मिर्जापुर का वह खास स्थल, जहां से तय होता है पूरे भारत का समय; उपेक्षा का शिकार बनी ‘सूर्य घड़ी’
मिर्जापुर के विंध्याचल में स्थित वह खास स्थल जहां से तय होता है पूरे भारत का मानक समय (IST)। 82.5° पूर्वी देशांतर रेखा पर बनी सूर्य घड़ी आज बदहाली का शिकार है। जानिए इस वैज्ञानिक और ऐतिहासिक धरोहर की पूरी कहानी।

4पीएम न्यूज नेटवर्कः उत्तर प्रदेश का मिर्जापुर जिला आमतौर पर मां विंध्यवासिनी धाम के लिए जाना जाता है। हर साल लाखों श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए पहुंचते हैं। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इसी विंध्याचल की धरती पर एक ऐसा स्थल भी मौजूद है, जहां से पूरे भारत का मानक समय यानी Indian Standard Time (IST) तय होता है।
धार्मिक आस्था और वैज्ञानिक महत्व को एक साथ समेटे यह स्थान आज उपेक्षा और बदहाली का शिकार बना हुआ है। जिस जगह से देश की घड़ियां समय तय करती हैं, वही स्थल अब अपनी पहचान बचाने के लिए संघर्ष करता दिखाई दे रहा है।
आखिर कहां स्थित है यह महत्वपूर्ण स्थल?
यह खास स्थान मिर्जापुर-प्रयागराज मार्ग पर विंध्याचल क्षेत्र के अमरावती चौराहे के पास स्थित है। जिला मुख्यालय से लगभग 10 किलोमीटर दूर मौजूद इस स्थल को “सूर्य घड़ी” के नाम से जाना जाता है।
यहीं से गुजरती है 82°30’ पूर्वी देशांतर रेखा, जिसे भारत की आधिकारिक मानक समय रेखा माना जाता है। इसी आधार पर पूरे देश में एक समान समय लागू किया जाता है। भारत ने 1 सितंबर 1947 को इंडियन स्टैंडर्ड टाइम (IST) को आधिकारिक रूप से अपनाया था और उसके लिए इसी देशांतर रेखा को मानक माना गया।
क्या है इसका वैज्ञानिक महत्व?
भूगोल और खगोल विज्ञान के दृष्टिकोण से यह स्थान बेहद अहम माना जाता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, भारत की पूर्व-पश्चिम भौगोलिक दूरी को देखते हुए 82.5° पूर्वी देशांतर रेखा देश का मध्य समय बिंदु बनती है। यही कारण है कि पूरे भारत में समय की एकरूपता बनाए रखने के लिए इसी रेखा को आधार बनाया गया। वर्ष 2007 में SPACE (Science Popularisation Association of Communicators and Educators) संस्था ने इस स्थल को आधिकारिक रूप से भारत के केंद्रीय समय बिंदु यानी “टाइम मेरिडियन” के रूप में चिन्हित किया था। संस्था द्वारा किए गए शोध में यह स्पष्ट किया गया कि यह स्थान भारत के मानक समय निर्धारण का वैज्ञानिक केंद्र है।
धार्मिक और वैज्ञानिक विरासत का अनोखा संगम
विंध्याचल पहले से ही धार्मिक दृष्टि से देश का बड़ा केंद्र माना जाता है। मां विंध्यवासिनी धाम के कारण यहां हर दिन हजारों श्रद्धालु पहुंचते हैं। ऐसे में यह स्थल आस्था के साथ-साथ विज्ञान और भूगोल के छात्रों के लिए भी अध्ययन का बड़ा केंद्र बन सकता था। विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि इस स्थान को बेहतर तरीके से विकसित किया जाए, तो यह देश का एक प्रमुख शैक्षणिक और पर्यटन केंद्र बन सकता है।
कभी बना था सेल्फी प्वाइंट, अब बदहाल
स्थानीय प्रशासन ने कुछ वर्ष पहले इस जगह का सौंदर्यीकरण कराया था। यहां छोटा पार्क, स्मारक और “सूर्य घड़ी” बनाई गई थी ताकि लोग इस स्थल के महत्व को समझ सकें। तत्कालीन जिलाधिकारी दिव्या मित्तल ने इसे सेल्फी प्वाइंट के रूप में भी विकसित कराया था। उद्देश्य यह था कि देशभर से आने वाले लोग यहां रुकें, जानकारी लें और इस ऐतिहासिक स्थल को पहचान मिले। लेकिन मौजूदा समय में हालात पूरी तरह बदल चुके हैं।
गंदगी, टूटी संरचनाएं और गायब होती पहचान
आज यह पूरा क्षेत्र बदहाली की तस्वीर पेश कर रहा है। सेल्फी प्वाइंट जीर्ण-शीर्ण अवस्था में पहुंच चुका है। बिजली व्यवस्था ठप है, आसपास गंदगी फैली हुई है और सूचना पट्टों पर लिखे शब्द तक मिटने लगे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि शुरुआती दिनों में यहां काफी लोग रुकते थे, लेकिन अब देखरेख के अभाव में यह स्थल धीरे-धीरे अपनी पहचान खोता जा रहा है।
बड़ा सवाल: क्या देश के इस महत्वपूर्ण स्थल को बचाया जाएगा?
जिस जगह से भारत का समय तय होता है, अगर वही स्थान उपेक्षित हो जाए तो यह सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि देश की वैज्ञानिक विरासत की अनदेखी भी है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस स्थल को राष्ट्रीय स्तर पर संरक्षित किए जाने की जरूरत है। यहां वैज्ञानिक जानकारी केंद्र, डिजिटल डिस्प्ले और पर्यटन सुविधाएं विकसित की जाएं, ताकि आने वाली पीढ़ियां इस ऐतिहासिक और वैज्ञानिक धरोहर को समझ सकें।
मिर्जापुर का यह सूर्य घड़ी स्थल सिर्फ एक स्मारक नहीं, बल्कि भारत की समय व्यवस्था का प्रतीक है। यह वह जगह है जहां विज्ञान, भूगोल, इतिहास और आस्था एक साथ दिखाई देते हैं। जरूरत सिर्फ इतनी है कि शासन-प्रशासन और समाज मिलकर इस धरोहर को फिर से उसकी पहचान दिलाएं, ताकि देश का यह “टाइम पॉइंट” आने वाले वर्षों में गर्व का केंद्र बन सके।
रिपोर्ट-संतोष देव गिरी
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