एआई क्रांति का झूठा प्रदर्शन? : गलगोटिया यूनिवर्सिटी ने कटवा दी देश की नाक

27 देशों के करोड़ों लोगों ने लाइव देखी घनघोर बेईज्जती

  • गल्गोटिया यूनिवर्सिटी ने चीनी यूनिट को भारतीय नवाचार बताकर किया पेश ?

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
लखनऊ। भारत को एआई सुपरपॉवर बनाने के दावों के बीच सबसे बड़ा झटका किसी विदेशी कंपनी ने नहीं बल्कि भारत की अपनी ही एक निजी यूनिवर्सिटी ने दे दिया। इंडिया एआई इम्पैक्ट सम्मिट 2026 के मंच पर गलगोटिया यूनिवर्सिटी ने जिस रोबोटिक डॉग को भारत की तकनीकी ताकत का प्रतीक बनाकर पेश किया वही कुछ घंटों के भीतर भारत की तकनीकी साख पर सवाल बन गया।
जिस मशीन को भारतीय एआई क्रांति का चेहरा बताया जा रहा था उसकी सच्चाई सामने आते ही पूरे आयोजन पर अविश्वास का साया छा गया। स्थिति इतनी असहज हो गई कि सम्मेलन के दौरान ही गलगोटिया के स्टाल की लाइट बंद करनी पड़ी। जो रोबोटिक डॉग कुछ समय पहले तक कैमरों और प्रशंसा का केंद्र था वही अचानक चुपचाप अंधेरे में खड़ा कर दिया गया। सवाल उठने लगे क्या यह सच में भारतीय नवाचार था या केवल एक तकनीकी भ्रम जिसे भारत की उपलब्धि बताकर पेश किया जा रहा था?

चीनी तकनीक का साया

चीन पहले से ही रोबोटिक्स और एआई हार्डवेयर के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर मजबूत स्थिति में है। चीनी कंपनियां जैसे युनीट्री रोबोटिक और डीप रोबोटिक ऐसे रोबोटिक डॉग बना रही हैं जिनका इस्तेमाल सेना सुरक्षा और औद्योगिक कार्यों में किया जा रहा है। ऐसे में जब भारत के मंच पर प्रदर्शित मॅाडल की बनावट और मूवमेंट चीनी माडलों से मिलती जुलती दिखाई दी तो सवाल और गहरे हो गए।

नवाचार या आयातित प्रदर्शन?

सम्मिट में गलगोटिया यूनिवर्सिटी द्वारा प्रदर्शित रोबोटिक डॉग को भारत की एआई क्षमता का उदाहरण बताया गया। इसे देखकर कई लोगों ने इसे भारतीय तकनीकी प्रगति का प्रतीक माना। लेकिन जैसे ही तकनीकी जानकारों ने इसकी बारीकियों को देखा संदेह गहराने लगा। चीन तो मानो इस ताक में बैठा था और एक युनिवर्सिटी की गल्ती ने उसे बैटिंग करने का पूरा मौका दे दिया। चीन ने ट्वीट किया और व्यंग कसा। चीन ने आरोप लगाये कि यह पूरी तरह भारतीय निर्माण नहीं था बल्कि विदेशी तकनीक पर आधारित एक मॉडल था। यदि यह सच है तो यह सवाल बेहद गंभीर हो जाता है क्या भारत के नाम पर विदेशी तकनीक का प्रदर्शन किया जा रहा था?

गलगोटिया के प्रदर्शन ने पूरे सम्मिट को संदेह में डाला

गल्गोटिया यूनिवर्सिटी का यह प्रदर्शन केवल एक स्टॉल तक सीमित नहीं रहा। इसने पूरे सम्मिट की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दिए। लोगों ने सोशल मीडिया पर सवाल उठाए क्या यह सच में भारतीय एआई नवाचार था? अगर नहीं तो इसे भारतीय उपलब्धि क्यों बताया गया? क्या यह केवल प्रचार का हिस्सा था? यह सवाल केवल गलगोटिया यूनिवर्सिटी पर नहीं, बल्कि पूरे आयोजन की पारदर्शिता पर उठने लगे।

गलगोटिया यूनिवर्सिटी ने झुका दिया सर शर्म से

जब पूरी दुनिया भारत की एआई क्षमता को परख रही थी उसी समय गलगोटिया यूनिवर्सिटी की इस हरकत ने भारत को गर्व नहीं बल्कि शर्मिंदगी की स्थिति में ला खड़ा कर दिया है। हर ओर सवाल उठ रहे है कि आखिर युनिवर्सिटी ने ऐसा क्यों किया। अब सवाल सीधा है क्या गलगोटिया यूनिवर्सिटी ने भारत की एआई क्रांति को आगे बढ़ाया या उसे दुनिया के सामने कमजोर साबित कर दिया।

अव्यवस्था ने और बढ़ाई शर्मिंदगी

सम्मिट में शामिल लोगों के मुताबकि आयोजन में भारी अव्यवस्था रही। इस मुद्दे पर सोशल मीडिया पर तो जबर्दस्त रायता फैला हुआ है। हर कोई आयोजन को लेकर सवाल उठा रहा है। पत्रकार, कलमकार से लेकर भविष्य के होनहार छात्र हर कोई यही कह रहा है कि पहले तैयारियों करनी चाहिए थी फिर इस तरह का आयोजन यह स्थिति एक ऐसे आयोजन के लिए बेहद शर्मनाक थी जिसे भारत की तकनीकी ताकत का प्रतीक बताया जा रहा था।

  • रजिस्ट्रेशन के बावजूद लोगों को एंट्री नहीं मिली
  • एंट्री के लिए घंटों लंबी कतारें लगीं
  • कई प्रतिभागी अपने ही स्टाल तक नहीं पहुंच पाए
  • आयोजन स्थल पर वाई-फाई जैसी बुनियादी सुविधा भी उपलब्ध नहीं थी

राहुल गांधी का अटैक ‘एआई नहीं पीआर का आयोजन’

इस पूरे विवाद को राजनीतिक धार तब मिली जब राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पर पोस्ट कर सरकार पर सीधा हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि यह सम्मिट भारत की तकनीकी क्षमता को बढ़ावा देने के बजाय केवल सरकारी छवि सुधारने का प्रयास था। उन्होंने यह भी कहा कि भारत की प्रतिभा और डेटा का उपयोग देश को मजबूत बनाने के बजाय केवल प्रचार के लिए किया जा रहा है। उनके अनुसार यह आयोजन भारत के नवाचार को बढ़ावा देने के बजाय विदेशी तकनीक को प्रदर्शित करने का मंच बन गया। कांग्रेस ने भी अपने आधिकारिक बयान में कहा है कि सरकार ने एआई जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र को गंभीरता से लेने के बजाय इसे मजाक बना दिया।

सबसे गंभीर सवाल यह है

गलगोटिया यूनिवर्सिटी ने चीनी यूनिट को भारतीय नवाचार बताकर क्यो पेश किया? क्या यह केवल प्रदर्शन के लिए आयातित मॉडल था? अगर हां तो इसे भारत की एआई उपलब्धि के रूप में क्यों प्रस्तुत किया गया? यह मामला इसलिए भी संवेदनशील है क्योंकि भारत और चीन के बीच तकनीकी प्रतिस्पर्धा और रणनीतिक तनाव पहले से मौजूद है। भारत जहां आत्मनिर्भर एआई की बात कर रहा है वहीं चीनी तकनीक पर निर्भरता का आरोप इस पूरे नैरेटिव को कमजोर करता है। अगर भारत के एआई मंच पर चीनी तकनीक को भारतीय नवाचार के रूप में दिखाया गया तो यह केवल एक तकनीकी गलती नहीं बल्कि भारत की वैश्विक तकनीकी विश्वसनीयता के लिए बड़ा झटका माना जाएगा।

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