अब आवाज दबेगी नहीं, संजय शर्मा के साथ खड़ा हुआ ‘द हिंदू’ अखबार

- सच की लड़ाई को मिला साथ, प्रेस की आजादी की नई शुरुआत
- संजय शर्मा के संघर्ष को द हिंदू ने फुल पेज छाप कर उठाई आवाज
- क्या सेफ हार्बर का ढांचा अब कंट्रोल का टूल बनता जा रहा है?
4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। आज की सबसे बड़ी खबर यही है कि द हिंदू जैसे देश के प्रतिष्ठित अंग्रेजी अखबार ने 4PM और उसके संपादक संजय शर्मा के साथ हो रही एकतरफा सरकारी कार्रवाई, उनके चैनल पर पाबंदी को प्रमुखता से स्थान दिया है। इस सम्मानित मीडिया हाउस द्वारा इस मुद्दे को प्रमुखता देना इसी दिशा में एक संकेत देता है अब देश में प्रेस की आजादी एक ज्वलंत मुद्दा बन रही है और एक सवाल बनती जा रही है। 4PM पर पाबंदी अब सिर्फ एक चैनल की कहानी नहीं रही। बार-बार की ब्लॉकिंग और हर बार का वही पुराना पाबंदी का पैटर्न, क्या यह महज संयोग है या फिर एक सुनियोजित रणनीति है, जहां डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर दबाव बनाकर आलोचनात्मक आवाजों को सीमित किये जाने की कोशिश की जा रही है। द हिंदू में छपी यह ग्राउंड रिपोर्ट साफ कहती है कि सेफ हार्बर अब सुरक्षित नहीं रहा। जिस कानून का मकसद डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को सुरक्षा देना था वही अब कंटेंट कंट्रोल का औजार बनता नजर आ रहा है। सवाल यह भी है कि जब प्लेटफॉर्म्स पर दबाव होगा तो क्या वह सच दिखा पाएंगे या सिर्फ सुरक्षित चलने की कोशिश करेंगे। गौरतलब है कि यह बात सिर्फ 4PM की नहीं है। यह हर उस पत्रकार की है जो बिना डर के सच दिखाना चाहता है। यह हर उस नागरिक की है जो सवाल पूछना चाहता है।
9 वर्षों से पीछे पड़ी है सरकार
वर्ष 2017 के बाद से ही 4PM के संपादक संजय शर्मा पर सरकारी उत्पीडऩात्मक कार्रवाई जारी है। सरकार के अधिकार क्षेत्र में आने वाले सभी सरकारी टूल जांच एजेंसियों पुलिस, ईडी, एसटीएफ आदि का इस्तेमाल संजय शर्मा के उत्पीडऩ करने में किया जा चुका है। उनके इरादों को दबाने के लिए ईओडब्ल्यू की जांच शुरू की गयी। उनके सवालों से बचने के लिए सरकार ने इनकम टैक्स विभाग के नोटिस जारी किये। उनको ईडी के जरिये डराये जाने की कोशिश की गयी। उनको दबाने के लिए एसटीएफ को लगाया गया गाड़ी का पीछा करना तो आम बात हो गयी। संजय शर्मा के 4PM दफ्तर पर सरकारी गुंडो ने हमला किया। यह बताने के लिए काफी है कि संजय शर्मा के पीछे किस तरह से सरकार हाथ धो कर पीछे पड़ी है। कहा जाता है कि लोकतंत्र में सवाल पूछना पत्रकार का धर्म है। अगर वही सवाल असुविधाजनक हो जाएं तो वहीं होता है जो संजय शर्मा के साथ हो रहा है। चैनल पर पाबंदी और व्यक्ति को डारने के लिए तरह-तरह के हथकंडे। यह सिर्फ एक व्यक्ति की कहानी नहीं है। यह उस माहौल की कहानी है जहां पत्रकारिता और सत्ता के बीच की दूरी कितनी बची है यह कहना कठिन हो गया है। अगर एक आवाज बार बार कार्रवाई के घेरे में आती है तो सवाल सिर्फ उस आवाज पर नहीं उठता बल्कि उस व्यवस्था पर उठता है जिसमें यह सब हो रहा है।
एक पत्थर तो तबियत से उछाला जाए
एक दो दिन की बात हो तो समझ में आती है। लेकिन लगातार हो रहे सरकारी उत्पीड़न को यदि किसी व्यक्ति ने हिम्मत के साथ सामना किया है तो वह 4PM के संपादक संजय शर्मा हैं। 9 वर्षों से सरकारी उत्पीड़न झेल रहे संजय शर्मा ने हार नहीं मानी और संघर्ष का साथ नहीं छोड़ा। उनके संघर्ष को देखकर अब बड़े मीडिया संस्थान, बड़े अखबार और पत्रकारों के बड़े समूह उनका साथ देने खुलकर मैदान में आ चुके हैं। राज्यसभा में संजय शर्मा के उत्पीडऩ का मुद्दा जब उठा तो पिन ड्राप सायलंस छा गया। प्रेस क्लब ऑफ इंडिया ने जब उनके उत्पीडऩ के खिलाफ चिट्ठी लिखी तो उसका जवाब अभी तक नहीं मिला। एक बार फिर उनके संघर्ष को द हिंदू जैसे प्रतिष्ठित अखबार ने सराहा है और फुल पेज स्टोरी में प्रमुखता से जगह दी है।
द हिंदू में छपी रिपोर्ट गहरी तस्वीर पेश करती है
द हिंदू की ग्राउंड रिपोर्ट फॉर फ्राम सेफ हार्बर भारत में डिजिटल मीडिया और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर बढ़ते दबाव की गहरी तस्वीर पेश करती है। रिपोर्ट बताती है कि किस तरह सेफ हार्बर के नाम पर बने नियम अब कंटेंट हटाने और आलोचनात्मक आवाजों को सीमित करने का जरिया बनते जा रहे हैं। आर्टिकल में 4PM के संपादक संजय शर्मा का उदाहरण सामने आता है जो पहले एक अखबार के संपादक थे और बाद में डिजिटल प्लेटफॉर्म 4PM के जरिए अपनी पत्रकारिता को जारी रखे हुए हैं। रिपोर्ट बताती है कि उनके कंटेंट और चैनल पर कई बार कार्रवाई हुई चैनल को बिना किसी नोटिस के ब्लॉक कर दिया गया। यह घटनाक्रम इस बात की ओर इशारा करता है कि स्वतंत्र और आलोचनात्मक मीडिया पर निगरानी और दबाव बढ़ रहा है।
संजय शर्मा एक केस स्टडी
4PM के संपादक संजय शर्मा का मामला इस पूरे मुद्दे को समझने का एक उदाहरण बन चुका है। पारंपरिक मीडिया से लेकर डिजिटल प्लेटफॉर्म तक उनकी यात्रा लगातार संघर्ष से भरी रही है। उनके कंटेंट पर बार-बार कार्रवाई चैनल ब्लॉकिंग और कानूनी दबाव यह दिखाते हैं कि कैसे एक स्वतंत्र आवाज को सीमित करने की कोशिश की जा रही है। लेकिन इसके बावजूद उन्होंने अपनी पत्रकारिता जारी रखी जो इस बात का संकेत है कि डिजिटल युग में भी प्रतिरोध संभव है। लेकिन असली समस्या यह है कि संवेदनशील की परिभाषा स्पष्ट नहीं है। इससे कई बार आलोचनात्मक या असहज सवाल पूछने वाला कंटेंट भी हट जाता है। प्लेटफॉर्म्स कानूनी जोखिम से बचने के लिए अक्सर बिना ज्यादा जांच के कंटेंट हटा देते हैं जिसे एक्सपट्र्स ओवर कम्प्लायंस कहते हैं और इसका असर सीधे लोकतंत्र पर पड़ता है क्योंकि डिजिटल प्लेटफॉर्म आज आम नागरिक की आवाज बन चुके हैं। ऐसे माहौल में जब बड़े मीडिया संस्थान भी इन मुददों में शामिल होने लगते हैं और मुद्दे को उठाने लगते हैं तो वह सिर्फ घटना नहीं रह जाती बल्कि एक आंदोलन का रूप ले लेती है।
सेफ हार्बर का ढांचा अब कंट्रोल का टूल बनता जा रहा है?
रिपोर्ट में इन्फर्मोशन टेक्नोलॉजी एक्ट 2000 और उसके तहत आने वाले नियमों खासकर सेफ हार्बर प्रावधान का जिक्र है जिसके तहत प्लेटफॉर्म्स को कानूनी सुरक्षा मिलती है। लेकिन शर्त यह है कि वह सरकारी आदेश मिलने पर कंटेंट तेजी से हटाएं। इससे प्लेटफॉर्म्स पर दबाव बनता है कि वह विवादास्पद या सरकार की आलोचना करने वाले कंटेंट को तुरंत हटा दें। रिपोर्ट यह भी बताती है कि हाल के वर्षों में कंटेंट हटाने की प्रक्रिया तेज हुई है और ज्यादातर मामलों में पारदर्शिता की कमी देखी गई है। सरकार द्वारा बनाए गए पोर्टल्स और मैकेनिज्म के जरिए बड़ी संख्या में पोस्ट और अकाउंट्स पर कार्रवाई हुई है। लेकिन यह स्पष्ट नहीं होता कि कितनी सामग्री हटाई गई और किन आधारों पर इन्हें डिलीट किया गया। एक्सपर्ट का मानना है कि यह ट्रेंड अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए चुनौती बन सकता है क्योंकि इसमें ओवर-कम्प्लायंस यानी जरूरत से ज्यादा कंटेंट हटाने का खतरा है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि कई बार आलोचनात्मक और विपक्षी विचारों को टारगेट किया जाता है जिससे लोकतांत्रिक संवाद प्रभावित होता है। कुल मिलाकर यह आर्टिकल एक बड़े सवाल को सामने रखता है कि क्या डिजिटल इंडिया में अभिव्यक्ति की आजादी सुरक्षित है या फिर सेफ हार्बर का ढांचा अब कंट्रोल का टूल बनता जा रहा है?




