जेएनयू में मिडनाइट फाइट
विश्वविद्यालय की बनती नई पहचान लाठी-डंडे खूनी घमासान

- विश्वविद्यालय को योजनाबद्ध तरीके से अराजकता का अड्डा साबित करने की मुहिम
- लेफ्ट और एबीवीपी स्टूडेंटस के बीच भिड़ंत, मारपीट पत्थरबाजी एक-दूसरे पर हमले का आरोप
- समानता मार्च में छात्र कर रहे थे वीसी के इस्तीफे की मांग
- समानता मार्च से मिडनाइट हिंसा तक कैसे भड़की जेएनयू की आग?
4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। दिल्ली का जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में दो छात्र संगठनों का वैचारिक टकराव बीती रात हिंसक झड़प में बदल गया। दर्जनों छात्रों को चोटों आयी, खून बहा और हाथ पैर टूटे। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। इससे पहले भी कई बार इस प्रकार की खबरों से दो चार होना पड़ा है। सवाल यही है कि आखिर जिस विश्वविद्यालय की साख पूरी दुनिया में हो वहां इस प्रकार की घटनाएं क्यों घटित हो रही है। सवाल यह भी है कि यह घटनाएं हैं या फिर किसी बड़ी रणनीति की साजिश। क्योंकि आधी रात को लाठी-डंडों, पत्थरों और खून से सना जेएनयू यह बता रहा है कि अब लड़ाई सिर्फ छात्र संगठनों के बीच नहीं रही अब यह लड़ाई विचार बनाम सत्ता की बन चुकी है।
बार-बार हिंसा का अखाड़ा क्यों बन रहा है जेएनयू
सवाल सिर्फ यह नहीं है कि आधी रात को किसने किस पर हमला किया। असली सवाल यह है कि आखिर जेएनयू को बार-बार हिंसा के अखाड़े में क्यों बदला जा रहा है? क्या यह सिर्फ छात्र संगठनों की लड़ाई है या इसके पीछे एक बड़ी राजनीतिक रणनीति काम कर रही है। एक ऐसी रणनीति जिसका मकसद विश्वविद्यालयों से सवाल पूछने की संस्कृति को खत्म करना है। जेएनयू की यह जंग अब सिर्फ कैंपस की नहीं रही। यह जंग इस देश के भविष्य की है। जहां तय होगा कि विश्वविद्यालय विचारों के मंदिर रहेंगे या सत्ता के आदेशों के मौन केंद्र बन जाएंगे।
समानता मार्च से मिडनाइट हिंसा तक कैसे भड़की जेएनयू की आग?
जेएनयू में आधी रात को भड़की हिंसा की चिंगारी दिन में निकले एक विरोध मार्च से जुड़ी बताई जा रही है। यह मार्च कोई साधारण प्रदर्शन नहीं था बल्कि विश्वविद्यालय के कुलपति पर लगाए गए कथित जातिवादी टिप्पणियों के आरोपों के खिलाफ छात्रों का प्रतिरोध था। वामपंथी छात्र संगठनों ने इसे समानता मार्च का नाम दिया था। एक ऐसा मार्च जिसका उद्देश्य सिर्फ विरोध दर्ज कराना नहीं बल्कि विश्वविद्यालय प्रशासन को कठघरे में खड़ा करना भी था। रविवार शाम कैंपस में बड़ी संख्या में छात्र इक_ा हुए। उनके हाथों में पोस्टर थे नारों में आक्रोश था और मांग साफ थी कि कुलपति इस्तीफा दें। छात्रों का आरोप था कि विश्वविद्यालय प्रशासन न सिर्फ संवेदनशील मुद्दों पर चुप्पी साधे हुए है बल्कि जातीय असमानता से जुड़े मामलों को नजरअंदाज भी कर रहा है। समानता मार्च इसी असंतोष का सार्वजनिक विस्फोट था। यह मार्च कैंपस के कई प्रमुख इलाकों से होकर गुजरा और जैसे जैसे भीड़ बढ़ती गई माहौल में तनाव भी महसूस किया जाने लगा।
छात्रों का आरोप एबीवीपी ने रास्ता रोका?
वामपंथी छात्र संगठनों का आरोप है कि मार्च जैसे ही आगे बढ़ा तभी अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ताओं ने रास्ता रोक लिया। उनका कहना है कि यह सिर्फ विरोध नहीं था बल्कि एक सोची समझी रोकथाम थी जिसका मकसद प्रदर्शन को बाधित करना और छात्रों को डराना था। आरोप है कि इसी टकराव के बाद दोनों पक्षों के बीच तीखी बहस शुरू हुई जो जल्द ही धक्का-मुक्की और हाथापाई में बदल गई। देखते ही देखते स्थिति नियंत्रण से बाहर हो गई और कैंपस के कई हिस्सों में अफरा-तफरी फैल गई।
सत्ता से सवाल पूछने की प्रयोगशाला है जेएनयू
जेएनयू कभी सिर्फ एक विश्वविद्यालय नहीं रहा। यह हमेशा वह प्रयोगशाला रहा है जहां सत्ता से सवाल पूछना सिखाया जाता है। जहां गरीब का बेटा प्रधानमंत्री की नीतियों पर बहस करता है। जहां आदिवासी, दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक छात्र अपने अधिकारों की आवाज बनते है। लेकिन अब उसी विश्वविद्यालय को योजनाबद्ध तरीके से अराजकता का अड्डा साबित करने की मुहिम चलाई जा रही है। सवाल यह है किउ क्या यह हिंसा स्वत: हो रही है या इसे एक नैरेटिव बनाने के लिए होने दिया जा रहा है? अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, जिसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का छात्र संगठन माना जाता है वर्षो से जेएनयू में अपनी वैचारिक जमीन तलाश रहा है। लेकिन यहां की ऐतिहासिक रूप से मजबूत वामपंथी छात्र राजनीति जिसका प्रतिनिधित्व स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया और अन्य वाम संगठनों ने किया है ने हमेशा इस विस्तार को चुनौती दी है। यही टकराव अब खुले संघर्ष में बदलता दिखाई दे रहा है। यह सिर्फ पोस्टर और भाषण की लड़ाई नहीं रही अब यह सड़कों पर खून और डर की लड़ाई बन चुकी है।
एबीवीपी ने आरापों को खारिज किया
एबीवीपी ने इन आरोपों को पूरी तरह खारिज किया है। संगठन का दावा है कि उनके छात्र शांतिपूर्वक अपने हास्टल और अकादमिक गतिविधियों में व्यस्त थे जब अचानक वामपंथी संगठनों के कुछ कार्यकर्ताओं ने उन्हें निशाना बनाया। एबीवीपी के अनुसार हमला एकतरफा था और उनके छात्रों को उकसाने और डराने की कोशिश की गई। उनका कहना है कि वे सिर्फ अपनी सुरक्षा के लिए खड़े हुए थे न कि किसी हिंसा की शुरुआत करने के लिए।
जेएनयू हमेशा असहज सवाल
सरकार के लिए जेएनयू हमेशा एक असहज सवाल रहा है। क्योंकि यह वह जगह है जहां छात्र सिर्फ डिग्री नहीं लेते वह सत्ता की नीतियों का विश्लेषण करते हैं उनकी आलोचना करते हैं और वैकल्पिक राजनीति की कल्पना करते हैं। सत्ता को ऐसे विश्वविद्यालयों से डर लगता है। क्योंकि सवाल पूछने वाले छात्र भविष्य में झुकने वाले नागरिक नहीं बनते। यही कारण है कि वर्षों से जेएनयू की छवि को व्यवस्थित रूप से राष्ट्र विरोधी, अराजक और समस्या ग्रस्त बताने की कोशिश की जा रही है। लेकिन इस लड़ाई में सबसे बड़ा नुकसान किसका हो रहा है? न सरकार का, न संगठनों का सबसे बड़ा नुकसान उन छात्रों का हो रहा है जो यहां पढऩे आये हैं। जो अपने परिवार के सपनों को लेकर यहा स्टडी करने आये हैं उनकी किताबें अब डर के साए में बंद हो रही हैं। उसकी लाइब्रेरी अब विचारों की जगह संघर्ष का प्रतीक बन रही है। जेएनयू जो कभी ज्ञान का किला था अब वैचारिक कब्ज़े की जंग का मैदान बनता जा रहा है।



