अमेरिका से तेल खरीद महंगा सौदा? 80 हजार करोड़ नुकसान का दावा

पिछले कुछ दिनों से ढोल-नगाड़े बजाए जा रहे हैं कि प्रधानमंत्री मोदी ने अमेरिका के साथ एक ऐतिहासिक ट्रेड डील कर ली है।

4पीएम न्यूज नेटवर्क: पिछले कुछ दिनों से ढोल-नगाड़े बजाए जा रहे हैं कि प्रधानमंत्री मोदी ने अमेरिका के साथ एक ऐतिहासिक ट्रेड डील कर ली है।

गेादी मीडिया इसे मास्टरस्ट्रोक बता रहा है, लेकिन जैसे ही इस समझौते के कागज़ सामने आए हैं, ना सिर्फ देश के पैरों तले ज़मीन खिसक गई है बल्कि ये बात भी पूरी तरह से साबित हो गई है कि ये ट्रेड डील भारत के लिए जी का जंजाल बन सकती है। एक ओर जहां बीजेपी सरकार का दावा था कि हम अमेरिका को झुका देंगे, लेकिन ट्रेड डील की साझा समझौता सामने आने के बाद कांग्रेस का आरोप है कि हमने घुटने टेक दिए हैं। क्या आपको पता है कि सिर्फ तेल के खेल में भारत को 80,000 करोड़ रुपये का सीधा घाटा होने जा रहा है? और वो किसान, जिन्हें इस डील में सबसे ज्यादा फायदा होने का दावा किया जा रहा है था विपक्ष के अनुसार ये किसानों की बर्बादी का डेथ वारंट है।

पिछले हफ्ते अचानक अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का एक ट्वीट वायरल हुआ था, जिसमें दावा किया गया था कि उनकी भारत से प्रधानमंत्री से ट्रेड डील को लेकर बातचीत हुइ्र है और अमेरिका और भारत ट्रेड डील करने को राजी हो गए हैं। ट्रंप का दावा था कि पीएम मोदी की विशेष पेशकश पर भारत पर लगने वाली टैरिफ को 25 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत कर दिया गया है। आपको बात दें कि बाद में पीएम मोदी ने भी ट्वीट कर इसकी पुष्टि की थी और ये भारत और मेक इन इंडिया के लिए बहुत बड़ा कदम बताया था लेकिन इसके बाद से ही विपक्ष सवाल उठाने लगा और कहना शुरु कर दिया था कि इस ट्रेड डील में किसानों को भयंकर नुकसान हो सकता है लेकिन क्योंकि पहले ट्रेड डील के दस्तावेज सामने नहीं आए थे तो ऐसे में यह बता पाना और कह पाना मुश्किल था कि क्या सही है और क्या गलत है लेकिन अब हालात बदल चुके हैं।

कल रात को अमेरिका-भारत ट्रेड डील की संयुक्त रुप से एक छोटा सा समझौता ज्ञापन सामने आया है। जिसमें भारत को बड़ा घाटा होता दिख रहा है और विपक्ष का दावा है कि ट्रेड डील का सीधा नुकसान भारतीय जनता पर होगा। विपक्ष का कहना है कि सिर्फ अगर तेल को जोड़ लंे तो सालाना नुकसान 80 हजार करोड़ का होगा। आपको बता दें कि अभी तक भारत सस्ता तेल खरीद रहा था, जिससे हमारी अर्थव्यवस्था को थोड़ी राहत थी। लेकिन विपक्ष का कहना है कि अमेरिका के दबाव में आकर इस डील में एक ऐसी शर्त जोड़ी गई है जिससे भारत अब अमेरिका से महंगा तेल और गैस खरीदने को मजबूर होगा।

आंकड़ों की गणित समझिए। अमेरिकी तेल की ढुलाई और उसकी कीमत रूस या मिडिल ईस्ट के मुकाबले कहीं ज्यादा पड़ती है। जानकारों का कहना है कि अगले पांच सालों में अमेरिका से 500 अरब डॉलर की ऊर्जा खरीद का जो वादा मोदी सरकार ने किया है, उसकी वजह से भारत के सरकारी खजाने पर 80,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा। ये पैसा किसकी जेब से जाएगा? आपकी और हमारी! पेट्रोल-डीजल के दाम कम होने के बजाय और बढ़ेंगे हालांकि सरकार ने वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए ₹80,000 करोड़ का विनिवेश और संपत्ति मुद्रीकरण का लक्ष्य भी रखा है, जिसे लेकर संसद में चर्चा हो रही है। सरकार इसको दूसरे तरीके से कवर भी कर सकती है लेकिन ये तय है कि रुस अमेरिका और वेनेजुएला ट्रेड डील में भारत का नुकसान होगा।

फरवरी 2026 की स्थिति के अनुसार, रूस अपने यूराल क्रूड तेल को लगभग 61 से 65 डॉलर प्रति बैरल की रेंज में बेच रहा है। वहीं, अमेरिका का वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट क्रूड लगभग 61 से 62 डॉलर प्रति बैरल के आसपास कारोबार कर रहा है। रूस, भारत और चीन जैसे देशों को छूट के साथ तेल की आपूर्ति कर रहा है। रूस द्वारा भारत को दिया जाने वाला तेल आमतौर पर लगभग 50-55 डॉलर से शुरू होकर परिवहन और बीमा लागत के साथ 62-65 डॉलर प्रति बैरल तक पड़ता है। अ अमेरिकी तेल की कीमतें वर्तमान में लगभग 51-62 डॉलर प्रति बैरल की सीमा में कारोबार कर रही हैं, जो वैश्विक बाजार के रुझानों के अनुरूप है। लेकिन इसको भारत तक आने में काफी पैसे खर्च होंगे। ऐसे में सालाना लगभग 9 से 11 विलियन का अतिरिक्त बोझ भारत पर पड़ सकता है। ये वही 80 हजार करोड़ रुपए का नुकसान है, जिसको विपक्ष कह रहा है।

संजय सिंह का दावा है कि हर साल लगभग 80 हजार करोड़ रुपए का नुकसान है लेकिन सिर्फ मामला यहीं नहीं रुका है बल्कि ये बात भी खुलकर सामने आ गई है कि किसानों को भी इस ट्रेड डील से न सिर्फ नुकसान है बल्कि भारतीय बाजार पर अमेरिका का भी कब्जा हो सकता है, ऐसी आकांशाएं विपक्ष की ओर जताई जा रही हैं।

कल अमेरिका-भारत की समझौता ज्ञापन सामने आने के बाद पीयूष गोयल जी कह रहे हैं कि किसान सुरक्षित हैं। लेकिन क्या वाकई ऐसा है। विपक्ष का कहना है कि इस डील के तहत भारत ने अमेरिका के बादाम, अखरोट, सेब और दालों पर से आयात शुल्कया तो हटा दी है या बेहद कम कर दी है। इसका मतलब समझिए। अब अमेरिका का सस्ता और मशीनों से पैदा किया गया अनाज भारतीय मंडियों में भर जाएगा। जब विदेशी सेब और बादाम सस्ते दाम पर बिकेंगे, तो हिमाचल और कश्मीर के किसान कहां जाएंगे? जब अमेरिका का सोया तेल भारतीय बाजार पर कब्जा कर लेगा, तो हमारे तिलहन किसान क्या करेंगे? सरकार ने चावल और गेहूं को बचाने का नाटक तो किया, लेकिन सहायक फसलों की बलि चढ़ा दी। ये डील भारतीय किसानों की कमर तोड़ने के लिए बनाई गई है ताकि विदेशी एग्रो-कंपनियां भारत के पेट पर कब्जा कर सकें।

सरकार ने एक बड़ा आंकड़ा दिया है कि 30 ट्रिलियन डॉलर का बाजार हो जाएगा। सुनने में कितना अच्छा लगता है, लेकिन हकीकत ये है कि अमेरिका ने हमारे कपड़ा और चमड़ा उद्योग पर जो टैक्स घटाया है, वो सिर्फ 7 प्रतिश की मामूली कटौती है। जबकि हमने उनके लिए अपना पूरा बाजार खोल दिया। क्योंकि अमेरिकी उत्पादों पर भारतीय टैरिफ जीरो होगी। विपक्ष का कहना है कि अमेरिका ने रेसिप्रोकल टैरिफ के नाम पर भारत को फंसा लिया है। हमने अपने एमएसएमई और छोटे कारोबारियों को सीधे अमेरिकी मल्टीनेशनल कंपनियों के सामने लाकर खड़ा कर दिया है। क्या हमारा एक छोटा बुनकर या लेदर कारोबारी अमेरिका की अरबों डॉलर वाली कंपनियों का मुकाबला कर पाएगा? बिल्कुल नहीं! विपक्ष का दावा है कि ये डील छोटे व्यापारियों को खत्म करने का एक सोची-समझी साजिश है।

पिछले दिनों ट्रंप ने एक आदेश जारी किया कि भारत पर से 25 प्रतिशत टैरिफ हटा दिया गया। वाह! लेकिन ये टैरिफ लगाया किसने था? खुद अमेरिका ने! पहले डंडा मारो, फिर मरहम लगाने का नाटक करो और बदले में भारत के बाजार की चाबियां ले लो। मोदी सरकार बार-बार कहती है कि हम दुनिया की तीसरी बड़ी ताकत बनने जा रहे हैं, लेकिन विपक्ष का आरोप है कि जब व्यापार की बात आती है, तो हम अमेरिका की हर नाजायज शर्त क्यों मान लेते हैं? विपक्ष का सीधा आरोप है कि ये ट्रेड डील कोई जीत नहीं, बल्कि एक आर्थिक सरेंडर है। 80 हजार करोड़ का नुकसान, किसानों की तबाही और मध्यम वर्ग पर टैक्स का बोझ यही है इस डील का असली चेहरा। सरकार आपको आंकड़ों के जाल में फंसाएगी, लेकिन आपको सच पहचानना होगा। कांग्रेस ने नेता जयराम रमेश ने समाझौता ज्ञापन आने के बाद भयंकर सवाल उठाया है।

समझौते की कागज सामने आएं हैं उसमें यह बात बहुत हद तक साफ है कि कहीं न कहीं भारत का घाटा है और ये जब ये बात हर आदमी और नेताओं को समझ में आ सकती है तो क्या सरकार इससे अंजान होगी। अगर नहीं तो फिर ये फैसला ट्रंप दबाव का नतीजा है जैसा कि जयराम रमेश और संजय सिंह कह रहे है।

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