इस्तीफे के बाद धर्मेंद्र प्रधान ने दे दिया ऐसा बयान मच गया बवाल, संजय राउत ने लगा दी क्लास
नीट परीक्षा से जुड़े विवाद और छात्रों के आंदोलन के बीच शिक्षा मंत्रालय पर भी लगातार सवाल उठ रहे थे। इसी माहौल के बीच प्रधान ने 25 जुलाई को केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया था।

4पीएम न्यूज नेटवर्क: इन दिनों धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद से सियासी पारा और चढ़ा हुआ है। भले ही धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दे दिया हो लेकिन सवालों का सिलसिला अभी भी जारी है।
हालांकि इस्तीफे को लेकर पहले तो चुप्पी साधी लेकिन अब अपना बयान दिया है। दरअसल भाजपा सांसद और पूर्व शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने आखिरखार अपने पद से इस्तीफा देने पर चुप्पी तोड़ दी है।
धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा ऐसे समय आया था जब नीट परीक्षा को लेकर छात्रों के बीच भारी नाराजगी थी। दिल्ली के जंतर-मंतर समेत कई जगहों पर विरोध-प्रदर्शन हुए थे। नीट परीक्षा से जुड़े विवाद और छात्रों के आंदोलन के बीच शिक्षा मंत्रालय पर भी लगातार सवाल उठ रहे थे। इसी माहौल के बीच प्रधान ने 25 जुलाई को केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया था।
अब इस्तीफे के करीब दो सप्ताह बाद उन्होंने पहली बार इस पूरे घटनाक्रम पर सार्वजनिक रूप से अपनी बात रखी है। उन्होंने कहा कि युवा पीढ़ी की आकांक्षाएं और संकल्प किसी भी मंत्री पद से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हैं, और उन्होंने जोर देकर कहा कि देश के हित हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता हैं। उन्होंने कहा कि उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को युवा पीढ़ी की आकांक्षाओं को समझाने का प्रयास किया था, जिन्होंने बाद में सीधे Gen Z से भी बातचीत की।
दरअसल पश्चिमी ओडिशा के पद्म पुरस्कार विजेताओं को सम्मानित करने के लिए आयोजित ‘मातिरा महाका’ कार्यक्रम को संबोधित करते हुए प्रधान ने कहा ‘Gen Z हमारी ही है। कुछ लोगों ने जेनरेशन जेड को गुमराह करने की कोशिश की। मेरे लिए मंत्री पद प्रतिष्ठा का मुद्दा बिल्कुल नहीं था…
नई पीढ़ी के संकल्प के आगे मेरी जिम्मेदारी कुछ भी नहीं है।‘ उन्होंने आगे कहा ‘मैंने प्रधानमंत्री को नई पीढ़ी के संकल्प की वास्तविकता समझाने का प्रयास किया, जिन्होंने बाद में सीधे ‘जेनरेशन जेड’ से बातचीत की। देश के हित से बढ़कर कुछ भी महत्वपूर्ण नहीं है। हम युवा पीढ़ी की आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।‘
कुल मिलाकर उन्होंने कहा कि जेन-जी हमारे बच्चे हैं, वे देश को आगे ले जाएंगे। लेकिन आंदोलन के दौरान कुछ लोगों ने उन्हें गुमराह या भड़काया था। उन्होंने यह भी बताया कि उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बात करके इस्तीफा देने का फैसला किया ताकि युवाओं की भावना का सम्मान हो सके। उनके मुताबिक मंत्री पद उनके लिए कोई इज्जत का सवाल नहीं था। खैर मंत्री जी कुछ भी कहा रहे हों लेकिन असलियत क्या है किस तरह से इस्तीफा सिया ये आप सभी को बखूबी पता है। लेकिन उनका बयान आते ही सियासी गलियारों में चर्चाओं का बाजार गर्म है।
इसी के साथ ही कांग्रेस सांसद प्रमोद तिवारी ने बीजेपी सांसद धर्मेंद्र प्रधान को लेकर कहा कि मुझे लगा था कि इस इस्तीफे के बाद उन्हें सद्बुद्धि आएगी, लेकिन ऐसा लगता है कि वह अभी भी किसी दूसरी ही दुनिया में जी रहे हैं। आपके कार्यकाल में शिक्षा का व्यावसायीकरण हुआ। पैसे लेकर प्रश्नपत्र लीक किए गए। उन्होंने कहा कि उनके कार्यकाल के दौरान शिक्षा व्यवस्था की स्वतंत्रता को पूरी तरह कमजोर कर दिया और उसे आरएसएस के प्रभाव में ला दिया। मैं सिर्फ इतना कहना चाहता हूं कि आपको बहुत पहले ही इस्तीफा दे देना चाहिए था।
प्रधान के इस बयान पर शिवसेना सांसद संजय राउत ने प्रधान पर पलटवार करते हुए निशाना साधा है। संजय राउत ने कहा कि Gen Z को पूर्व शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के शिक्षा मंत्रालय चलाने के तरीके, पेपर लीक और ऐसे ही अन्य मुद्दों को लेकर भड़काया गया था।
राउत ने आगे कहा कि उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, नितिन नबीन और आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के साथ बैठकर यह तय करना चाहिए कि Gen Z को गुमराह किया गया था या भड़काया गया था। अगर Gen Z को गुमराह किया गया, तो उन्हें किसने गुमराह किया? अगर उन्हें भड़काया गया, तो किसने भड़काया? इन सवालों के जवाब दिए जाने जरूरी हैं।
राउत ने आगे कहा कि बीजेपी के नेताओं को जेन-जी को ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ कहने या गुमराह बताने के बजाय उनसे बात करनी चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया कि प्रधानमंत्री मोदी, अन्य नेता और आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत बैठकर तय करें कि जेन-जी को गुमराह किया गया या भड़काया गया। अगर गुमराह किया तो किसने किया, और अगर भड़काया तो किसने किया। ये सवाल जवाब मांगते हैं। राउत ने अपने बयान में साफ़ तौर पर मोदी और मोहन भागवत को टरटेग किया और चेतावनी दी।
दरअसल राउत ने मोहन भागवत को इस लिए टारगेट किया क्योंकि अभी हाल ही में मुंबई में एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए, मोहन भागवत ने जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारियों से बातचीत शुरू करने में सरकार की देरी के बारे में पूछे जाने पर कहा, “कमियां तो रही हैं।”
उन्होंने तर्क दिया कि विरोध प्रदर्शन लोकतांत्रिक संवाद का एक वैध रूप है, युवा प्रदर्शनकारियों को राष्ट्र-विरोधी करार देने के खिलाफ चेतावनी दी और इस बात पर जोर दिया कि भारत के एजुकेशन सिस्टम को लेकर चिंताएं वास्तविक हैं और उन्हें खारिज करने के बजाय उनसे बातचीत करने की जरूरत है।
आरएसएस प्रमुख ने कहा, “जब कोई ऐसी घटना घटित होती है जो नहीं होनी चाहिए, तो स्पष्ट है कि कोई गलती हुई है। कमी तो रही है। ऐसा होना चाहिए था। हमें यह भी देखना चाहिए कि अगर जेन-जी विरोध कर रही है, तो वह हमारे विरोध में नहीं है। वह किसी समस्या का सामना कर रही है। उस समस्या का समाधान ढूंढना होगा।”
आरएसएस और बीजेपी के बीच संबंधों से परिचित लोगों का कहना है कि भागवत के हस्तक्षेप को संघ की वैचारिक मार्गदर्शक के रूप में लंबे समय से चली आ रही भूमिका के संदर्भ में सबसे अच्छी तरह समझा जा सकता है, जो समय-समय पर इसकी राजनीतिक शाखा को सही दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता है। खैर Gen-Z को लेकर सभी अपनी-अपनी प्रतिक्रिया दे रहे हैं।
कोई GEN-Z के आंदोलन को सही बता रहा है तो कोई इसे गलत बता रहा है। लेकिन सच बात तो ये है कि सत्ताधारी दल भाजपा और आरएसएस दोनों छात्रों की एकता से घबरा चुके हैं। तभी एक तरफ जहां पीएम मोदी रील के बाद रील बना रहे हैं तो वहीं दूसरी तरफ RSS प्रमुख मोहन भागवत गेन-Z से संवाद कर रहे हैं। ऐसे में धर्मेंद्र प्रधान का इस तरह इस्तीफे के बाद बयान आना कि ‘छात्रों को गुमराह किया गया’ . ये बयान भाजपा पर एक बार फिर भारी पड़ सकता है।



