मीरजापुर में ‘फर्जी निस्तारण’ का खेल? रैंकिंग बढ़ाने की होड़ में सवालों के घेरे में देहात कोतवाली पुलिस

मीरजापुर देहात कोतवाली पुलिस पर आईजीआरएस शिकायतों के फर्जी निस्तारण का आरोप लगा है। पीड़ित ने दरोगा पर गलत रिपोर्ट लगाने, नाम बदलने और कार्रवाई न करने का आरोप लगाया। वायरल ऑडियो के बाद मामला चर्चा में है।

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क: उत्तर प्रदेश में सरकारी शिकायतों के त्वरित समाधान के लिए बनाई गई आईजीआरएस व्यवस्था अब कई जिलों में सवालों के घेरे में दिखाई देने लगी है। मीरजापुर के देहात कोतवाली क्षेत्र से सामने आया एक मामला इस पूरे सिस्टम की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। आरोप है कि बेहतर रैंकिंग और आंकड़ों में सुधार दिखाने के लिए शिकायतों का वास्तविक समाधान करने के बजाय फर्जी निस्तारण रिपोर्ट लगाकर मामलों को बंद किया जा रहा है।

देहात कोतवाली पुलिस पर यह आरोप कोई पहली बार नहीं लगा है। इससे पहले भी कई मामलों में शिकायतकर्ताओं ने गलत रिपोर्ट लगाकर मामले को निस्तारित करने की बात कही थी। अब एक बार फिर चिन्दलिख दूबेपुर गांव के मामले ने पुलिस की कार्यप्रणाली को चर्चा में ला दिया है।

Mirzapur Kotwali controversy

पीड़ित ने लगाया गलत रिपोर्ट लगाने का आरोप

चिन्दलिख दूबेपुर गांव निवासी अरविंद कुमार दुबे ने आरोप लगाया है कि उनकी शिकायतों पर निष्पक्ष कार्रवाई करने के बजाय लगातार गलत रिपोर्ट लगाई जा रही है। उनका कहना है कि उन्होंने गांव के ही श्रवण कुमार दुबे के खिलाफ जान-माल के खतरे, पीछा करने और धमकी देने की शिकायत की थी। इसके साथ मोबाइल लोकेशन और अन्य तकनीकी साक्ष्यों की जांच कराने की मांग भी की गई थी, ताकि पूरे मामले की सच्चाई सामने आ सके।

अरविंद दुबे के अनुसार, उन्होंने अपने प्रार्थना पत्र में 18 जुलाई 2025 को हुई मारपीट और 9 जनवरी 2026 को कट्टा लेकर घर पहुंचकर जान से मारने की धमकी देने जैसी घटनाओं का भी उल्लेख किया था। लेकिन कार्रवाई के बजाय पुलिस लगातार मामले को हल्का करने और शिकायत को दूसरी दिशा में मोड़ने का प्रयास करती रही।

“जिसका नाम नहीं दिया, उसे रिपोर्ट में शामिल कर दिया”

पीड़ित का सबसे बड़ा आरोप यह है कि पुलिस ने शिकायत पत्र में जिन लोगों का नाम नहीं था, उन्हें रिपोर्ट में शामिल कर दिया, जबकि जिन पर सीधे आरोप लगाए गए थे, उनके नाम तक हटा दिए गए। इस पूरे मामले में हल्का दरोगा राम प्रताप यादव की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं। पीड़ित का कहना है कि ऑडियो और वीडियो साक्ष्य देने के बावजूद न तो निष्पक्ष जांच हुई और न ही आरोपियों के खिलाफ कोई प्रभावी कार्रवाई की गई। इतना ही नहीं, शिकायतकर्ता ने यह भी आरोप लगाया कि पुराने फोटो लगाकर और तथ्यों को बदलकर निस्तारण रिपोर्ट तैयार की गई। इससे उन्हें आर्थिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित होना पड़ा।

Mirzapur Kotwali controversy

वायरल ऑडियो के बाद बढ़ी चर्चा

मामले ने तब और तूल पकड़ लिया जब शिकायतकर्ता और संबंधित दरोगा के बीच बातचीत का एक ऑडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने लगा। हालांकि वायरल ऑडियो की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन इसके बाद पुलिस की कार्यशैली को लेकर स्थानीय स्तर पर चर्चाएं तेज हो गई हैं। गांव और आसपास के इलाकों में लोग यह सवाल उठा रहे हैं कि आखिर शिकायतों के निष्पक्ष समाधान के बजाय मामलों को जल्द बंद करने की जल्दबाजी क्यों दिखाई जा रही है। लोगों का कहना है कि यदि शुरुआती स्तर पर निष्पक्ष जांच होती, तो मामला इतना विवादित नहीं बनता।

आईजीआरएस व्यवस्था पर भी उठे सवाल

आईजीआरएस पोर्टल को आम लोगों की शिकायतों के पारदर्शी समाधान के लिए बनाया गया था। लेकिन मीरजापुर के इस मामले ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या कई जगहों पर सिर्फ रैंकिंग सुधारने और बेहतर प्रदर्शन दिखाने के लिए शिकायतों का कागजी निस्तारण किया जा रहा है। स्थानीय लोगों का मानना है कि यदि उच्च अधिकारी मामले का स्वतंत्र संज्ञान लेकर निष्पक्ष जांच कराएं, तो पूरे विवाद की सच्चाई सामने आ सकती है।

पुलिस की कार्यशैली पर बनी हुई है बहस

अरविंद दुबे का कहना है कि वह थाने से लेकर एसपी कार्यालय तक न्याय की गुहार लगा चुके हैं, लेकिन अब तक कोई ठोस राहत नहीं मिली। ऐसे में यह मामला सिर्फ एक व्यक्ति की शिकायत तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि पुलिस निस्तारण प्रणाली की पारदर्शिता और जवाबदेही पर भी सवाल खड़े कर रहा है। फिलहाल इस पूरे मामले में पुलिस विभाग की ओर से कोई आधिकारिक विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। लेकिन देहात कोतवाली क्षेत्र में यह प्रकरण चर्चा का बड़ा विषय बना हुआ है।

रिपोर्ट – संतोष देव गिरी

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