केरल में सतीशन की शपथ राहुल की वापसी का शंखनाद!

  • राज्य में राहुल की टीम को मिला ब्रेकथ्रू
  • नेता प्रतिपक्ष लोस को लंबे समय से थी तलाश

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
तिरुवनंतपुरम। केरल के नए मुख्यमंत्री के रूप में कांग्रेस के वीडी सतीशन को आज तिरुवनंतपुरम के सेंट्रल स्टेडियम में आयोजित एक भव्य समारोह में राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर ने पद की शपथ दिलाई । उनके शपथ ग्रहण समारोह में राहुल गांधी, प्रियंका गांधी वाड्रा, कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे समेत पार्टी के कई वरिष्ठ नेता शामिल हुए। नई सरकार में आईयूएमएल के पीके कुन्हालीकुट्टी, कांग्रेस के रमेश चेन्निथला, सनी जोसेफ, के. मुरलीधरन, मॉन्स जोसेफ, आरएसपी नेता, शिबु बेबी जॉन और केरल कांग्रेस (जेकब) के, अनूप जैकब जैसे वरिष्ठ नेताओं को शामिल किया गया है। खास बात यह है कि सतीशन मंत्रिमंडल में शपथ लेने वाले 14 विधायक पहली बार मंत्री बने हैं। वीडी सतीशन के शपथ ग्रहण के साथ ही केरल में सीपीआई(एम) के दिग्गज नेता पिनाराई विजयन के एक दशक लंबे शासन का औपचारिक रूप से अंत हो गया। दिवंगत पूर्व मुख्यमंत्री ओमन चांडी के नेतृत्व में कांग्रेस के आखिरी बार सत्ता में आने के 15 साल बाद कांग्रेस नेतृत्व वाला यूडीएफ सत्ता में वापस लौटा है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने इस अवसर पर कहा कि ये केरल की ऐतिहासिक जीत है और हम सभी को इसकी बहुत खुशी है। राहुल गांधी ने कहा कि केरल के लोगों के लिए बहुत खास दिन है क्योंकि लंबे समय बाद यूडीएफ सत्ता में आया है। हाल ही में संपन्न चुनाव में यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) ने जबरदस्त वापसी करते हुए 14० सदस्यों वाली विधानसभा में 1०2 सीटें जीतीं, जबकि अकेले कांग्रेस ने रिकॉर्ड 63 सीटें हासिल कीं जो राज्य में उसका अब तक का सबसे बेहतरीन प्रदर्शन है।

 

दिलचस्प चेहरा बनकर उभरे सतीशन

इस पूरी कहानी का सबसे दिलचस्प चेहरा बनकर उभरे वीडी सतीशन। ऐसा नेता जो राष्ट्रीय मीडिया की चमक दमक में भले कम दिखाई देता हो लेकिन जमीन पर लगातार लड़ता रहा। पांच साल तक उन्होंने विपक्ष की भूमिका को सिर्फ बयानबाजी तक सीमित नहीं रहने दिया। विधानसभा के भीतर सरकार को घेरा सड़कों पर जनता के मुद्दे उठाए और कांग्रेस कार्यकर्ताओं में नई ऊर्जा भरी। यही वजह रही कि जब मुख्यमंत्री चेहरे की चर्चा शुरू हुई तो कार्यकर्ताओं की पहली पसंद सतीशन बने। आलाकमान के सामने भी आखिरकार जमीनी राजनीति जीत गई। सतीशन की सबसे बड़ी ताकत यह रही कि उन्होंने खुद को सिर्फ विधानसभा की राजनीति तक सीमित नहीं रखा। भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, प्रशासनिक विफलताओं और जनहित के मुद्दों को लेकर लगातार सरकार पर हमले किए। यही कारण है कि कांग्रेस के जमीनी कार्यकर्ताओं को उनमें वह आक्रामकता दिखाई दी जिसकी पार्टी को लंबे समय से तलाश थी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस आलाकमान अगर सिर्फ दिल्ली की राजनीति के हिसाब से फैसला लेता और केसी वेणुगोपाल को मुख्यमंत्री बनाता तो कार्यकर्ताओं में वह उत्साह नहीं आता जो सतीशन के नाम से आया। यह फैसला कांग्रेस के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इससे पार्टी ने यह संकेत दिया है कि अब जमीनी नेताओं को प्राथमिकता दी जाएगी।

केरल की जीत ने धारणा तोड़ी

केरल की जीत ने यह धारणा तोडऩे की कोशिश की है कि कांग्रेस सिर्फ हार की राजनीति कर रही है। जीत के बाद कांग्रेस अब यह संदेश देना चाहती है कि वह सिर्फ भाजपा विरोध की राजनीति नहीं कर रही बल्कि सत्ता में वापसी की क्षमता भी रखती है। दिलचस्प यह भी है कि यह जीत ऐसे समय आई है जब राष्ट्रीय राजनीति में भाजपा बेहद आक्रामक है और विपक्ष बिखरा हुआ दिखाई देता है। ऐसे माहौल में केरल से आया यह जनादेश कांग्रेस के लिए सिर्फ एक राज्य की सत्ता नहीं बल्कि मनोवैज्ञानिक ऑक्सीजन है। अब सवाल यह नहीं कि कांग्रेस जीती या हारी सवाल यह है कि क्या केरल से उठी यह राजनीतिक लहर देश की राजनीति का नया रुख तय करेगी?

पूरे देश का राजनीतिक तापमान में बदलाव

भारतीय राजनीति में कुछ जीतें सिर्फ सरकारें नहीं बदलतीं बल्कि वह पूरे देश का राजनीतिक तापमान बदल देती हैं। केरल में कांग्रेस की वापसी भी ऐसी ही जीत बनती दिखाई दे रही है। यह सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं है बल्कि उस राजनीतिक कहानी का नया अध्याय है जिसे भाजपा और लेफ्ट दोनों ने लगभग खत्म मान लिया था। राहुल गांधी की राजनीति को लेकर लगातार सवाल उठाए जा रहे थे। विपक्ष बिखरा हुआ था। कांग्रेस के भीतर नेतृत्व को लेकर संशय का वातावरण बनाया जा रहा था। लेकिन केरल ने अचानक वह तस्वीर बदल दी जिसने दिल्ली से लेकर तिरुवनंतपुरम तक राजनीतिक हलचल पैदा कर दी है। लेफ्ट सरकार ने जिस आत्मविश्वास के साथ सत्ता चलाई ऐसा लग रहा था कि पिनराई विजयन का किला अजेय है। प्रशासनिक पकड़, मजबूत कैडर और वैचारिक जमीन। सब कुछ लेफ्ट के पक्ष में दिखाई देता था। कांग्रेस खुद अंदरूनी संघर्षों से जूझती नजर आती थी। लेकिन राजनीति की सबसे बड़ी सच्चाई यही है कि जनता जब बदलाव का मन बना लेती है तब सबसे मजबूत दिखने वाली सत्ता भी रेत की दीवार साबित होती है। केरल में यही हुआ। जनता ने चुपचाप फैसला लिया और जब परिणाम आए तो लेफ्ट का वर्षों पुराना राजनीतिक किला हिल गया।

असली राजनीतिक संदेश राहुल के लिए निकला

राहुल गांधी पिछले कई वर्षों से भाजपा के सबसे बड़े राजनीतिक हमलों का केंद्र रहे हैं। उन्हें कमजोर नेता साबित करने के लिए लगातार राजनीतिक नैरेटिव गढ़ा गया। लेकिन राजनीति में छवि उतनी ही मजबूत होती है जितनी मजबूत जीतें होती हैं। भारत जोड़ो यात्रा के बाद राहुल गांधी की स्वीकार्यता में बदलाव जरूर दिखाई दिया था लेकिन कांग्रेस को ऐसी जीत की जरूरत थी जो राष्ट्रीय स्तर पर संदेश दे सके। केरल ने वह मौका राहुल गाधी को दिया है। वायनाड से राहुल गांधी का भावनात्मक और राजनीतिक रिश्ता पहले से रहा है। यही वजह है कि केरल की जीत को उनके नेतृत्व से जोड़कर देखा जा रहा है। कांग्रेस अब इस जीत को राष्ट्रीय राजनीति में एक बड़े प्रतीक की तरह इस्तेमाल करेगी।

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