साहिया’ के सर्टिफिकेट पर विवाद, CBFC से प्रोड्यूसर ने पूछा- आखिर दिक्कत क्या है?

संजय शर्मा ने फिल्म पर लगे नक्सलवाद के आरोप को पूरी तरह गलत बताया. उन्होंने कहा, '''सहिया' असल में एक खूबसूरत लव स्टोरी है, जो नक्सलवाद और पुलिस के संघर्ष के बीच फंसे एक आदिवासी के प्यार की कहानी दिखाती है.

4पीएम न्यूज नेटवर्क: संजय शर्मा ने फिल्म पर लगे नक्सलवाद के आरोप को पूरी तरह गलत बताया. उन्होंने कहा, ”’सहिया’ असल में एक खूबसूरत लव स्टोरी है, जो नक्सलवाद और पुलिस के संघर्ष के बीच फंसे एक आदिवासी के प्यार की कहानी दिखाती है.

फिल्म ‘साहिया’ के प्रोड्यूसर संजय शर्मा इन दिनों अपनी फिल्म को सेंसर सर्टिफिकेट दिलाने के लिए मुश्किल दौर से गुजर रहे हैं. फिल्म की कहानी छत्तीसगढ़ के जंगलों और आदिवासी समाज के बीच बुनी गई एक प्रेम कहानी है लेकिन संजय शर्मा ने कहा कि सीबीएफसी ने फिल्म पर नक्सलवाद से जुड़े होने का आरोप लगाकर इसे पास करने में अड़चन पैदा कर दी है.

प्रोड्यूसर ने नाराजगी जताते हुए कहा कि फिल्म में कहीं भी नक्सलवाद को बढ़ावा नहीं दिया गया बल्कि इसके उलट पूरी कहानी हिंसा के खिलाफ है. उन्होंने कहा कि अगर रिव्यू कमेटी भी फिल्म को पास नहीं करती है तो वह कोर्ट का दरवाजा खटखटाएंगे और उन्हें पूरा भरोसा है कि अदालत फिल्म को देखेगी और उसे पास करेगी.

आरोप पूरी तरह गलत हैं

संजय शर्मा ने फिल्म पर लगे नक्सलवाद के आरोप को पूरी तरह गलत बताया. उन्होंने कहा, ”’सहिया’ असल में एक खूबसूरत लव स्टोरी है, जो नक्सलवाद और पुलिस के संघर्ष के बीच फंसे एक आदिवासी के प्यार की कहानी दिखाती है.

फिल्म का मकसद नक्सलवाद को दिखाना या उसका समर्थन करना नहीं है बल्कि फिल्म में एक आम आदमी नक्सली से चीख-चीखकर कहता है कि हिंसा किसी समस्या का समाधान नहीं है और बंदूक कोई रास्ता नहीं है. पूरी फिल्म का आधार प्यार और इंसानी रिश्ते हैं, इसलिए इसे नक्सलवाद से जोड़ना मेरी समझ से परे है.”

जंगलों में हुई शूटिंग

उन्होंने कहा, ”फिल्म की शूटिंग छत्तीसगढ़ के जंगलों और आदिवासी इलाकों में की गई है. मैंने जानबूझकर फिल्म को वास्तविक लोकेशन पर शूट किया ताकि कहानी बनावटी न लगे. अगर फिल्म में जंगल, झरने, नदियां और आदिवासी लोगों के घर दिखाए जा रहे हैं तो उसके लिए असली लोकेशन का इस्तेमाल करना जरूरी था. अब मुझे लगता है कि यही लोकेशन फिल्म के लिए परेशानी की वजह बन गई है.

अगर कोई फिल्ममेकर आदिवासी इलाकों में जाकर वहां के लोगों और उनकी जिंदगी को समझते हुए फिल्म बनाता है तो उसे प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, न कि उसकी फिल्म को इसी वजह से शक की नजर से देखा जाना चाहिए.”

उत्तर प्रदेश में शूटिंग होने पर मिलता सर्टिफिकेट

संजय शर्मा ने सेंसर बोर्ड से जुड़े एक सीनियर अधिकारी के साथ हुई बातचीत का भी जिक्र किया. उन्होंने बताया कि एक अधिकारी ने उनसे कहा था कि अगर फिल्म की शूटिंग उत्तर प्रदेश में हुई होती तो वह इस समय फिल्म को सर्टिफिकेट दे देते. उन्होंने कहा, ”यह बात सुनकर मैं हैरान रह गया. अगर कहानी और फिल्म वही है लेकिन सिर्फ शूटिंग की जगह बदल जाने से फिल्म का मतलब कैसे बदल सकता है?

उत्तर प्रदेश में शूट करने पर फिल्म में नक्सलवाद नजर नहीं आता लेकिन झारखंड या छत्तीसगढ़ जैसे आदिवासी और कभी नक्सल प्रभावित माने जाने वाले इलाकों में शूट करने की वजह से उसी फिल्म पर सवाल उठता है, तो यह सोचने वाली बात है. मुझे इस बात की चिंता है कि कहीं ऐसी सोच की वजह से आदिवासी इलाकों को फिल्मों की शूटिंग से ही दूर न कर दिया जाए.”

Related Articles

Back to top button