।

इसी कड़ी में हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी की अगुवाई वाली AIMIM के राष्ट्रीय प्रवक्ता रहे आसिम वकार ने अब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का दामन थाम लिया है। उनके AIMIM छोड़ने की अटकलें काफी समय से चल रही थी. इस घटना में कांग्रेस के अल्पसंख्यक विभाग के प्रमुख और राज्यसभा सांसद इमरान प्रतापगढ़ी की अहम भूमिका रही।

यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और प्रदेश प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम भी मौजूद रहे। गौतम ने कहा कि राहुल गांधी के नेतृत्व में शिक्षा, रोजगार, छात्रों, महिलाओं और वंचित वर्गों के मुद्दों पर देश भर में आंदोलन चल रहा है।

इसी प्रेरणा से अलग-अलग पार्टियों के नेता कांग्रेस में आ रहे हैं और मल्लिकार्जुन खड़गे तथा राहुल गांधी के हाथ मजबूत कर रहे हैं। वकार, असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM में लंबे समय से सक्रिय थे और पार्टी की मुखर आवाज थे. वह एआईएमआईएम में राष्ट्रीय प्रवक्ता की भूमिका निभा रहे थे. वकार AIMIM से पहले समाजवादी पार्टी में थे.

इस दौरान कांग्रेस नेता इमरान प्रतापगढ़ी ने पार्टी में उनका स्वागत किया। साथ ही उन्होंने ये भी कहा कि अन्य दलों के नेताओं का कांग्रेस में शामिल होने का सिलसिला लगातार जारी रहेगा।वहीं कांग्रेस में शामिल होने के बाद आसिम वकार ने कहा कि जो हमारी लड़ाई है जो देश से प्यार करते है. बीजेपी को उखाड़ फेंकना है. मुझे MIM रहने के दौरान ये लगा कि बीजेपी को हटाना है लेकिन बीजेपी के खिलाफ नहीं लड़ते हैं.

कांग्रेस पर निशाना साधते हैं. इसलिए मैं कांग्रेस ज्वाइन कर रहा हूं. असल में बीजेपी से अगर कोई लड़ रहा है तो राहुल गांधी लड़ रहे हैं . उन्होंने कहा कि हुमायूं कबीर के बारे में मैंने कहा था कि बीजेपी का एजेंट है और बाबरी मस्जिद जो बनवा रहा है वह बीजेपी बनवा रही है.

उसने स्ट्रिंग ऑपरेशन में कहा था कि 1100 करोड रुपए मुझे मिले. हमारी सरकार आएगी तो इसकी जांच करवाएंगे. मैं सच, सहीं, देश और धर्मनिरपेक्षता के साथ हूं. मैं यहां टिकट के लिए नहीं आया हूं. मैंने 20 साल सपा में गुजारे. कभी अखिलेश यादव नहीं कह सकते कि मैंने कभी कोई ट्रांसफर पोस्टिंग तक की बात नहीं की.

यह कदम 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले आया है। AIMIM यूपी में अपनी जड़ें मजबूत करने की कोशिश में थी। 2022 के चुनाव में पार्टी ने कई सीटों पर चुनाव लड़ा था लेकिन सफलता नहीं मिली थी। आसिम वकार जैसे मुखर और टीवी पर पहचान रखने वाले नेता का जाना ओवैसी के लिए बड़ा झटका है।

वे यूपी में मुस्लिम वोटरों के बीच अपनी पकड़ बढ़ाने की योजना बना रहे थे। एक प्रमुख प्रवक्ता और संगठनात्मक अनुभव रखने वाले व्यक्ति का निकल जाना पार्टी की छवि और मोर्चाबंदी दोनों को कमजोर करता है। इससे पहले भी AIMIM के कुछ अन्य नेताओं के जाने की खबरें आई थीं, जिससे पार्टी पर दबाव बढ़ रहा है।कांग्रेस के लिए यह घटना मजबूती का संकेत है।

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस लंबे समय से संघर्ष कर रही है। 2022 में पार्टी बहुत कम सीटें जीत पाई थी। अब समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन की संभावनाओं के बीच ऐसे नेताओं का आना पार्टी को अल्पसंख्यक समुदाय के बीच विश्वसनीयता बढ़ाने में मदद कर सकता है। आसिम वकार टीवी पर प्रभावी तरीके से बोलते हैं और यूपी की राजनीति की बारीकियां जानते हैं। उनका अनुभव और संपर्क कांग्रेस को फायदा पहुंचा सकते हैं।

राहुल गांधी की यात्राएं और मुद्दों पर उनकी सक्रियता से प्रभावित होकर कई नेता पार्टी में आ रहे हैं। यह ट्रेंड कांग्रेस को युवा और नए चेहरों के साथ जोड़ने में सहायक है। खड़गे के नेतृत्व में पार्टी संगठनात्मक रूप से सुधरने की कोशिश कर रही है और ऐसे जॉइनिंग से मनोबल बढ़ता है।

भाजपा के लिए भी यह घटना परोक्ष रूप से झटका है। विपक्षी खेमे में एकता की बातें होती रहती हैं। जब AIMIM जैसे दल विपक्षी दलों के खिलाफ लड़ते दिखते हैं तो भाजपा को फायदा होता है क्योंकि वोट बंटते हैं। आसिम वकार का कहना है कि असली दुश्मन भाजपा है और उसके खिलाफ एकजुट होना जरूरी है। अगर कांग्रेस और उसके सहयोगी दल मुस्लिम वोटरों के बीच बेहतर समन्वय बना पाते हैं तो भाजपा की रणनीति प्रभावित हो सकती है।

यूपी में मुस्लिम आबादी कई सीटों पर निर्णायक भूमिका निभाती है। ऐसे में विपक्षी दलों का मजबूत होना भाजपा के लिए चुनौती बढ़ाता है। यह घटना यूपी की सियासत में समीकरण बदलने की दिशा दिखाती है। 2027 के चुनाव अभी दूर हैं लेकिन पार्टियां अपनी तैयारियां तेज कर रही हैं। AIMIM के लिए यह एक चेतावनी है कि आंतरिक असंतोष और रणनीति पर सवाल उठ रहे हैं।

ओवैसी ने अभी तक इस पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है। कांग्रेस इसे अपनी बढ़ती स्वीकार्यता का प्रमाण मान रही है। भाजपा इस घटना को विपक्षी दलों के अंदरूनी झगड़े के रूप में पेश कर सकती है लेकिन लंबे समय में अगर विपक्ष एकजुट होता है तो सत्ताधारी दल के लिए मुश्किलें बढ़ेंगी।

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