जन्माष्टमी: आस्था के साथ बदला उत्सव, बाजार ने पकड़ी नई रफ्तार

कभी घर में बनती मिट्टी की झांकी और पोशाकें, अब डिजाइनर कॉस्ट्यूम और थीम-बेस्ड डेकोरेशन में बदल गई हैं. ऑनलाइन शॉपिंग के बावजूद पारंपरिक बाजारों की रौनक कायम है, जहां टेक्नोलॉजी ने नए ग्राहक बनाए हैं.

4पीएम न्यूज नेटवर्क: कभी घर में बनती मिट्टी की झांकी और पोशाकें, अब डिजाइनर कॉस्ट्यूम और थीम-बेस्ड डेकोरेशन में बदल गई हैं. ऑनलाइन शॉपिंग के बावजूद पारंपरिक बाजारों की रौनक कायम है, जहां टेक्नोलॉजी ने नए ग्राहक बनाए हैं.

क्या आपने बचपन में कभी मिट्टी, गत्तों, रूई और थोड़े से सजावटी सामान के साथ जन्माष्टमी की झांकी बनाई है? कितना मजा आता था ना. जन्माष्टमी मतलब घर में मिट्टी की छोटी-सी झांकी, लकड़ी या कपड़े का झूला, घर में बनी कान्हा जी की ड्रेस और बाजार से खरीदा सजावट का कुछ सामान.

लेकिन अब जन्माष्टमी की शॉपिंग लिस्ट काफी लंबी है. कान्हा जी की पोशाक से लेकर मुकुट, बांसुरी, मोरपंख, झूला, लड्डू गोपाल की ड्रेस, थीम्ड डेकोरेशन और रेडीमेड झांकी तक बाजार में अलग कैटेगरी बन चुकी है.

बाजारों में जन्माष्टमी से पहले कारोबारियों ने पिछले साल के मुकाबले करीब 25 प्रतिशत तक कारोबार बढ़ने की उम्मीद जताई है. लोकल दुकानदार कहते हैं- ऑनलाइन शॉपिंग से बाजार बदला जरूर है, लेकिन त्योहारों में ट्रेडिशनल मार्केट्स में भी मांग बनी है.

दशकों से नोएडा में पूजन सामग्री की दुकान चला रहे धर्मेंद सिंह कहते हैं- ऑनलाइन जब 4 इंच का आम लोग आठ इंच का दिखाकर बेच देते हैं तो वहां कुछ भी संभव हैं लेकिन जन्माष्टमी या धार्मिक अवसरों पर ऑनलाइन शौकीन लोग वहां जाते हैं जहां कलर और डिजाइन दिखाकर कुछ भी बिक जाता है. बाज़ार की रौनक परंपरा में हैं और परंपरा की रौनक बाज़ार में हैं.

डीआईवाई से रेडीमेड सेलिब्रेशन

सबसे बड़ा बदलाव डीआईवाई से रेडीमेड सेलिब्रेशन से आया है. पहले घर के बच्चे कार्डबोर्ड, रंगीन कागज, थर्माकोल और मिट्टी से झांकी बनाते थे. अब बाजार में थीम-बेस्ड DIY सजावट उपलब्ध है. छोटे घरों के लिए मिनी कृष्णा सेटअप, स्कूल फंक्शंस के लिए कॉस्ट्यूम सेट्स और मंदिरों के लिए बड़े डेकोरेशन पैकेज तक मिलते हैं.

बच्चों के श्रीकृष्ण कॉस्ट्यूम ने भी इस बाजार को नया आकार दिया है. कुछ दशक पहले घर में सिलाई कराई गई ड्रेस ही काफी होती थी। अब एक कॉस्ट्यूम में मुकुट, मोरपंख, बांसुरी, धोती और एक्सेसरीज तक का पूरा सेट मिलता है. बाज़ार के लिए त्योहार सिर्फ पूजा का अवसर नहीं रहा, एक एक्सपीरियंस पैकेज बन गया है.

सोशल मीडिया ने बदला बाज़ार

फोटो खींच सोशल मीडिया पर डाल… नए ज़माने का यही ट्रेंड है। पहले मोहल्ले की झांकी ही कॉम्पिटिशन होती थी। अब सेलीब्रिटीज़, इंन्फूएंसर्स से लेकर पैरेंट्स और स्कूल्स तक डेकोरेशन की फोटोज़ और वीडियो ऑनलाइन शेयर करते हैं। जिससे प्रेजेंटेशन की इंपॉर्टेंस बढ़ी है। एक बेसिक झांकी की जगह अब थीम, लाइटिंग और बैकग्राउंड पर भी फोकस हो गया है।

जिसका असर बच्चों के त्योहार मनाने के तरीके पर भी दिखता है. स्कूलों में कृष्ण-राधा ड्रेस-अप एक्टिविटीज, फैंसी ड्रेस और मटकी डेकोरेशन जैसे कार्यक्रम होते हैं. यानी जन्माष्टमी की डिमांड सिर्फ धार्मिक सामान तक सीमित नहीं रहती, बल्कि कॉस्ट्यूम, क्राफ्ट मटेरियल, डेकोरेशन और इवेंट-रिलेटेड प्रोडक्ट्स तक फैलती है.

लेकिन बदलते बाजार की कहानी सिर्फ खर्च बढ़ने की कहानी नहीं है. इसके पीछे एक बड़ा कल्चरल शिफ्ट भी है. त्योहार की चीजें अब लोकल आर्टिजंस के साथ-साथ ऑर्गनाइज्ड रिटेल और ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स पर भी बिकती हैं. यानी एक ऐसा फेस्टिवल मार्केट बन रहा है जिसमें छोटी दुकान से लेकर ऑनलाइन सेलर तक शामिल हैं.

जन्माष्टमी स्पेशल, जन्माष्टमी स्पेशल नाम से ऑनलाइन मार्केट में कान्हा की पोशाक, झूला, मुकुट, मंदिर सजावट की चीजों से लेकर मिठाई तक मिल रही है. इनकी कीमत भी ऐसी कि हर वर्ग को कैटर कर सके. यानि 30-40 रुपये से शुरू होकर आप हज़ारों तक का सामान ले सकते हैं.

टेक्नोलॉजी ने ट्रेडिशनल मार्केट को खत्म नहीं किया

खास बात ये कि टेक्नोलॉजी ने ट्रेडिशनल मार्केट को खत्म नहीं किया, नया कस्टमर बनाया है. पहले जिसको बाजार में दुकान दुकान जाकर पोशाक, मुकुट या सजावट खोजनी पड़ती थी, वो फोन पर मल्टीपल ऑप्शन देख सकता है. लेकिन त्योहार के ठीक पहले फिजिकल मार्केट में जाकर सामान खरीदने में जो बात है वो एक्सपीरिएंस अभी भी बरकरार है

…इसलिए जन्माष्टमी का बदलता बाजार बताता है त्योहार वही, सेलिब्रेट करने का तरीका नया। मिट्टी की छोटी झांकी से रेडीमेड थीम तक, घर की सिलाई से डिजाइनर कॉस्ट्यूम तक और लोकल मार्केट से ऑनलाइन शॉपिंग तक जन्माष्टमी में अब परंपरा और कंज्यूमर कल्चर दोनों है.

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