शाहीन प्रकरण से छात्र आंदोलन तक सवालों की बारात
मोदी सरकार की मुश्किलों का सीजन?

- सवाल सरकार से जवाब दे रही पुलिस
4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। दिल्ली इस वक्त सिर्फ देश की राजधानी नहीं है दिल्ली इस वक्त सवालों का ऐसा चौराहा बन चुकी है जहां हर रास्ता एक ही सवाल पर जाकर ठहर रहा है और पूछ रहा है कि आखिकार मोदी सरकार से कहां गल्तियां हो रही है? छात्र आंदोलन के बाद से लगता है कि मोदी सरकार का मुश्किलों का सीजन शुरू हो गया है। विपक्ष चैन से जीने नहीं दे रहा और बीजेपी की आंतरिक राजनीति सुकून से बैठने नहीं दे रही। वहीं विदेश नीति पर उठते सवाल और ईरान अमेरिका युद्ध से उपजी स्थितियां कोढ़ में खाज बनती दिखाई दे रही है। एक तरफ कैमरा लेकर सत्ता से सवाल पूछने वाली दो महिला पत्रकारों का मामला है। दूसरी तरफ अपने भविष्य परीक्षा और रोजगार को लेकर सड़कों पर उतरे छात्र हैं। एक तरफ पुलिस का दावा है कि आंदोलन में आपराधिक रिकॉर्ड वाले लोग शामिल थे दूसरी तरफ उसी पुलिस के फेशियल रिकग्निशन सिस्टम पर ऐसे सवाल उठ गए कि जिन लोगों को कैमरे ने प्रदर्शन स्थल पर मौजूद बताया उनमें से कम से कम 25 लोग उस वक्त जेल में थे। और फिर निशू आजाद के पिता पर हमले का मामला है जिसमें आरोपी स्वतंत्र भारद्वाज को लेकर राजनीतिक संरक्षण के आरोप उठे। अब सवाल यह नहीं है कि सरकार के खिलाफ कौन नारा लगा रहा है। सवाल यह है कि बार बार ऐसे हालात क्यों बन रहे हैं जिनमें सरकार और जनता के बीच संवाद की जगह पुलिस हिरासत एफआईआर और कानून व्यवस्था का नैरेटिव खड़ा दिखाई देने लगता है।
जनता सरकार की साझेदार है या संदिग्ध?
शाहीन का कैमरा पूछ रहा है छात्रों की भीड़ पूछ रही है। निशू आजाद का परिवार पूछ रहा है। अदालत पूछ रही है। मीडिया पूछ रहा है और जनता पूछ रही है? कि क्या लोकतंत्र में सवाल पूछने वाला नागरिक सरकार का साझेदार है या संदिग्ध? यही वह सवाल है जिसका जवाब सिर्फ प्रेस कन्फ्रेंस से नहीं मिलेगा। इसका जवाब कार्रवाई से मिलेगा निष्पक्ष जांच से मिलेगा दोषी पर कार्रवाई से मिलेगा निर्दोष को राहत से मिलेगा और सबसे बढ़कर उस भरोसे से मिलेगा कि सत्ता चाहे जितनी ताकतवर हो सवाल उससे बड़ा है। क्योंकि इतिहास गवाह है कि सरकारें विपक्ष से नहीं जनता के भरोसे के टूटने से कमजोर होती हैं। और अगर मोदी सरकार को अपनी सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत जनता का भरोसा बचाए रखना है तो उसे आज सबसे पहले अपने आसपास उठ रही इन आवाजों को सुनना होगा। क्योंकि सवाल दबाए जा सकते हैं लेकिन सवाल खत्म नहीं होते। और जब सवाल एक पत्रकार के कैमरे से निकलकर छात्र के हाथ में छात्र के हाथ से अदालत में और अदालत से पूरे देश की बहस में पहुंच जाएं तब उसे विरोध नहीं लोकतंत्र का अलार्म समझना चाहिए।
शाहीन-नफीसा प्रकरण ने उठाये सवाल
शाहीन खान और नफीसा खान का मामला इसी सवाल को सबसे खतरनाक ढंग से सामने लाता है। 4PM से जुड़ी दो महिला पत्रकारों को रिपोर्टिंग स्थल से पुलिस वैन में बिठाकर साकेत पुलिस स्टेशन जर्बदस्ती ले जाया गया और वहां उनके साथ पुलिस द्वारा मारपीट की गयी। यही नहीं दोनों ने यह भी आरोप लगाया कि उनकी मुस्लिम पहचान सामने आने के बाद कथित दुव्र्यवहार और बढ़ गया। नीट और दूसरी भर्ती परीक्षाओं से जुड़े विरोध प्रदर्शनों के दौरान छात्रों पर दर्ज एफआईआर को लेकर मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। अदालत ने देशभर में छात्र प्रदर्शनकारियों से जुड़ी एफआईआर खत्म कर दीं जबकि गंभीर आपराधिक रिकॉर्ड वाले 2,873 लोगों के संबंध में पुलिस को आगे बढऩे की अनुमति दी। इसके बाद पुलिस के उस दावे की पड़ताल सामने आई जिसमें दिल्ली पुलिस केफेशियल रिकग्निशन सिस्टम के जरिए प्रदर्शन स्थल पर मौजूद लोगों को आपराधिक रिकॉर्ड से जोड़ा गया था। इंडियन एक्सप्रेस की जांच में कम से कम 25 ऐसे लोगों की पहचान सामने आई जो पुलिस के सिस्टम में प्रदर्शन स्थल पर दिखाई दिए लेकिन रिकॉर्ड के मुताबिक उस समय जेल में थे अब जरा ठहरिए। अगर किसी इंसान को कैमरा ऐसी जगह मौजूद बता दे जहां वह था ही नहीं तो सवाल सिर्फ तकनीक का नहीं है। सवाल उस तकनीक के आधार पर बनने वाले सरकारी नैरेटिव का है। क्योंकि कैमरा गलती करे तो गलती तकनीक की है। लेकिन अगर उस गलती को अपराध साबित करने की दिशा में इस्तेमाल किया जाए तो गलती लोकतांत्रिक व्यवस्था की बन सकती है।
किस आधार कानूनी विमर्श का हिस्सा बनी 2,873 लोगों की सूंची?
पुलिस ने यह जरूर कहा है कि फेशियल रिकग्निशन सिस्टम का परिणाम अंतिम प्रमाण नहीं है और हर मैच का फील्ड वेरिफिकेशन किया जाना है। यही बात इस पूरे विवाद को और गंभीर बनाती है। अगर सिस्टम अंतिम प्रमाण नहीं है तो फिर 2,873 लोगों की सूची किस आधार पर राजनीतिक और कानूनी विमर्श का हिस्सा बनी? और अगर सिस्टम पर पूरा भरोसा किया जा सकता है तो जेल में बंद लोगों के चेहरे प्रदर्शन स्थल पर कैसे पहुंच गए? यह सवाल सिर्फ छात्रों का नहीं है। यह सवाल हर उस नागरिक का है जो कल किसी प्रदर्शन में खड़ा होगा और जिसके चेहरे को कोई मशीन किसी पुराने रिकॉर्ड से जोड़ सकती है।
उफ्फ… निशू आजाद
छात्र आंदोलन के दौरान निशू आजाद के पिता संजय कुमार पर हमला हुआ। इस मामले में स्वतंत्र भारद्वाज का नाम सामने आया। भारद्वाज ने एक इंटरव्यू में हमले की बात स्वीकार करते हुए राक्षसी दंभ भरा और अपने राजनीतिक संबंधों को कड़क अंदाज में गिनाया और गिरफ्तारी से बचने का दावा भी किया। अब यहां भी सवाल वही है कि कानून सबके लिए एक है या कानून तक पहुंचने की रफ्तार राजनीतिक पहचान से बदलती है। क्योंकि सरकार की साख सिर्फ इस बात से नहीं बनती कि उसने कितने अपराधियों को गिरफ्तार किया। सरकार की साख इस बात से भी बनती है कि जनता का कानून पर कितना भरोसा बड़ा। गिरफ्तारी चेहरे विचार धर्म राजनीतिक पहचान या सत्ता से नजदीकी देखकर नहीं कानून के आधार पर होनी चाहिए।
आज मोदी सरकार के सामने यही सबसे बड़ा राजनीतिक प्रश्न है
क्या वह असहमति को दुश्मनी मानने की राजनीति से बाहर निकलकर संवाद की राजनीति को मजबूत करेगी? क्या पुलिस और प्रशासन को यह स्पष्ट संदेश जाएगा कि सरकार की आलोचना अपराध नहीं है? क्या छात्रों को यह भरोसा दिया जाएगा कि सवाल पूछना देशद्रोह नहीं? क्या पत्रकारों को यह भरोसा मिलेगा कि सत्ता से कठिन सवाल पूछने के बावजूद उनका कैमरा सुरक्षित रहेगा? और क्या सरकार यह स्वीकार करेगी कि सबसे बड़ी सरकार वह नहीं जो विरोध को रोक दे बल्कि वह है जो विरोध के बीच भी अपना जनविश्वास बनाए रखे? आज सवाल मोदी के खिलाफ नहीं है सवाल मोदी सरकार से है। गलती किसकी है अगर पुलिस की है तो पुलिस पर कार्रवाई क्यों नहीं? अगर तकनीक की है तो तकनीक की जांच क्यों नहीं? अगर प्रशासन की है तो प्रशासन जवाबदेह क्यों नहीं? अगर राजनीतिक प्रबंधन की है तो उसे स्वीकार क्यों नहीं किया जा रहा? और अगर इन सबमें कोई गलती नहीं है तो फिर देश में हर कुछ दिनों बाद यही सवाल क्यों खड़ा हो रहा है?
यहीं मोदी सरकार के सामने असली राजनीतिक चुनौती दिखाई देती है
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की नेतृत्व वाली सरकार के सामने सवाल उठता है कि देश में संस्थाओं की जवाबदेही का राजनीतिक वातावरण कैसा बनाया जा रहा है? क्योंकि मोदी सरकार की सबसे बड़ी ताकत उसकी राजनीतिक निर्णायकता रही है। लेकिन निर्णायकता और कठोरता में बहुत महीन फर्क होता है। निर्णायक सरकार वह है जो फैसला करती है। कठोर सरकार वह दिखाई देने लगती है जो सवालों को सहन नहीं करती। और लोकतंत्र में जनता को पहली वाली सरकार चाहिए दूसरी वाली नहीं। मोदी सरकार को यह समझना होगा कि आज विपक्ष सिर्फ संसद में नहीं है। आज विपक्ष का एक हिस्सा सड़कों पर है एक हिस्सा विश्वविद्यालयों में है एक हिस्सा सोशल मीडिया पर है और एक हिस्सा पत्रकारों के कैमरों के पीछे खड़ा है। हर सवाल विपक्ष का सवाल नहीं होता हर प्रदर्शन राजनीतिक साजिश नहीं होता हर प्रदर्शनकारी अपराधी नहीं होता और हर पत्रकार सरकार विरोधी नहीं होता यही वह बिंदु है जहां सरकार की राजनीतिक समझ की असली परीक्षा होती है।




