हाईजैक सरकार , जदयू में लीडरशिप वैक्यूम

- नीतीश-निशांत के बीच सरकारी रस्साकशी
- जदयू में अनिश्चतता का महौल, निशांत को नेता बनाने की मांग जोरों पर
- यदि सफल हुआ प्रयोग तो अगला राजनीतिक झटका आंध्र प्रदेश में देखने को मिल सकता है
4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
पटना। बिहार में राजनीतिक उथल-पुथल तेज है। नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने के बाद जदयू में बेचैनी का महौल है। आगे क्या होगा। नीतीश कुमार से जुड़े लोगों का राजनीतिक भविष्य क्या होगा यह बड़ा सवाल है। वहीं बिहार एपिसोड के बाद चन्द्राबाबू नायडू को लेकर भी सोशल मीडिया पर तरह-तरह की अटकले जन्म ले रही है कि अगला इस्तीफा उनका हो सकता है। कुल मिलाकर नीतीश कुमार के नामांकन के बाद देश में राजनीतिक बमचक तेज हैंं। बिहार की राजनीति इन दिनों ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहां हर चाल के पीछे एक बड़ी कहानी छिपी हुई है। सत्ता दिखने में भले स्थिर लगे लेकिन अंदरखाने बेचैनी संशय और उत्तराधिकार की राजनीति तेज हो चुकी है। जैसे ही नीतिश अगली राजनीतिक भूमिका को लेकर पार्टी के गलियारों में एक नया सवाल गूंजने लगा है कि नीतीश के बाद कौन? यहीं से कहानी में एक नया किरदार तेजी से उभरता दिख रहा है निशांत कुमार। अब तक राजनीति से दूर रहने वाले नीतीश कुमार के बेटे को अचानक जदयू के कुछ नेता भविष्य का चेहरा बताने लगे हैं। यह सिर्फ पारिवारिक भावनाओं की बात नहीं है बल्कि सत्ता की उस विरासत का मामला है जो बिहार की राजनीति में दशकों से नीतीश कुमार के इर्द-गिर्द घूमती रही है।
जदयू का मतलब नीतीश कुमार
जदयू का अस्तित्व लगभग पूरी तरह से नीतीश कुमार के व्यक्तित्व से जुड़ा रहा है। पिछले दो दशकों में पार्टी का संगठन नेतृत्व और राजनीतिक दिशा सब कुछ नीतीश के इर्द गिर्द घूमता रहा। यही कारण है कि जैसे ही उनके सक्रिय सत्ता से हटने या राज्यसभा जाने की संभावना सामने आई पार्टी के भीतर एक तरह का लीडरशिप वैक्यूम महसूस होने लगा। जदयू में कई वरिष्ठ नेता हैं लेकिन उनमें से कोई भी ऐसा चेहरा नहीं दिखता जिसे पूरे संगठन का स्वाभाविक उत्तराधिकारी माना जाए। इसी खालीपन ने अचानक निशांत कुमार के नाम को हवा दे दी है और कुछ जदयू नेताओं का तर्क है कि पार्टी को एक ऐसा चेहरा चाहिए जो नीतिश की विरासत को आगे बढ़ा सके और संगठन को टूटने से बचा सके और कार्यकर्ताओं को एक नया केंद्र दे सके हालांकि सवाल यह भी है कि क्या राजनीति विरासत से चलती है या अनुभव से निशांत कुमार अब तक सार्वजनिक जीवन से लगभग दूर रहे हैं। ऐसे में उनका अचानक राजनीति में आना जदयू के भीतर नई बहस को जन्म दे रहा है।
सरकार पर भाजपा का कब्जा
जदयू नीतीश कुमार के इस फैसले को अनुभव और राष्ट्रीय राजनीति में उनकी भूमिका को देखते हुए स्वाभाविक बता रहाी है जबकि विपक्ष इसे पूरी तरह से राजनीतिक दबाव का परिणाम बता रहा है। राष्ट्रीय जनता दल के नेता तेजस्वी यादव ने इस फैसले पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि भाजपा ने नीतीश कुमार को हाईजैक कर लिया है। तेजस्वी का कहना है कि जो नेता कभी बिहार की राजनीति का स्वतंत्र चेहरा हुआ करते थे आज वही भाजपा की रणनीति का हिस्सा बनते दिखाई दे रहे हैं। उनके मुताबिक यह सिर्फ एक नामांकन नहीं बल्कि बिहार की राजनीति में बदलते समीकरणों का संकेत है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बिहार में आने वाले समय में नेतृत्व और सत्ता संतुलन को लेकर कई नए सवाल खड़े हो सकते हैं। नीतीश कुमार लंबे समय से राज्य की राजनीति के केंद्र में रहे हैं और उनका राज्यसभा जाना इस बात का संकेत भी माना जा रहा है कि आने वाले समय में जदयू और भाजपा के बीच सत्ता की नई भूमिका तय हो सकती है। कुल मिलाकर नीतीश कुमार के नामांकन ने बिहार की राजनीति में एक नई बहस को जन्म दे दिया है। सत्ता पक्ष इसे रणनीतिक फैसला बता रहा है, जबकि विपक्ष इसे राजनीतिक दबाव और बदलते समीकरणों की कहानी के रूप में पेश कर रहा है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा और गरमा सकता है।
चन्द्रबाबू नायडू को लेकर खुल सकता है नया राजनीतिक अध्याय
इधर बिहार का यह पूरा घटनाक्रम अकेले राज्य तक सीमित नहीं रह गया है। राष्ट्रीय राजनीति में भी इसकी गूंज सुनाई देने लगी है। सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में यह अटकलें भी तैर रही हैं कि अगर बिहार में यह प्रयोग सफल हुआ तो क्या अगला राजनीतिक झटका आंध्र प्रदेश में देखने को मिलेगा? क्या एन चन्द्राबाबू नायडू को लेकर भी कोई नया अध्याय खुल सकता है? कुल मिलाकर सत्ता के इस शतरंज में चालें इतनी तेजी से चल रही हैं कि कई लोगों को लगने लगा है कि क्या बिहार की सरकार धीरे-धीरे राजनीतिक हाईजैक की स्थिति में पहुंच रही है?




