राहुल की भविष्यवाणी की उलटी गिनती शुरू ?

  • बंगाल से बिहार तक पक रही है सियासी बिरयानी
  • टीएमसी बागियों ने चुना तीसरा रास्ता
  • ममता के आगे बागियों की नहीं चली
  • एकनाथ शिंदे की तर्ज पर नहीं कर पाए मूल पार्टी पर कब्जा

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। राजनीति में कई बार जो दिखाई देता है असली कहानी उससे बिल्कुल अलग होती है। राजनीतिक सुर्खियां बता रही है कि तृणमूल कांग्रेस के बागी सांसदों ने पार्टी छोड़ दी। विरोधी पक्ष इसे ममता बनर्जी के लिए झटका बता रहे हैं। लेकिन राजनीतिक गलियारों में एक दूसरा सवाल तेजी से घूम रहा है कि अगर बागियों का मकसद सिर्फ टीएमसी को नुकसान पहुंचाना था तो फिर यह लोग भाजपा में क्यों नहीं गए? अगर महत्वाकांक्षा सबसे बड़ी थी तो फिर अलग पार्टी बनाकर खुद को नया नेता क्यों नहीं घोषित किया? आखिर ऐसा क्या है कि बंगाल के बागियों ने एक अपेक्षाकृत छोटी और नई राजनीतिक पार्टी का दामन थामना ज्यादा मुफीद समझा? यहीं से शुरू होती है उस राजनीतिक बिरयानी की कहानी जिसकी खुशबू सिर्फ कोलकाता तक सीमित नहीं है। इसकी आंच पटना दिल्ली और लखनऊ तक महसूस की जा रही है।

बागी सांसदों की अपनी अलग-अलग राय

टीएमसी सांसद असित मल ने पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) में चल रही राजनीतिक उथल-पुथल पर अपनी बात रखते हुए कहा है कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि जिस पार्टी ने राज्य में 15 सालों तक राज्य किया आज वह हाशिए पर खड़ी है। आज वो पार्टी विश्वसनीयता की लड़ाई लड़ रही है और उसे कोई पूछने वाला नहीं है। अब ऐसी स्थिति में टीएमसी का भविष्य कैसा रहता है। इस पर सभी की निगाहें टिकी रहेंगी। इसके अलावा, जब उनसे सवाल किया गया कि टीएमसी में चल रहे राजनीतिक घमासान का जिम्मेदार अभिषेक बनर्जी है तो इस पर उन्होंने कहा कि नहीं ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। हम अभिषेक बनर्जी को इस पूरे राजनीतिक घमासान का जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते हैं। हमने अपनी खुद ग्रुप में अलग पार्टी में शामिल होने का फैसला किया। लिहाजा इस पूरे मामले में अभिषेक बनर्जी की कोई भूमिका नहीं है। उन्होंने एनसीपीसीआई के साथ गठबंधन को लेकर भी अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि हम लोगों ने एक समूह के रूप में पार्टी में शामिल होने का फैसला किया है। अब आगे क्या फैसला किया जाएगा। इस पर जल्द ही पूरी रूपरेखा तैयार कर ली गई है। फिलहाल तो विभिन्न प्रकार के बिंदुओं को लेकर चर्चाओं का दौर जारी है। टीएमसी सांसद शताब्दी रॉय ने टीएमसी में चल रहे राजनीतिक उठापटक पर भी अपनी बात रखते हुए यह स्पष्ट कर दिया कि हम आगामी दिनों में एनडीए को खुलकर सपोर्ट करेंगे। हमें एनडीए को सपोर्ट करने में कोई गुरेज नहीं है। अब आगे क्या फैसला करना है यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा। फिलहाल इस पर किसी भी प्रकार की टिप्पणी करना मुश्किल है। कुल मिलाकर, अभी सबकुछ समय पर छोड़ दिया गया है। समय की गतिविधियों को देखते हुए ही आगे कोई भी फैसला लिया जा सकता है।

राजनीतिक प्रयोगशाला की कहानी

इसलिए यह केवल टीएमसी बनाम बागी की कहानी नहीं है। यह उस राजनीतिक प्रयोगशाला की कहानी है जहां 26 के बंगाल चुनाव और 29 की राष्ट्रीय राजनीति के लिए नए फार्मूले तैयार किए जा रहे हैं। कौन किसके साथ जाएगा कौन किसके खिलाफ खड़ा होगा और कौन आखिरी समय में किस खेमे में दिखाई देगा यह अभी भविष्य के गर्भ में है। लेकिन इतना जरूर है कि बंगाल से उठी यह हलचल केवल बंगाल की नहीं रह गई है। राजनीतिक बिरयानी चढ़ चुकी है मसाले पड़ चुके हैं आंच तेज हो रही है और दिल्ली से पटना तक हर कोई यह जानना चाहता है कि आखिर इस देगची से निकलने वाला अगला राजनीतिक स्वाद क्या होगा। क्योंकि राजनीति में कभी-कभी असली कहानी वहां नहीं लिखी जाती जहां लोग लड़ते दिखाई देते हैं। असली कहानी वहां लिखी जाती है जहां लोग इंतजार कर रहे होते हैं।

4 वर्ष पहले अस्त्तिव में आई है पार्टी

तृणमूल कांग्रेस के बागी सांसदों का गुट आखिरकार नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया यानी एनसीपीआई में शामिल हो गया। यह वही पार्टी है जिसका अस्तित्व चार साल पहले सामने आया था और जो राष्ट्रीय राजनीति में अभी तक कोई बड़ा प्रभाव नहीं छोड़ पाई है। लेकिन राजनीति में हर फैसला सीटों के हिसाब से नहीं होता। कई फैसले समय के हिसाब से होते हैं। और राजनीति में समय ही सबसे बड़ी पूंजी होता है। यही वजह है कि अब इस घटनाक्रम को केवल दल बदल की साधारण घटना नहीं माना जा रहा। राजनीतिक विश्लेषक इसे भविष्य की किसी बड़ी पटकथा का शुरुआती दृश्य मान रहे हैं। सवाल यह नहीं है कि कुछ सांसद टीएमसी छोड़कर चले गए। सवाल यह है कि वह कहां गए और क्यों गए?

स्पीकर से मिले बागी, अलग बैठने की व्यवस्था की मांग की

लोकसभा में तृणमूल कांग्रेस संसदीय दल के बागियों ने लोकसभा स्पीकर ओम बिरला से मुलाकत कर अपने लिए सदन में अलग बैठने की व्यवस्था की मांग की। सांसदों के इस गुट की अगुवाई चार बार लोकसभा सांसद रहीं डॉ. काकोली घोष दस्तीदार और शताब्दी रॉय कर रही हैं। बागी सांसदों ने लोकसभा स्पीकर को पत्र सौंपकर इस बारे में आधिकारिक अनुरोध किया। बागी सांसदों के एनसीपीआई में शामिल होने के फैसले की पुष्टि करते हुए घोष दस्तीदार ने कहा कि जल्द ही हम अपने भविष्य की योजनाओं को देश की जनता के सामने शेयर करेंगे। इस घटनाक्रम की पुष्टि करते हुए बांकुरा से तृणमूल कांग्रेस के लोकसभा सांसद अरूप चक्रवर्ती ने मीडिया को बताया कि एनसीपीआई पूरे पश्चिम बंगाल में अपने दफ्तर खोलेगी। एनसीपीआई 22 में अस्त्तिव में आयी थी। पार्टी के ऑफिस असम, त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल में हैं। कोलकाता से सटे हावड़ा जिले के बांकरा में भी इसका एक ऑफिस है। बागी सांसदों ने इस कम जानी-पहचानी राजनीतिक पार्टी में शामिल होने का फैसला किया है। इससे पहले बागी सांसदों ने संकेत दिया था कि वे लोकसभा में तृणमूल कांग्रेस के अंदर एक अलग गुट बनाएंगे जैसा पश्चिम बंगाल विधानसभा में किया गया था और उसके बाद एनडीए से समर्थन की अपील करेंगे।

कहानी खत्म नहीं शुरू हुयी है!

दिलचस्प बात यह है कि बंगाल की राजनीति को करीब से देखने वाले कई जानकार दावा कर रहे हैं कि यह कहानी अभी खत्म नहीं बल्कि अभी तो शुरू हुयी है। उनके मुताबिक राजनीतिक रिश्तों के दरवाजे पूरी तरह बंद नहीं हुए हैं। बंगाल की राजनीति में ऐसे कई उदाहरण मौजूद हैं जहां नेता नाराज होकर गए शक्ति प्रदर्शन किया और फिर बदली परिस्थितियों में वापसी भी कर गए। इसलिए यह मान लेना कि यह हमेशा के लिए हुआ राजनीतिक भूल भी साबित हो सकती है। यहीं पर चर्चा राहुल गांधी की उस राजनीतिक सोच तक पहुंचती है जिसमें वे बार-बार विपक्षी राजनीति के पुनर्गठन नए समीकरणों और भाजपा के खिलाफ व्यापक मोर्चेबंदी की बात करते रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक भारतीय राजनीति धीरे धीरे पुराने ढांचे से बाहर निकलकर नए गठबंधनों नए मंचों और नए समीकरणों की तरफ बढ़ रही है। बंगाल में हुआ यह घटनाक्रम उसी लंबी प्रक्रिया की एक कड़ी हो सकता है।

जीत ममता की, बागी नहीं कर पाए पार्टी पर कब्जा

बागियों के इस मूव को राजनीतिक जानकार ममता बनर्जी की जीत के तौर पर देख रहे हैं और उनका मानना है कि ममता ने बहुत ही सूझबूझ के साथ इस पूरे मामले को टैगल किया। आखिर संख्या बल के हिसाब से बागी पूरी ताकत में थे और उन्हें टीएमसी पर कब्जा करने में कोई दिक्कत भी पेश नहीं आनी चाहिए थी। लेकिन पार्टी के संविधान और ममता बनर्जी की सूझबूझ के चलते कदम वापस खींचने पड़े। जिस प्रकार महाराष्ट्र में बागियों ने मूल पार्टी पर ही कब्जा कर लिया और उद्धव ठाकरे को शिवसेना का नाम शिवसेना यूबीटी करना पड़ा। ऐसा पश्चिम बंगाल में नहीं हो पाया। तृणमूल कांग्रेस के संविधान के अनुसार पार्टी के भीतर निर्णय लेने वाली सर्वोच्च संस्था की पहचान पहले राज्य कार्यकारी समिति (स्टेट एग्जीक्यूटिव कमेटी) के रूप में की गई थी। हालांकि बाद में संविधान में संशोधन के बाद राष्ट्रीय कार्यसमिति को पार्टी की सर्वोच्च निर्णय लेने वाली संस्था का दर्जा दिया गया। यह समिति काफी हद तक पार्टी अध्यक्ष विशेष रूप से पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के इर्द-गिर्द केंद्रित मानी जाती है। पार्टी के मूल और संशोधित दोनों संविधान के अनुसार तृणमूल कांग्रेस में संगठनात्मक पदाधिकारियों का प्रभाव चुने हुए जनप्रतिनिधियों यानी सांसदों और विधायकों की तुलना में अधिक ताकतवर है।

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