नवरात्र के तीसरे दिन मां विंध्यवासिनी के चंद्रघंटा स्वरूप की पूजा, जानें इस दिन का खास महत्व

नवरात्र के तीसरे दिन मिर्जापुर के विंध्याचल धाम में मां विंध्यवासिनी के चंद्रघंटा स्वरूप की पूजा की जाती है। जानें इस स्वरूप का धार्मिक महत्व, हलुआ-पूड़ी के भोग की मान्यता और श्रद्धालुओं की आस्था।

4पीएम न्यूज नेटवर्क: नवरात्र के तीसरे दिन विंध्याचल धाम में मां विंध्यवासिनी के चंद्रघंटा स्वरूप की आराधना का विशेष महत्व है। मान्यता है कि मां का यह स्वरूप भक्तों को साहस, ऊर्जा और शांति प्रदान करता है। विंध्य पर्वत और मां गंगा के पावन तट पर स्थित शक्तिपीठ में श्रद्धालु माता के दर्शन-पूजन कर सुख-समृद्धि और मनोकामना पूर्ति की प्रार्थना करते हैं।

नवरात्र के तीसरे दिन चंद्रघंटा स्वरूप की आराधना

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां दुर्गा के नौ स्वरूपों में तीसरा स्वरूप मां चंद्रघंटा का है। उनके मस्तक पर अर्धचंद्र सुशोभित होने के कारण उन्हें चंद्रघंटा कहा जाता है। मान्यता है कि मां का यह स्वरूप दुष्टों का संहार करने के साथ भक्तों के भय और कष्ट दूर करता है। विंध्याचल स्थित मां विंध्यवासिनी मंदिर में इस दिन विशेष श्रद्धा के साथ पूजा-अर्चना की जाती है।

घंटे की ध्वनि और हलुआ-पूड़ी के भोग का महत्व

धार्मिक मान्यताओं में मंदिरों में घंटा बजाने का विशेष महत्व बताया गया है। श्रद्धालु मानते हैं कि घंटे की ध्वनि से वातावरण में सकारात्मकता आती है और मन एकाग्र होता है। मां चंद्रघंटा को हलुआ-पूड़ी का भोग अर्पित करने की भी परंपरा है। भक्त इसे श्रद्धा और आस्था के साथ माता के चरणों में समर्पित करते हैं।

दर्शन-पूजन से ऊर्जा और शांति मिलने की मान्यता

विंध्याचल धाम पहुंचने वाले श्रद्धालुओं का कहना है कि मां विंध्यवासिनी के दर्शन से उन्हें मानसिक शांति और नई ऊर्जा का अनुभव होता है। कई भक्त वर्षों से देवी पाठ और पूजा-अर्चना करते आ रहे हैं। नवरात्र के नौ दिनों में मां के अलग-अलग स्वरूपों की आराधना को विशेष फलदायी माना जाता है। श्रद्धालुओं की आस्था है कि माता की उपासना उन्हें कठिनाइयों का सामना करने का साहस देती है और सदमार्ग पर चलने की प्रेरणा प्रदान करती है।

रिपोर्ट – संतोष देव गिरी, मिर्ज़ापुर

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