केजरीवाल का न्याय की चौखट से नैतिक विद्रोह

  • महात्मा गांधी के सत्याग्रह की तरह कानूनी लड़ाई के बजाय नैतिक विरोध का रास्ता अपनाएंगे।
  • जस्टिस स्वर्णकांता को लिखा पत्र न्याय मिलने की उम्मीद नहीं रही इसलिए न तो खुद अदालत में पेश होंगे और न ही अपने वकील को भेजेंगे

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नर्ई दिल्ली। देश की सबसे मजबूत संस्थाओं में गिनी जाने वाली न्यायपालिका के दरवाजे पर एक ऐसा सवाल दस्तक दे रहा है जो सिर्फ एक केस या एक नेता तक सीमित नहीं है। आम आदमी पार्टी के संयोजक और दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने अपने केस से रिलेटेड एक ऐसा फैसला लिया है जिसने न्यायिक प्रणाली के इर्द गिर्द पनपे इको सिस्टम पर जबर्दस्त प्रहार किया है। केजरीवाल ने जस्टिस स्वर्णकांता को पत्र लिखकर कहा है कि उन्हें अदालत से न्याय की उम्मीद खत्म हो चुकी है। उन्होंने महात्मा गांधी के सत्याग्रह का हवाला देते हुए एक नैतिक लड़ाई लडऩे का एलान किया है और कहा है कि अब वह केस की पैरवी में न तो वह खुद शामिल होंगे और न ही उनका वकील शामिल होगा। उनके इस एलान से सवाल उठता है कि जब एक पूर्व मुख्यमंत्री एक संवैधानिक पद पर रह चुका व्यक्ति यह कहे कि अब उसे न्यायिक प्रक्रिया से भरोसा नहीं रहा तो आम नागरिक क्या सोचेगा? क्या यह व्यक्तिगत असंतोष है? या फिर उस व्यापक असहजता की अभिव्यक्ति जो धीरे-धीरे समाज के अलग-अलग हिस्सों में दिखने लगी है? वहीं दिल्ली हाईकोर्ट की ओर से स्पष्ट कहा गया है कि न्यायाधीश की निष्पक्षता पर सवाल केवल ठोस सबूतों के आधार पर ही उठाया जा सकता है न कि आशंकाओं पर। न्यायमूर्ति स्वर्णकांता शर्मा ने अपने फैसले में यही रेखांकित किया कि संस्थागत गरिमा सर्वोपरि है और अदालत की प्रक्रिया को किसी भी तरह प्रभावित नहीं होने दिया जा सकता।

व्यक्ति का विश्वास संस्था की मर्यादा

व्यक्ति का विश्वास और संस्था की मर्यादाओं के बीच का यह टकराव नया नहीं है। देश में कई ऐसे मामले रहे हैं जहां न्यायिक प्रक्रिया को लेकर सवाल उठे। कभी देरी को लेकर कभी जमानत को लेकर कभी फैसलों की टाइमिंग को लेकर। लेकिन हर बार न्यायपालिका ने अपने फैसलों के जरिए यह साबित करने की कोशिश की कि कानून का रास्ता ही अंतिम रास्ता है। तो क्या हम एक ऐसे मोड़ पर खड़े हैं जहां भरोसा और प्रक्रिया आमने-सामने हैं? या फिर यह लोकतंत्र की वह स्वाभाविक प्रक्रिया है जहां सवाल उठते हैं बहस होती है और अंतत: संस्थाएं खुद को और मजबूत करती हैं? यह सिर्फ एक घटना नहीं यह उस बड़े सवाल की शुरुआत है जिसका जवाब आने वाले समय में तय करेगा कि जनता का विश्वास किस ओर झुकेगा।

क्या यह इकोसिस्टम का मुद्दा है?

यह सवाल अब सिर्फ बहस का हिस्सा नहीं बल्कि एक गहरी चिंता का विषय बन चुका है। कुछ आलोचकों का मानना है कि न्याय प्रक्रिया के इर्द-गिर्द एक ऐसा जटिल ढांचा खड़ा हो गया है जो आम नागरिक के लिए रास्ता आसान करने के बजाय और पेचीदा बना देता है। अदालतों तक पहुंच सैद्धांतिक रूप से सबके लिए खुली है लेकिन व्यवहार में लंबी तारीखें, जटिल कानूनी भाषा और महंगे वकीलों की फीस इन सबका मेल न्याय को दूर बना देता है। यही कारण है कि कई बार लोगों के मन में यह धारणा बनती है कि न्याय सिर्फ उन लोगों तक आसानी से पहुंचता है जिनके पास संसाधन और समय दोनों हैं। एक आम व्यक्ति जो रोजमर्रा की जिंदगी की जद्दोजहद में उलझा है उसके लिए वर्षों तक चलने वाली कानूनी लड़ाई लडऩा आसान नहीं होता। हालांकि तस्वीर का दूसरा पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है। न्याय व्यवस्था ने खुद को समय के साथ बदलने की कोशिश की है। ई-कोट्र्स, फास्ट ट्रैक अदालतें और डिजिटल सुनवाई जैसे कदम इस दिशा में उठाए गए हैं ताकि प्रक्रिया को तेज और सुलभ बनाया जा सके। खासकर महामारी के बाद वर्चुअल सुनवाई ने न्याय तक पहुंच को एक नया आयाम दिया है। फिर भी मूल सवाल जस का तस खड़ा है कि क्या यह सुधार जमीनी स्तर पर उस व्यक्ति तक पहुंच पा रहे हैं जिसे इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है? उत्तर साफ मिलता है कि समस्या एकतरफा नहीं है। न तो पूरा सस्टम विफल है न ही पूरी तरह परिपूर्ण। असल चुनौती यही है कि प्रक्रिया को सरल बनाना समय को कम करना और भरोसे को मजबूत करना। क्योंकि अंतत: न्याय सिर्फ फैसलों से नहीं बल्कि उसकी पहुंच और अनुभव से तय होता है।

केजरीवाल द्वारा लगाए गए आरोपों का जवाब देते हुए न्यायाधीश ने कहा कि पक्षपात के दावों को साबित करने के लिए कोई सबूत नहीं है, जिनमें अधिवक्ता परिषद द्वारा आयोजित कार्यक्रमों में उनकी भागीदारी या उनके परिवार के सदस्यों की पेशेवर व्यस्तता से संबंधित आरोप भी शामिल हैं।

न्याय व्यवस्था के खिलाफ नहीं बल्कि अपने सिद्धांतों के समर्थन में

दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने जस्टिस स्वर्णकांता को चिट्ठी के जरिए एक बड़ा फैसला जाहिर किया है। उन्होंने कहा है कि अब जस्टिस स्वर्णकांता से न्याय मिलने की उम्मीद नहीं रही इसलिए वह न तो खुद अदालत में पेश होंगे और न ही अपने वकील को भेजेंगे। अपने पत्र में केजरीवाल ने स्पष्ट किया कि उन्होंने यह निर्णय अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनकर लिया है। उन्होंने महात्मा गांधी के सत्याग्रह का हवाला देते हुए कहा कि अब वह कानूनी लड़ाई के बजाय नैतिक और वैचारिक विरोध का रास्ता अपनाएंगे। केजरीवाल ने यह भी संकेत दिया है कि उनका यह कदम न्याय व्यवस्था के खिलाफ नहीं बल्कि अपने सिद्धांतों के समर्थन में है। हालांकि उन्होंने साफ किया कि यदि जस्टिस स्वर्णकांता कोई फैसला सुनाती हैं तो उसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाने का अधिकार वह अपने पास सुरक्षित रखेंगे। गौरतलब है कि इससे पहले 20 अप्रैल को दिल्ली हाईकोर्ट की न्यायमूर्ति स्वर्णकांता शर्मा ने अरविंद केजरीवाल की उस याचिका को खारिज कर दिया था जिसमें उन्होंने दिल्ली आबकारी नीति मामले की सुनवाई से न्यायमूर्ति को खुद को अलग करने की मांग की थी। अपना निर्णय सुनाते हुए न्यायमूर्ति शर्मा ने स्पष्ट किया कि याचिका पर विचार किए बिना सुनवाई से पीछे हट जाना एक आसान विकल्प होता किंतु उन्होंने संस्थागत शुचिता और गरिमा को सर्वोपरि रखते हुए मामले के गुण दोष के आधार पर निर्णय लेना उचित समझा। उन्होंने उल्लेख किया कि जब उन्होंने अपना फैसला पढऩा शुरू किया तो न्यायालय कक्ष में पूर्ण निस्तब्धता (सन्नाटा) छा गई थी। न्यायमूर्ति ने आगे कहा कि उनके समक्ष यह केवल एक कानूनी प्रश्न नहीं था बल्कि एक ऐसी चुनौती थी जिसने न्यायाधीश और न्यायिक संस्था दोनों को परीक्षण की कसौटी पर खड़ा कर दिया था। दिल्ली हाईकोर्ट ने इस बात को दोहराते हुए कहा था कि जब तक ठोस सबूतों से खंडन न हो जाए न्यायाधीश की निष्पक्षता को मान लिया जाता है और किसी वादी की महज आशंका या व्यक्तिगत धारणा के आधार पर न्यायाधीश को मामले से अलग नहीं किया जा सकता है। न्यायमूर्ति शर्मा ने कहा कि किसी वादी को ऐसी स्थिति उत्पन्न करने की अनुमति नहीं दी जा सकती जिससे न्यायिक प्रक्रिया का स्तर गिरे। झूठ चाहे अदालत में या सोशल मीडिया पर हजार बार दोहराया जाए सच नहीं बनता।

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