SC की फटकार के बाद झुकी Modi सरकार, मानी अपनी गलती

जब कक्षा 8 की NCERT की नई किताब में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार से जुड़ा एक चैप्टर शामिल होने की बात सामने आई...

4पीएम न्यूज नेटवर्क: हाल ही में एक बड़ा विवाद उस समय खड़ा हो गया…जब कक्षा 8 की NCERT की नई किताब में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार से जुड़ा एक चैप्टर शामिल होने की बात सामने आई…

ये मामला सीधे देश की सर्वोच्च न्यायिक संस्था यानी Supreme Court of India तक पहुंच गया…जैसे ही भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने इस पर कड़ा रुख अपनाया और कहा कि वो इस मामले को खुद देखेंगे…उसके बाद केंद्र की मोदी सरकार और शिक्षा मंत्रालय में हलचल मच गई…खबरों के अनुसार, CJI सूर्यकांत ने साफ शब्दों में कहा कि…न्यायपालिका जैसी संवैधानिक संस्था को बदनाम करने की इजाजत किसी को नहीं दी जा सकती…उन्होंने ये भी संकेत दिया कि अदालत इस मुद्दे पर खुद संज्ञान लेने पर विचार कर रही है…ये बयान आते ही केंद्र सरकार बैकफुट पर नजर आई और NCERT को सफाई देनी पड़ी….

ये पूरा विवाद उस चैप्टर को लेकर है…जिसमें कथित तौर पर न्यायपालिका में भ्रष्टाचार जैसे विषय को बच्चों के पाठ्यक्रम में शामिल किया गया…आम जनता के लिए समझना जरूरी है कि 8वीं कक्षा के बच्चे अभी संवैधानिक संस्थाओं की गहराई से समझ विकसित कर रहे होते हैं…ऐसे में अगर उन्हें ये मैसेज जाए कि न्यायपालिका भ्रष्ट है…तो इससे उनकी सोच पर क्या असर पड़ेगा?….इसी बात को लेकर चिंता जताई गई….वरिष्ठ वकील और सांसद कपिल सिब्बल ने भी इस मुद्दे को अदालत के सामने उठाया…..उन्होंने कहा कि बार की ओर से ये शिकायत की जा रही है कि बच्चों को इस तरह की शिक्षा देना बेहद चिंताजनक है….जिसके बाद इस पर सीजेआई सूर्यकांत ने जवाब देते हुए कहा कि…बार और बेंच दोनों ही चिंतित हैं…कई हाईकोर्ट के जज भी परेशान हैं और वो खुद इस मामले पर संज्ञान लेंगे….

जैसे ही ये सख्त रुख सामने आया…वैसे ही केंद्र सरकार की ओर से चुप्पी साध ली गई….लेकिन दबाव बढ़ता गया और आखिरकार NCERT को बयान जारी करना पड़ा कि…किताब में जो सामग्री शामिल हुई है….वो अनजाने में हुई गलती है…उन्होंने इस पर खेद जताया और कहा कि विवादित चैप्टर को फिर से लिखा जाएगा…इतना ही नहीं, संबंधित किताब की बिक्री पर भी रोक लगा दी गई…ये कदम साफ तौर पर दिखाता है कि मामला गंभीर था और सरकार को अपनी स्थिति संभालनी पड़ी…लेकिन ऐसे में अब सवाल ये उठता है कि…अगर ये गलती थी तो इतनी बड़ी गलती कैसे हो गई?….क्या शिक्षा मंत्रालय ने सामग्री की समीक्षा नहीं की?…क्या SYLLABUS तय करते समय पूरी जांच-पड़ताल नहीं की गई?…

ऐसे में ये समझना जरूरी है कि NCERT की किताबें सीधे केंद्र सरकार के शिक्षा मंत्रालय के अधीन आती हैं…यानी बिना मंत्रालय की मंजूरी के कोई भी महत्वपूर्ण बदलाव या चैप्टर शामिल नहीं होता…ऐसे में ये सवाल उठना स्वाभाविक है कि शिक्षा मंत्रालय ने इस सामग्री को कैसे अनुमति दी?…क्या किसी ने ये नहीं सोचा कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार जैसे संवेदनशील विषय को किस तरह और किस स्तर पर पढ़ाया जाना चाहिए?…अगर ये विषय शोध और तथ्यों के साथ उच्च कक्षाओं में विश्लेषणात्मक रूप से पढ़ाया जाए तो बात अलग है…लेकिन 8वीं कक्षा के बच्चों के लिए इसे किस रूप में पेश किया गया…ये सबसे बड़ा सवाल है…

सीजेआई सूर्यकांत का ये कहना कि मैं किसी को भी संस्था को बदनाम नहीं करने दूंगा…एक साफ संदेश था….इसका मतलब ये है कि न्यायपालिका अपनी गरिमा और विश्वसनीयता को लेकर बेहद सतर्क है…उन्होंने ये भी कहा कि कानून अपना काम करेगा…यानी अगर किसी ने जानबूझकर संस्था की छवि खराब करने की कोशिश की है…तो उसके खिलाफ कार्रवाई हो सकती है…….दोस्तों, जब देश की सर्वोच्च अदालत का प्रमुख इस तरह का सख्त बयान देता है….तो स्वाभाविक है कि सरकार पर दबाव बढ़ता है….यही कारण है कि NCERT ने तुरंत अपनी गलती स्वीकार की और किताब की बिक्री रोक दी….

वहीं इस पूरे घटनाक्रम को कई लोग इस तरह से देख रहे हैं कि सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद सरकार को झुकना पड़ा….अगर CJI सूर्यकांत सख्ती न दिखाते…तो क्या NCERT इतनी जल्दी अपनी गलती मानती?….क्या किताब की बिक्री पर रोक लगती?….ये सवाल जनता के मन में है….हालांकि, सरकार की ओर से पहले कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया नहीं आई….लेकिन जैसे ही मामला न्यायपालिका के उच्च स्तर पर पहुंचा….तुरंत सुधारात्मक कदम उठाए गए….इससे ये संदेश जाता है कि जब तक दबाव न बने…तब तक जिम्मेदार संस्थाएं सक्रिय नहीं होतीं…..

यहां पर ध्यान देने वाली बात ये भी है कि…शिक्षा का क्षेत्र बेहद संवेदनशील होता है…जो कुछ बच्चों को किताबों में पढ़ाया जाता है….वही उनकी सोच और समझ की नींव बनता है…अगर NCERT जैसी किताबों में किसी संस्था के बारे में नकारात्मक या अधूरी जानकारी दी जाती है…तो उसका असर लंबे समय तक रहता है….इसलिए syllabus तैयार करते समय संतुलन, तथ्यों की जांच और संवैधानिक मूल्यों का ध्यान रखना बेहद जरूरी है…ऐसे में अगर कोई चूक हुई है…तो उसकी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए…

सरकार के आलोचकों का कहना है कि शिक्षा मंत्रालय को पहले ही इस सामग्री की गहन समीक्षा करनी चाहिए थी…अगर ये अध्याय विवादित था…तो विशेषज्ञों की समिति से राय ली जानी चाहिए थी…अब लोग सवाल उठा रहे हैं कि क्या ये केवल लापरवाही थी या किसी खास सोच के तहत इसे शामिल किया गया?…और ये सवाल अभी भी खुला है…हालांकि NCERT ने इसे अनजाने में हुई गलती बताया है…लेकिन इतनी बड़ी संस्था से ऐसी गलती कैसे हो सकती है, ये समझ से परे है…

वहीं दूसरी ओर, कुछ लोग ये भी कह रहे हैं कि…भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों पर चर्चा से पूरी तरह बचना भी ठीक नहीं है…लेकिन फर्क इस बात का है कि चर्चा किस स्तर पर और किस भाषा में हो…बच्चों को संस्थाओं की कमियों के साथ-साथ उनकी भूमिका, सुधार की प्रक्रिया और संवैधानिक ढांचे की मजबूती भी बताई जानी चाहिए….क्योंकि केवल NEGATIVE SIDE दिखाना संतुलित शिक्षा नहीं कहलाता…और यही चिंता अदालत और कई वरिष्ठ वकीलों ने जताई….

कपिल सिब्बल द्वारा ये मुद्दा उठाए जाने के बाद CJI का कहना कि…मैंने संज्ञान ले लिया है….इस बात का संकेत है कि अदालत इस मामले को गंभीरता से देख रही है…उन्होंने इसे एक सोचा-समझा कदम….जैसा बताया….हालांकि उन्होंने ज्यादा टिप्पणी करने से परहेज किया…इसका मतलब ये हो सकता है कि अदालत आगे इस पर विस्तार से सुनवाई कर सकती है या आवश्यक दिशा-निर्देश जारी कर सकती है…अगर ऐसा होता है…तो ये शिक्षा व्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश होगा कि…संवैधानिक संस्थाओं से जुड़ी सामग्री बेहद सावधानी से तैयार की जाए….क्योंकि अगर बात न्यायपालिका में भ्रष्टाचार की…की जा रही है…तो क्या सिर्फ जज ही भ्रष्टाचार में लिप्ट हैं?…कोई नेता या सांसद क्यों नहीं?….क्यों नेताओं के बारे में कोई चैप्टर नहीं ADD किया गया?…ऐसे ही कई गंभीर सवाल उठ रहे हैं….

लेकिन, इस पूरे घटनाक्रम से एक बात तो साफ होती है दोस्तों कि…लोकतंत्र में संस्थाओं के बीच संतुलन बेहद जरूरी है…जब एक संस्था से चूक होती है….तो दूसरी संस्था उसे सुधारने का काम करती है…यहां सुप्रीम कोर्ट ने अपनी भूमिका निभाई और सरकार को बैकफुट पर आना पड़ा….जोकि आम जनता के लिए ये एक उदाहरण है कि न्यायपालिका अब भी सक्रिय है और जरूरत पड़ने पर हस्तक्षेप कर सकती है….

जिसके बाद ये मामला केवल एक किताब या एक चैप्टक का नहीं रह गया है…ये उस जिम्मेदारी का सवाल है जो सरकार और शिक्षा मंत्रालय पर होती है…क्योंकि, बच्चों की शिक्षा केवल जानकारी देना नहीं है…बल्कि उन्हें सही दिशा में सोचने के लिए तैयार करना है….अगर SYLLABUS में गलती होती है…तो उसे स्वीकार करना अच्छी बात है…लेकिन उससे भी जरूरी है कि….भविष्य में ऐसी गलती न दोहराई जाए…सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बाद सरकार का झुकना इस बात का संकेत है कि जवाबदेही तय हो सकती है….अब जनता की नजर इस बात पर टिकी हुई है कि आगे क्या कदम उठाए जाते हैं और क्या शिक्षा मंत्रालय इस घटना से सबक लेता है या नहीं..

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