पंखों से सड़क… तो भरोसा किससे सुखाएंगे ?
कानपुर एक्सप्रेस वे की उधडऩ को तारकोल से चिपका कर पंखे से सुखाने का वीडियो वायरल

- पंखे वाला एक्सप्रेस वे यही है नया विकास मॉडल?
4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
लखनऊ। यह वही महीना है जब इस देश ने सत्ता से सवाल पूछने का साहस सीखा था। 8 अगस्त 1942 को भारत छोड़ो का बिगुल बजा था। वह सिर्फ अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन नहीं था बल्कि सत्ता से यह कहने का ऐलान था कि जनता को अब जवाब चाहिए।
आज 84 साल बाद फिर अगस्त है फिर सड़कें चर्चा में हैं फिर सत्ता सवालों के घेरे में है और फिर जनता पूछ रही है कि क्या विकास सिर्फ उद्घाटनों से होता है या उसकी असली परीक्षा पहली बारिश में होती है? आठ साल पहले 2018 में 4PM ने एक ऐसी खबर प्रकाशित की थी जिसने सत्ता के गलियारों में हलचल मचा दी थी। आरोप था कि जिस कंपनी के निर्माण पर सवाल उठ रहे थे उसी को एक और बड़े एक्सप्रेस वे का ठेका दे दिया गया। उस खबर पर सरकार नाराज हुयी जांच हुई बहस हुयी लेकिन समय बीत गया और फाइलें धूल फांकती रहीं।
अगस्त क्रांति हमें सवाल पूछना सिखाती है
अगस्त क्रांति हमें सिखाती है कि सवाल पूछना लोकतंत्र की ताकत है गुनाह नहीं। इसलिए आज सवाल किसी दल का नहीं व्यवस्था का है। अगर कहीं निर्माण में कमी हुई है तो जिम्मेदारी किसकी है? ठेके देने की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी थी? गुणवत्ता की निगरानी किसने की? और सबसे महत्वपूर्ण क्या जनता को हर बार वायरल वीडियो का इंतजार करना पड़ेगा तब जाकर सिस्टम जागेगा?
बीजेपी सांसद के भाई की फर्म को मिला था ठेका
कानपुर एक्सप्रेस वे को लेकर उठे विवाद ने एक बार फिर उत्तर प्रदेश में इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण की गुणवत्ता ठेके देने की प्रक्रिया और जवाबदेही पर बहस छेड़ दी है। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के आरोपों के बाद मामला राजनीतिक रंग ले चुका है। कानपुर एक्सप्रेस वे का निर्माण आगरा स्थित पीएनसी इंफ्राटेक ने किया है। सार्वजनिक जानकारी के अनुसार कंपनी के प्रमोटर प्रदीप जैन हैं। जिनका सीधा संबंध भाजपा के राज्यसभा सांसद नवीन जैन से है। यह पहला अवसर नहीं है जब किसी बड़े सड़क परियोजना को लेकर सवाल उठे हों। वर्ष 2018 में भी हमने एक एक्सप्रेस वे परियोजना में निर्माण गुणवत्ता और ठेका प्रक्रिया को लेकर गंभीर सवाल उठाए थे। उस समय खबर के बाद राजनीतिक हलचल मची जांच की मांग उठी और सरकार को सफाई भी देनी पड़ी थी। अब 2026 में जब कानपुर एक्सप्रेस वे पर मरम्मत के बाद सड़क को पंखों से सुखाने का वीडियो चर्चा में है तो बहस फिर उसी मोड़ पर लौट आई है। विपक्ष इसे निर्माण गुणवत्ता का मुद्दा बता रहा है जबकि सरकार दोषी पाए जाने वालों पर कार्रवाई की बात कर रही है। लेकिन असली प्रश्न राजनीति से आगे का है। यदि किसी परियोजना में उद्घाटन के कुछ ही समय बाद मरम्मत की नौबत आती है तो जिम्मेदारी किसकी तय होगी? क्या सिर्फ ठेकेदार पर कार्रवाई पर्याप्त है या उन अधिकारियों और एजेंसियों की भी जवाबदेही तय होगी जिन्होंने निर्माण की गुणवत्ता प्रमाणित की थी?
22 दिन में बना राष्ट्रीय बहस का मुद्दा
उद्घाटन के समय इसे उत्तर प्रदेश के विकास की नई रफ्तार बताया गया था। दावा था कि लखनऊ और कानपुर के बीच सफर तेज़, सुरक्षित और आधुनिक होगा। लेकिन महज 22 दिन बाद ही वही एक्सप्रेस-वे अब अपनी गुणवत्ता को लेकर राष्ट्रीय बहस का विषय बन गया है। 14 जुलाई को शुरू हुए इस एक्सप्रेस वे पर 26 जुलाई को पहली बार उन्नाव के कुरारी गांव के पास सड़क धंसने की खबर सामने आई। इसके बाद मामला एक जगह तक सीमित नहीं रहा। देखते ही देखते अलग-अलग स्थानों पर सड़क धंसने और डामर उखडऩे की घटनाएं सामने आने लगीं। अब तक आठ स्थानों पर मरम्मत की नौबत आ चुकी है।
आज वही सवाल नए रूप में लौट आया है
इस बार चर्चा कानपुर एक्सप्रेस वे की है। वही कानपुर एक्सप्रेस वे जिसकी विशालता का जिसकी क्वालिटी का और जिसकी परफारमेंस का ढिढ़ोरा पीटा गया था पहली बारिश में ही उसकी पालिश उतर गयी है और एक्सप्रेस वे जगह जगह से उधडऩा शुरू हो गया। खबरें मीडिया में आयी तो सरकार हरकत में आयी लेकिन सरकार के हरकत में आने में देरी हो गयी और यह खबर पूरे देश में ट्रेंड करने लगी। अब उस एक्सप्रेस वे की गिट्टी को तारकोल से चिपका कर उसे चलने योग्य बनाने के लिए पैडिस्टल फैन से सुखाया जा रहा है। सरकार की इस एक्टिविटी को सूबे के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने अपने एक्स हैंडल से शेयर किया तो पूरे देश में शोर मच गया और खबर ट्रेंड करने लगी। वीडियो में देखा जा सकता है कि सड़क की मरम्मत के बाद उसे पंखों से सुखाने की कोशिश की जा रही है। पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव इसे साझा करते हुए तंज कसते हैं लिखा है कि अगर एक्सप्रेस वे को चलाने से पहले पंखों का सहारा लेना पड़ रहा है तो उसकी मजबूती पर सवाल उठना स्वाभाविक है। सरकार अपनी ओर से कार्रवाई की बात करती है दोषी कंपनी के विरुद्ध कदम उठाने की जानकारी देती है। लेकिन असली सवाल वहीं खड़ा रहता है कि क्या हर बार दुर्घटना धंसाव या वायरल वीडियो के बाद ही जवाबदेही शुरू होगी? यह लड़ाई किसी एक सड़क की नहीं है। यह लड़ाई उस सोच की है जिसमें उद्घाटन की तस्वीरें सुर्खियां बन जाती हैं लेकिन गुणवत्ता की जांच अक्सर बारिश के भरोसे छोड़ दी जाती है। जनता टैक्स देती है ताकि सड़कें पीढिय़ों तक चलें न कि कुछ हफ्तों बाद मरम्मत की सुर्खियां बनें। विकास का मतलब सिर्फ किलोमीटर जोडऩा नहीं, भरोसा जोडऩा भी है।




