बिजली कटौती पर अंधभक्तों को नेहा ने सुनाई खरी-खोरी
भाजपा राज में लोग बदहाल के जीने को मजबूर हैं। कभी बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी से तो कभी हिन्दू-मुसलमान की घटिया राजनीति से। लेकिन इन सबके बीच सूबे में एक समस्या ने और बड़ी जगह बना ली है।

4पीएम न्यूज नेटवर्क: भाजपा राज में लोग बदहाल के जीने को मजबूर हैं। कभी बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी से तो कभी हिन्दू-मुसलमान की घटिया राजनीति से। लेकिन इन सबके बीच सूबे में एक समस्या ने और बड़ी जगह बना ली है। दरअसल बढ़ती गर्मी और तपन के बीच बिजली कटौती की समस्या का सामना लोगों को करना पड़ रहा है।
जिसे लेकर सड़कों पर है और बीजेपी सरकार सवालों के घेरे में। आलम ये है कि गांवों से लेकर शहरों तक लोग घंटों बिजली न रहने की शिकायत कर रहे हैं। गर्मी के मौसम में जब तापमान लगातार बढ़ रहा है, तब बिजली की कमी आम जनता की मुश्किलों को और बढ़ा रही है। किसान सिंचाई नहीं कर पा रहे, छोटे दुकानदारों का काम प्रभावित हो रहा है और बच्चों की पढ़ाई तक पर असर पड़ रहा है। जिसपर विपक्ष भी आग बबूला है। वहीं इसी बीच योगी सरकार और भाजपाइयों को घेरते हुए लोकगायिका नेहा सिंह राठौर ने जोरदार हमला बोला है।
तंज भरे लहजे में उन्होंने सोशल मीडिया पर एक वीडियो पोस्ट किया। सोशल मीडिया पर भाजपा और उसके समर्थकों पर तंज कसते हुए लिखा कि “आपके घर में बिजली नहीं तो क्या हुआ! अब्दुल के घर में भी तो अंधेरा होगा! अब यही सोच-सोचकर दिल को ठंडक दीजिए।” उनका यह बयान सीधे तौर पर उस राजनीति पर सवाल उठाता है जिसमें जनता की असली समस्याओं से ध्यान हटाकर धर्म और समुदाय के नाम पर लोगों को बांटने की कोशिश की जाती है।
बीजेपी सरकार हमेशा विकास, बेहतर बिजली व्यवस्था और “24 घंटे बिजली” देने के दावे करती रही है। चुनावों के समय बड़े-बड़े वादे किए गए कि उत्तर प्रदेश को बिजली संकट से पूरी तरह मुक्त कर दिया जाएगा। लेकिन आज भी कई इलाकों में लोग घंटों कटौती झेल रहे हैं। गांवों में रातभर बिजली नहीं रहती, जबकि शहरों में भी बार-बार सप्लाई बाधित हो रही है। जनता सवाल पूछ रही है कि जब सरकार इतने बड़े दावे करती है, तो फिर हर साल गर्मियों में बिजली व्यवस्था क्यों चरमरा जाती है? करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद लोगों को राहत क्यों नहीं मिल पा रही?
नेहा सिंह राठौर की पोस्ट इसी बात को उजागर करती है कि कुछ लोग अपनी परेशानियों पर सवाल उठाने के बजाय केवल यह सोचकर संतोष कर लेते हैं कि “दूसरे समुदाय” के लोग भी परेशान होंगे। यह मानसिकता लोकतंत्र और समाज दोनों के लिए नुकसानदायक है। सरकार की जिम्मेदारी होती है कि वह सभी नागरिकों को बराबरी से सुविधाएं दे, चाहे उनका धर्म या जाति कुछ भी हो। लेकिन जब जनता बिजली, रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे असली मुद्दों पर सवाल पूछना छोड़ देती है, तब सरकार की जवाबदेही भी कमजोर हो जाती है।
हालाँकि बात की जाए बिजली समस्या की तो इसपर बीजेपी में आपस में भी कलह मची हुई है। दरअसल हाल ही में बिजली कटौती को लेकर एक मामला काफी चर्चा में रहा, जहाँ एक महिला ने अपने इलाके में लगातार बिजली जाने से परेशान होकर बीजेपी नेता को जमकर डांट लगा दी। महिला ने गुस्से में कहा, “खाक बीजेपी नेता हो”, क्योंकि कई घंटों तक बिजली न आने से लोगों को गर्मी और परेशानी का सामना करना पड़ रहा था। बताया गया कि नेता की पत्नी ने भी घर में बिजली समस्या को लेकर नाराज़गी जताई, जिसके बाद बीजेपी नेता खुद पावर हाउस पहुँच गए और धरने पर बैठ गए। इस घटना ने दिखाया कि आम जनता ही नहीं, बल्कि नेताओं के परिवार भी बिजली व्यवस्था से परेशान हैं।
बीजेपी सरकार पर विपक्ष लगातार आरोप लगाता रहा है कि वह असली समस्याओं से ध्यान हटाने के लिए धार्मिक और भावनात्मक मुद्दों को ज्यादा उछालती है। बिजली संकट जैसे मुद्दों पर ठोस समाधान देने के बजाय प्रचार और भाषणों पर ज्यादा जोर दिखाई देता है। और भाजपा सरकार को बिजली कटौती जैसे मुद्दे असली मुद्दे नहीं लगते हैं, तभी तो अपनी राजनीतिक दूकान चमकाने के लिए बस हिन्दू-मुसलमान किया जाता है।



