2026 का वैश्विक संकट, ट्रंप की नीतियों ने दुनिया को युद्ध के कगार पर खड़ा कर दिया
रूस की परमाणु पनडुब्बियां अमेरिका की दहलीज पर यानी वेनेजुएला पहुंच चुकी हैं। उधर, यूरोप में कोहराम मचा है क्योंकि डेनमार्क ने नाटो छोड़ने की धमकी दे दी है।

4पीएम न्यूज नेटवर्क: क्या सच में साल 2026 दुनिया में खलबली मचा देने वाला हे। क्या अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की बेवकूफी के बाद दुनिया तेजी से थर्ड वर्ल्डवार की ओर बढ़ रही है। तो जवाब है हालत कुछ ऐसे ही बन रहे हैं और जिस बात का डर था वही होता दिख रहा है।
रूस की परमाणु पनडुब्बियां अमेरिका की दहलीज पर यानी वेनेजुएला पहुंच चुकी हैं। उधर, यूरोप में कोहराम मचा है क्योंकि डेनमार्क ने नाटो छोड़ने की धमकी दे दी है। और इस पूरी आग के पीछे सिर्फ एक चेहरा है डोनाल्ड ट्रंप! एक ऐसा नेता जिसकी जमीन हड़पने की भूख ने दुनिया को तीसरे विश्वयुद्ध करीब ला खड़ा किया है। कैसे यूरोप के सात देश ग्रीनलैंड को लेकर आग बबूला हुए हैं और रुस की पनडुब्बियों का वेनेजुएला पहुंचना क्या कुछ बता रहा है,
नए साल के आागाज के साथ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रपं ने अपनी साम्राज्यवाद की नीतियों के लिए वेनेजुएला पर अटैक कर रातोरात कब्जा कर लिया था। यहां तक कि वेनेजुएला के राष्ट्रपति को अपराधियों की तरह अपहरण करके अपने देश लाकर मुकदमा चलवा रहे हैं। जबकि ये न सिर्फ इंटरनेशल कानून का खुला उल्लंघन है बल्कि अमेरिका की खुली दादागिरी भी है लेकिन वेनेजुएला पर ट्रंप का कब्जा उसके लिए अब जी का जंजाल बनने जा रहा है। क्योंकि अब विरोध सिर्फ मंुह जबानी नहीं बल्कि सीधे तौर पर जंग की ओर बढ़ता दिख् रहा है। क्योंकि रुस अचानक वेनेजुएला को लेकर एक्शन में आ गया है और अचानक वेनेजुएला के करीब अपनी सेना को तैनात करना शुरु कर दिया है।
दावा किया जा रहा है कि रूस ने वेनेजुएला के पास संभावित अमेरिकी जब्ती से टैंकर को बचाने के लिए पनडुब्बी तैनात की है। वैसे भी रूस कई दशकों से वेनेजुएला का समर्थक रहा है और अब रूसी पनडुब्बी की तैनाती से इलाके में तनाव और बढ़ सकता है। वॉल स्ट्रीट जर्नल की एक रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी अधिकारियों का हवाला देते हुए बताया गया है कि रूस ने उत्तरी अटलांटिक में एक खराब तेल टैंकर को एस्कॉर्ट करने के लिए एक पनडुब्बी और अन्य नौसैनिक संपत्ति की तैनाती की है। यह टैंकर, जो अब मरीनरा नाम से चल रहा है, वेनेजुएला के पास के पानी से निकलने के हफ्तों बाद से ही यूनाइटेड स्टेट्स कोस्ट गार्ड की निगरानी में है। हालांकि, जहाज खाली है और साफ तौर पर खराब हो रहा है, लेकिन इसकी यात्रा ने अमेरिकी अधिकारियों का ध्यान खींचा है, जो उस ग्लोबल नेटवर्क पर शिकंजा कसना चाहते हैं, जिसे वे रूस और अन्य प्रतिबंधित देशों से जुड़े अवैध तेल की तस्करी करने वाला बताते हैं।
वैसे भी ये बात पहले से जगजाहिर है और अब ट्रंप खुद भी ऐलान कर चुके हैं कि वो वेनेजुएला का तेल खुद बेंचेंगे। ऐसे मे साफ है कि लोकतंत्र और मदद के नाम पर वेनेजुएला के तेल और प्र्राकृतिक संसाधानों पर कब्जा करना चाहते हैं। वेनेजुएला के पास 303 अरब बैरल का तेल भंडार है, जो दुनिया में सबसे बड़ा है। इसके साथ ही 161 मीट्रिक टन सोना इसकी जमीन के नीचे दबा है। अगर आज की बाजार कीमत 57 डॉलर प्रति बैरल के हिसाब से देखें, तो इस तेल की कीमत 17.3 ट्रिलियन डॉलर बैठती है।
यह आंकड़ा इतना बड़ा है कि अमेरिका और चीन को छोड़ दें, तो दुनिया के किसी भी देश की पूरी जीडीपी इसके सामने बौनी है। यह दौलत जापान जैसी विशाल अर्थव्यवस्था से चार गुना बड़ी है। अगर इस पैसे को सही से इस्तेमाल किया जाए, तो दुनिया का सबसे अमीर देश लक्ज़मबर्ग जैसे धनी देश को सैकड़ों सालों तक बिना कुछ काम किए चलाया जा सकता है। ट्रंप की गिद्ध जैसी नजरें इसी 17.3$ ट्रिलियन डॉलर की संपत्ति पर हैं। सच यह है कि वो वेनेजुएला की जनता को आजाद नहीं करना चाहते, बल्कि वो इस बेशुमार दौलत पर कब्जा करके अमेरिका के कर्ज को पाटना चाहते हैं।
क्या एक संप्रभु राष्ट्र की संपत्ति को इस तरह हड़पना विश्वयुद्ध को दावत देना नहीं है? और अब जिस तरह से रुस अपनी पनडुब्बी लेकर पहुंच गया है, इससे साफ है कि मामला आगे बढ़ता दिख रहा है। आपको बता दें कि चीन ने भी मादुरो के पकड़े जाने पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की थी और कोरिया के राष्ट्रपति किम जॉन भी इस पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त कर चुके हैं यानि यह कहे तो दुनिया की सारी बड़ी ताकते अमेरिका को घेरने के फिराक में हैं।
जैसे ही ट्रंप ने वेनेजुएला के तेल टैंकरों पर अपनी नजरें गड़ाईं, रूस के राष्ट्रपति पुतिन ने चाल चल दी। दावा किया जा रहा है कि ये वही पनडुब्बियां हैं जो पलक झपकते ही फ्लोरिडा और वाशिंगटन को राख कर सकती हैं। रूस का कहना साफ है कि अगर ट्रंप तेल चुराएंगे, तो रूस अपने दोस्तों को बचाने के लिए किसी भी हद तक जाएगा। ऐसे में साफ है कि समंदर की लहरों के नीचे मौत का खेल शुरू होने की तैयारी शुरु हो चुकी है।
सिर्फ यही एक मामला नहीं है। बल्कि वेनेजुएला को निगलने के बाद अब ट्रंप की नजर दुनिया के सबसे बड़े द्वीप ग्रीनलैंड पर है। अपनी हालिया प्रेस कॉन्फ्रेंस में ट्रंप ने जो कहा, उसने पूरी दुनिया के होश उड़ा दिए। उन्होंने खुलेआम कहा कि 20 दिनों के भीतर वे ग्रीनलैंड को लेकर बड़ा फैसला लेंगे। ट्रंप को लगता है कि ग्रीनलैंड कोई होटल या कैसीनो है जिसे वो जब चाहें खरीद सकते हैं। ट्रंप की इस हरकत ने यूरोप के देशों को आगबबूला कर दिया है। डेनमार्क, जो ग्रीनलैंड का संरक्षक है, उसने साफ कह दिया है कि ग्रीनलैंड बिकाऊ नहीं है। बात इतनी बढ़ गई है कि डेनमार्क ने नाटो गठबंधन से बाहर निकलने की धमकी दे दी है। अगर डेनमार्क नाटो छोड़ता है, तो यह इस सैन्य संगठन का अंत होगा।
यूरोप के सात बड़े देश फ्रांस, जर्मनी, इटली, पोलैंड, स्पेन, ब्रिटेन और डेनमार्क ने एक संयुक्त बयान जारी कर अमेरिका को स्पष्ट संदेश दिया है। इन देशों ने कहा कि ग्रीनलैंड के भविष्य पर फैसला लेने का अधिकार केवल डेनमार्क और ग्रीनलैंड के लोगों के पास है, किसी बाहरी दबाव को स्वीकार नहीं किया जाएगा। इस संयुक्त बयान पर फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों, जर्मनी के चांसलर मर्ज, इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी, पोलैंड के प्रधानमंत्री डोनाल्ड टुस्क, स्पेन के प्रधानमंत्री पेद्रो सांचेज, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टारमर और डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिक्सन ने हस्ताक्षर किए हैं।
बयान में कहा गया है कि आर्कटिक क्षेत्र की सुरक्षा यूरोप ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया और ट्रांस-अटलांटिक सुरक्षा के लिए बेहद महत्वपूर्ण है. नाटो पहले ही आर्कटिक क्षेत्र को अपनी प्राथमिकताओं में शामिल कर चुका है। यूरोपीय देश वहां अपनी सैन्य मौजूदगी, सुरक्षा सहयोग और निवेश लगातार बढ़ा रहे हैं। यूरोपीय नेताओं ने यह भी साफ किया कि डेनमार्क साम्राज्य, जिसमें ग्रीनलैंड शामिल है, नाटो का हिस्सा है।आर्कटिक की सुरक्षा नाटो सहयोगियों, खासकर अमेरिका, के साथ मिलकर सुनिश्चित की जाएगी, लेकिन संयुक्त राष्ट्र चार्टर के सिद्धांतों- संप्रभुता, क्षेत्रीय अखंडता और सीमाओं की रक्षा से कोई समझौता नहीं होगा।
बयान में यह भी कहा गया कि 1951 के रक्षा समझौते के तहत अमेरिका एक अहम साझेदार है, लेकिन ग्रीनलैंड के भविष्य से जुड़े फैसले किसी दबाव या सौदेबाजी से नहीं लिए जाएगा। ऐसे में साफ है कि ट्रंप की एक जिद ने उस दोस्ती को खत्म कर दिया जो दूसरे विश्वयुद्ध के बाद से दुनिया की रक्षा कर रही थी। क्या ट्रंप को इस बात का अंदाजा भी है कि वो यूरोप को रूस की गोद में धकेल रहे हैं?
हालांकि डोनाल्ड ट्रंप को लगता है कि वो अमेरिका को फिर से महान बना रहे हैं, लेकिन असलियत में वो दुनिया को श्मशान बनाने की ओर ले जा रहे हैं। वेनेजुएला पर कब्जा, ग्रीनलैंड पर अवैध नजर और नाटो को तोड़ने की उनकी जिद ने हर देश को हथियार उठाने पर मजबूर कर दिया है। अगर कल को युद्ध होता है और परमाणु मिसाइलें चलती हैं, तो उसका जिम्मेदार सिर्फ एक व्यक्ति होगा। इतिहास ट्रंप को एक ऐसे नेता के रूप में याद रखेगा जिसने शांति के बजाय विनाश को चुना।



