भारतीय इंडस्ट्री को मिली बड़ी जिम्मेदारी, MiG-29K के लिए तैयार होंगे स्वदेशी रॉकेट

भारतीय नौसेना ने MiG-29K के लिए 80mm एयर-टू-ग्राउंड रॉकेट के स्वदेशी विकास का प्रस्ताव दिया है. इसमें 'आत्मनिर्भर भारत' के तहत विदेशी आयात पर निर्भरता कम करने का टार्गेट रखा गया है.

4पीएम न्यूज नेटवर्क: भारतीय नौसेना ने MiG-29K के लिए 80mm एयर-टू-ग्राउंड रॉकेट के स्वदेशी विकास का प्रस्ताव दिया है. इसमें ‘आत्मनिर्भर भारत’ के तहत विदेशी आयात पर निर्भरता कम करने का टार्गेट रखा गया है. 2026-27 तक शामिल होने वाले ये रॉकेट बख्तरबंद वाहनों को भेदने और बड़े क्षेत्र में नुकसान पहुंचाने में सक्षम होंगे.

भारतीय नौसेना ने अपने MiG-29K/KUB एयरक्राफ्ट के लिए इस्तेमाल होने वाले 80 मिमी एयर-टू-ग्राउंड रॉकेट के स्वदेशी विकास और निर्माण के लिए देश की रक्षा कंपनियों से प्रस्ताव मांगे हैं. इस कदम का उद्देश्य विदेशी आयात पर निर्भरता कम करना और ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान को मजबूती देना है. फिलहाल ये अनगाइडेड रॉकेट विदेशों से खरीदा जाता है. इसका इस्तेमाल भारतीय नौसेना के विमानवाहक पोत INS विक्रमादित्य पर तैनात MiG-29K लड़ाकू जेट करते हैं.

ये रॉकेट B8M-1 लॉन्चर पॉड से दागा जाता है और बख्तरबंद वाहनों, रडार स्टेशनों, दुश्मन के एयरक्राफ्ट और पैदल सैनिकों को निशाना बनाने में सक्षम है. नौसेना की ये योजना है कि सफल परीक्षण के बाद करीब 273 ऑपरेशनल रॉकेट और 2,400 प्रैक्टिस राउंड खरीदे जाएं. इस स्वदेशी सिस्टम को वर्ष 2026-27 तक सेवा में शामिल करने का लक्ष्य रखा गया है. जारी किए गए एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (EoI) के अनुसार, इस रॉकेट का वजन लगभग 11.3 किलोग्राम होगा और इसकी लंबाई करीब 1.54 मीटर होगी. यह लगभग 600 मीटर प्रति सेकेंड की गति से लक्ष्य की ओर बढ़ेगा और इसकी प्रभावी मारक क्षमता 1.3 से 4 किलोमीटर के बीच होगी.

400 मिमी मोटे कवच को भेदने की क्षमता
रॉकेट में करीब 0.9 किलोग्राम का हाई-एक्सप्लोसिव वारहेड होगा, जो सीधे प्रहार की स्थिति में 400 मिमी मोटे कवच को भेदने की क्षमता रखेगा. विस्फोट के समय यह कम से कम 400 घातक धातु के टुकड़े भी फैलाएगा, जिससे बड़े क्षेत्र में नुकसान पहुंचाया जा सके.

भारतीय नौसेना ने यह भी शर्त रखी है कि स्वदेशी रॉकेट की न्यूनतम सेवा अवधि 15 साल होनी चाहिए और यह -60 डिग्री सेल्सियस से +60 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान में प्रभावी ढंग से काम कर सके. साथ ही इसे 20,000 मीटर तक की ऊंचाई पर सुरक्षित रूप से इस्तेमाल किया जा सके.

ये पहल भारतीय रक्षा क्षेत्र में स्वदेशीकरण की दिशा में एक और बड़ा कदम है. हाल के सालों में सेना, वायुसेना और नौसेना लगातार मिसाइल, रॉकेट और गोला-बारूद के घरेलू निर्माण पर जोर दे रही हैं, ताकि भविष्य में विदेशी आपूर्ति पर निर्भरता कम की जा सके.

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