क्या सवाल पूछना गुनाह है? सवालों के घेरे में सीएम साहब

मुंबई और उसके आस-पास के शहरों के विकास पर नियम 293 के तहत हुई बहस का जवाब देते हुए, मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने ऐसा कुछ कहा जो सियासी गलियारों में चर्चा का विषय बन गया।

4पीएम न्यूज नेटवर्क: महाराष्ट्र में जबसे भाजपा की सरकार बनी है जनता के क्या हाल हैं ये बात आप बखूबी जानते हैं। महंगाई, बेरोजगारी तो चरम पर है ही ऊपर से खस्ता सड़कों के हालात।

वहीं सत्ता का सुख भोग रहे नेताओं की अगर बात की जाये तो इन्हे बस परवाह है तो सिर्फ अपनी कुर्सी और पार्टी की। भले ही राज्य की जनता को लाखों परेशानियां हों मजाल है कि इनके कानों में जूं रेंगे। लेकिन अगर कोई इस सबके खिलाफ आवाज़ उठाना चाहे तो ये नेता उसे ही टारगेट करने लगते हैं। यहां तक की उसके खिलाफ एक्शन तक ले लिया जाता है।

कुल मिलकर सौ की सीधी बात तो ये है कि इस सरकार में आलोचनाओं को झेलने की ताकत ही नहीं है। तभी जरा-जरा सी आलोचना पर सीएम तक अपनी भाषा ऐसी कर लेते हैं जिसे लेकर उनपर ही सवाल उठने लगते हैं। इसी बीच एक बार फिर सीएम देवेंद्र फडणवीस को आलोचकों की बातें इतनी बुरी लगी कि वो भरे सदन में कुत्ते, भाड़े के टट्टू जैसे शब्दों का इस्तेमाल करने लगे।

मुंबई और उसके आस-पास के शहरों के विकास पर नियम 293 के तहत हुई बहस का जवाब देते हुए, मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने ऐसा कुछ कहा जो सियासी गलियारों में चर्चा का विषय बन गया। सदन में अपने संबोधन में उन्होंने विपक्ष पर तीखा हमला बोलते हुए जयंत राव पाटिल की बात को दोहराया.

उन्होंने अबू आजमी से कहा, “आजमी साब हमारे जयंत राव जी ने सही बात कही कि जिनको कुत्ता नहीं पूछता वो आजकल सोशल मीडिया पर आकर सबको गालियां देते हैं. मुख्यमंत्री को भी गाली देते हैं. ऐसे कुछ भाड़े के टट्टू इस मिसिंग लिंक के बारे में भी पैसा लेकर सोशल मीडिया पर लिख रहे थे.” उन्होंने आगे कहा, “जो लोग सोशल मीडिया पर लिख रहे थे उनको भी कह देना चाहता हूं कि अगर महाराष्ट्र का अपमान करोगे तो छोड़ूंगा नहीं.”

साथ ही उन्होंने प्रोजेक्ट का बचाव करते हुए इसे इंजीनियरिंग का एक शानदार वैश्विक नमूना करार दिया. मुंबई-पुणे ‘मिसिंग लिंक’ एक्सप्रेसवे पर हाल ही में हुए भूस्खलन के बाद सोशल मीडिया पर हो रही ट्रोलिंग और भ्रष्टाचार के आरोपों के बीच कड़ा रुख अपनाते हुए, सीएम फडणवीस ने खुद को ‘एब्यूज प्रूफ’ बताया.

वहीं इसी बीच MNS प्रमुख राज ठाकरे ने मुंबई में आयोजित मनसे रेलवे कामगार सेना के स्थापना दिवस कार्यक्रम के दौरान ‘मिसिंग लिंक’ मुद्दे को लेकर मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस पर तीखा हमला बोला. उन्होंने विधानसभा में मुख्यमंत्री द्वारा दिए गए बयानों पर पलटवार करते हुए कहा कि अगर सरकार से जरूरी सवाल पूछना राजनीति है तो विपक्ष में रहते हुए भारतीय जनता पार्टी द्वारा किए गए तमाम आंदोलन क्या राजनीति नहीं थे?

राज ठाकरे ने कहा कि मुख्यमंत्री विधानसभा में ‘मिसिंग लिंक’ पर राजनीति न करने और महाराष्ट्र का अपमान न करने की बात कहते हैं, लेकिन हादसे पर सवाल पूछने में राज्य का कोई अपमान नहीं है. उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि लोकतंत्र के अंदर देश की जनता को अपनी सरकार से सवाल पूछने का पूरा अधिकार है. राज ठाकरे ने आरोप लगाया कि विरोधियों पर व्यक्तिगत हमले और तीखी भाषा की शुरुआत खुद बीजेपी ने की थी, लेकिन अब जब वैसा ही माहौल उनके खिलाफ बन रहा है तो उन्हें तकलीफ हो रही है.

यह सारी बयानबाजियां जो हुईं ये हुईं मुंबई-पुणे एक्सप्रेसवे के “मिसिंग लिंक” प्रोजेक्ट पर हुई लैंडस्लाइड को लेकर। दरअसल मई 2026 में फडणवीस सरकार ने करीब 7,000 करोड़ की लागत वाला 13.3 किमी का मिसिंग लिंक चालू किया, जो लोनावला-खंडाला घाट से बचाकर यात्रा समय 20-30 मिनट कम करता है। 6 जुलाई को भारी बारिश में टनल के पास भूस्खलन हुआ, 100 टन मलबा आया, सड़क 18 घंटे बंद रही।

सरकार ने तेजी से साफ किया, IIT एक्सपर्ट्स की सलाह ली और अतिरिक्त सुरक्षा उपायों का वादा किया। फडणवीस ने इसे “इंजीनियरिंग मार्वल” बताया, कोनकण रेलवे से तुलना की और कहा कि बड़े प्रोजेक्ट्स में शुरुआती चुनौतियां स्वाभाविक हैं। विपक्ष ने सुरक्षा, भ्रष्टाचार और गुणवत्ता पर सवाल उठाए, स्वतंत्र ऑडिट की मांग की।

ऐसे में सीएम फडणवीस का यह बयान विवादास्पद रहा क्योंकि इसमें आलोचकों को “कुत्ता नहीं पूछता” और “भाड़े के टट्टे” कहकर आम जनता का अपमान माना गया। कुछ ने इसे सत्ता के घमंड के रूप में देखा, वहीं समर्थकों ने इसे मजबूत रुख बताया। देवेंद्र फडणवीस की महायुति सरकार ने इंफ्रास्ट्रक्चर और निवेश आकर्षण में कुछ दावे किए हैं, लेकिन वास्तविकता में कई क्षेत्रों में विफलताएं, घमंड भरा रवैया, और जन-समस्याओं से दूरी साफ दिखती है।

मिसिंग लिंक विवाद इसका ताजा उदाहरण है, जहां एक इंजीनियरिंग प्रोजेक्ट की शुरुआती समस्या पर सवाल पूछने वालों को कुत्तों से भी नीचा दिखाया गया। यह सत्ता के प्रति असहिष्णुता दर्शाता है। सरकार बड़े-बड़े MoU और प्रोजेक्ट्स का ढिंढोरा पीटती है, लेकिन ग्राउंड पर डिलीवरी कमजोर है। मुंबई-पुणे एक्सप्रेसवे जैसे प्रोजेक्ट्स में मानसून में भूस्खलन आम बात हो गई है। कोनकण रेलवे की तुलना करना ठीक है, लेकिन उस समय की तकनीक और आज की अलग हैं।

सरकार ने प्रोजेक्ट को जल्दबाजी में पूरा किया, ड्रेनेज और स्लोप प्रोटेक्शन पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया। परिणाम यह निकलता कि आम यात्री परेशान, ट्रैफिक पुरानी सड़क पर डाइवर्ट। विपक्ष की मांग पर स्वतंत्र ऑडिट क्यों नहीं? पारदर्शिता की कमी सवाल खड़ी करती है।

कृषि क्षेत्र में हालात और बदतर हैं। महाराष्ट्र में किसान आत्महत्याएं जारी हैं। विपक्ष के अनुसार, 100 दिनों में ही इनमें वृद्धि हुई। सरकार दावे करती है कि सिंचाई और फसल बीमा सुधरे, लेकिन वास्तव में छोटे किसान सूखा, बाढ़ और बाजार की अनिश्चितता से जूझ रहे हैं। नदी जोड़ने के प्रोजेक्ट्स की घोषणाएं होती हैं, लेकिन क्रियान्वयन धीमा। किसानों की आय दोगुनी करने का वादा कागजी रह गया।

महंगाई, बेरोजगारी और ग्रामीण संकट पर ठोस कदम नजर नहीं आते।शहरी मुद्दों में मुंबई की बाढ़ एक पुरानी समस्या है। सरकार 13,000 करोड़ के इंटीग्रेटेड फ्लड कंट्रोल प्लान की बात करती है, लेकिन हर मानसून में शहर पानी-पानी होता है। डिसिल्टिंग, ड्रेनेज और स्लम पुनर्वास में देरी और कथित भ्रष्टाचार की शिकायतें आम हैं। फडणवीस ने डिसिल्टिंग पर पेनल्टी और ट्रांसपेरेंसी का दावा किया, लेकिन नतीजे दिखाई नहीं देते। मलाड, अंधेरी जैसे इलाकों में पानी भरना नियमित हो गया है।

कानून-व्यवस्था और शासन में “जीरो टॉलरेंस” के दावे के बावजूद, राजनीतिक हिंसा, जातीय तनाव और क्राइम के कुछ मामले सामने आते रहते हैं। फॉरेंसिक मोबाइल वैन जैसी पहल सराहनीय हैं, लेकिन समग्र अपराध दर और कन्विक्शन रेट में क्रांतिकारी सुधार का दावा अतिरंजित लगता है।

कुछ मामलों में सत्ता पक्ष के करीबियों पर आरोप लगते हैं, जिससे निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं।आर्थिक मोर्चे पर Davos और अन्य जगहों से MoU साइन किए जाते हैं, लेकिन कई MoU कागजी रह जाते हैं। निवेश आकर्षण में महाराष्ट्र आगे है, मगर रोजगार सृजन की गुणवत्ता और वितरण असमान है। युवा बेरोजगारी, खासकर ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में, एक बड़ी समस्या बनी हुई है।

स्टार्टअप और IT पर फोकस है, लेकिन MSME और पारंपरिक उद्योगों की उपेक्षा हो रही है।शिक्षा और स्वास्थ्य में सुधार के दावे हैं, लेकिन सरकारी स्कूलों और अस्पतालों की हालत सुधरने के बजाय निजीकरण की ओर झुकाव दिखता है। COVID जैसे संकट या मौसमी बीमारियों में तैयारियां अपर्याप्त रहीं।

सबसे बड़ी आलोचना शैली की है। फडणवीस का “कुत्ता” वाला बयान लोकतंत्र की भावना के खिलाफ है। सत्ता में बैठे व्यक्ति को आलोचना सहनी चाहिए, खासकर जब जन-धन का प्रोजेक्ट हो। सोशल मीडिया पर “ट्रोल्स” कहकर असहमति को खारिज करना आसान है, लेकिन यह जनता की आवाज को दबाने जैसा है।

“महाराष्ट्र का अपमान” का नैरेटिव बनाकर आलोचना को राष्ट्र-विरोधी रंग देना, विकास की बहस को व्यक्तिगत बना देता है।पिछली सरकारों की तुलना में महायुति ने स्थिरता दी, लेकिन सत्ता के घमंड, परिवारवाद के आरोप, और विपक्ष दमन की शिकायतें बढ़ी हैं। मीडिया और जांच एजेंसियों के इस्तेमाल पर भी सवाल उठते हैं।

वहीं इस सरकार की लापरवाहियों की बात करें तो बड़े इंफ्रा प्रोजेक्ट्स में EIA यानी Environment Impact Assessment की अनदेखी या कमजोर क्रियान्वयन से भूस्खलन, बाढ़ बढ़ रहे हैं। Sahyadri ranges में निर्माण पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रहा है।महिलाओं, दलितों और अल्पसंख्यकों के मुद्दों पर सरकार दावे करती है, लेकिन वास्तविक ग्राउंड रिपोर्ट्स में असुरक्षा और असमानता बनी हुई है। कुल मिलाकर फडणवीस सरकार इंफ्रा पर फोकस कर रही है, लेकिन जन-केंद्रित मुद्दों में विफल रही है।

घमंड भरा रवैया और आलोचना को व्यक्तिगत हमला मानना लोकतांत्रिक मूल्यों के विरुद्ध है। हर प्रोजेक्ट की आलोचना को “भाड़े का” कहकर सरकार अपनी जवाबदेही से बच रही है। मिसिंग लिंक एक उदाहरण है — तेजी से बना, लेकिन टिकाऊ नहीं साबित हुआ। लेकिन सीएम साहब ये भूल गए कि जनता को सवाल पूछने का अधिकार है। सरकार को घमंड छोड़कर काम पर फोकस करना चाहिए, नहीं तो 2026-27 चुनावों में जनता जवाब देगी।

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