15वें दिन ईरान ने मचाई तबाही, अमेरिका के एयरबेस और एम्बेसी उड़ा दिए, रूस ने भेजी मदद

इजराइल और अमेरिका मिलकर भी ईरान को नहीं हरा पाएंगे और ईरान अकेले ही अमेरिका इजराइल समेत पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को बिगाड़ कर रख देगा तो शायद आप हमारा यकीन नहीं करते।

4पीएम न्यूज नेटवर्क: इजराइल और अमेरिका मिलकर भी ईरान को नहीं हरा पाएंगे और ईरान अकेले ही अमेरिका इजराइल समेत पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को बिगाड़ कर रख देगा तो शायद आप हमारा यकीन नहीं करते।

लेकिन आज हालात ऐसे हो गए हैं कि जंग के 15वें दिन जहां ट्रंप और नेतन्याहू जंग को रोकने के लिए गिड़गिड़ा रहे हैं तो वहीं ईरान हमले पर हमले किये जा रहा है। खाड़ी के दोशों में सालों से बसे अमरीकी ठिकानों को जड़ से उखाड़ रहा है ताकि फ्यूचर में भी अमेरिका कभी ईरान पर आंख उठाकर न देखे।

एक तरफ जहां ईरान ने सऊदी अरब में हमला करके अमेरिका के 5 रिफ्यूलिंग विमानों को तबाह कर दिया है तो वहीं ईरान ने ड्रोन से हमला करके बगदाद में अमेरिकी दूतावास को धुवां धुवां कर दिया है। वहीं अब पुतिन ने ईरान के लिए एक बड़ी मदद भेजकर एलान कर दिया है तकि अस जंग में रूस ईरान ते साथ खड़ा हुआ है। तो कैसे ईरान के हमलों से अमेरिका दहल उठा है और कैसे रूस ने ईरान के लिए बड़ी मदद भेजी है.

जैसे- जैसे दिन बीतता जा रहा है ऐसा लगने लगा है जैसे मोदी जी के माई डियर फ्रेंड डोनाल्ड ट्रंप ने आयतुल्लाह खामेनई को मारकर अपने पैर पर कुल्हाड़ी मार ली है। क्योंकि अब भ़ईरान बेखौफ होकर इजराइल पर हमला तो कर ही रहा है लेकिन उसने उन ठिकानों को भी निशाना बनाया है जहां कहीं भी अमेरिकी ठिकानें हो सकते हैं। युद्ध के 15वें दिन भी ईरान ने सऊदी अरब के प्रिंस सुल्तान एयर बेस पर ऐसी ऐसी मिसाइलें दागी कि अमेरिकी वायु सेना के पांच रिफ्यूलिंग विमान या टैंकर जमीन पर खड़े खड़े ही बुरी तरह से आग में झुलस गए।

वॉल स्ट्रीट जर्नल के हवाले से खुद अमेरिकी अधिकारियों ने इसकी पुष्टि की है। रिपोर्ट के अनुसार, ईरानी मिसाइलों ने बेस को निशाना बनाया। क्षतिग्रस्त विमान मुख्य रूप से बोइंग KC-135 स्ट्रैटोटैंकर प्रकार के हैं, जो अमेरिकी वायु सेना के लिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि ये लड़ाकू विमानों और बॉम्बर्स को हवा में ईंधन भरने का काम करते हैं, जिससे लंबी दूरी की मिशन संभव हो पाते हैं। लेकिन अब ईरान ने उन टैंकर विमानों को भी नष्ट कर दिया है।

मतलब एक तरफ जहां हॉर्मूज का रास्ता बंद करके दुनिया को तेल के लिए तरसा दिया है तो वहीं अब उन टैंकरों को भी तहस नहस कर दिया है जो उन विमानों को ईंधन दे रहे थे जिनसे ईरान पर हमले हो रहे थे। वहीं एक अमेरिकी अधिकारियों ने बताया है कि “विमान टैंकर पूरी तरह नष्ट नहीं हुए और अब उनकी मरम्मत की जा रही है।”

वहीं हमले में किसी भी व्यक्ति की मौत या घायल होने की कोई रिपोर्ट नहीं है। यह घटना अमेरिका-इसराइल और ईरान के बीच चल रहे बड़े संघर्ष का एक बेहद अहम हिस्सा है। अब देखिए जिन खाड़ी के देशों ने अमेरिका को अपनी सुरक्षा का ठेका दे रखा था वो अब अमेरिका से बेहद नाराज नजर आ रहे हैं। जो अमेरिका अपने लैन्य ठिकानों को सुरक्षित नहीं रख रहा है वो पूरे देश को क्या सुरक्षित रखेगा।

ईरान के इस हमले से क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य संपत्तियां कमजोर हो रही हैं। आपको बता दें कि जिस प्रिंस सुल्तान एयर बेस पर ईरान नो मिसाइलें बरसाई हैं वो सऊदी अरब में अमेरिकी बलों के लिए महत्वपूर्ण लॉजिस्टिक हब था। रिपोर्ट्स में कहा गया है कि ईरान ने खाड़ी देशों में अमेरिकी बेसों पर लगातार मिसाइल और ड्रोन हमले किए हैं, जिसके बाद अमेरिका ने कुछ KC-135 टैंकरों को यूरोप के बेसों पर ट्रांसफर करने का फैसला किया है। मतलब खाड़ी देशों से छोड़कर अब अमेरिका पीछे हटने जा रहा है। ये ईरान के लिए वाकई एक बड़ी उपलब्धि है।

अब एक तरफ जहां ईरान ने सऊदी अरब में बने अमेरिकी एयरबेस पर मिसाइलें बरसा कर उसे तबाह कर दिया तो वहीं ईराक के बगदाद शहर में अमेरिकी दूतावास पर ड्रोन से हमले की खबर सामने आई है। एक इराकी सुरक्षा अधिकारी ने बताया कि शनिवार को बगदाद में अमेरिकी दूतावास पर ड्रोन से हमला हुआ है। वहीं एएफपी के एक पत्रकार ने परिसर से धुआं उठता देखा। अधिकारी ने बताया है कि “एक ड्रोन ने दूतावास पर हमला किया है। एक अन्य सुरक्षा सूत्र ने भी इस बात की पुष्टि की कि हमले में दूतावास को निशाना बनाया गया था। कई अन्य सूत्रों के अनुसार, यह हमला इराक की राजधानी पर हुए हमलों में ईरान समर्थित दो लड़ाकों के मारे जाने के कुछ ही समय बाद हुआ।

एक तरफ जहां  ईरान अमेरिका पर हमला करने से रुक नहीं रहा है तो वहीं हार से हताश होकर अब ट्रंप ने अपने देश में झूठ बोलना चालू कर दिया है। ट्रंप उन खबरों को हजम नहीं कर पा रहे हैं जिनमें ईरान के हमलों का जिक्र किया जा रहा है। वो उन खबरों को ही झूठी बता रहे हैं। ट्रंप ने अपने ट्रुथ सोशल पर लिखा है- फर्जी समाचार मीडिया ईरान के खिलाफ अमेरिकी सेना के शानदार प्रदर्शन की खबरें छापने से कतराता है, जबकि ईरान पूरी तरह से पराजित हो चुका है और समझौता चाहता है। लेकिन ऐसा समझौता जिसे मैं स्वीकार नहीं करूंगा!

एक तरफ जहां ट्रंप अपनी हार से बौखला चुके हैं तो वहीं रूसअब खुलकर ईरान के सामने खड़ा हो गया है। रूस ने अपनी इंसानियत दिखाते हुऐ अपने  Il-76 विमानों को भेजा है, जिनमें 13 टन से दवाएं और चिकित्सा के सामान भेजे गए हैं। रूस से राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के आदेश पर ने अज़रबैजान के रास्ते ईरान को ये मदद पहुंचाई गई है। बताया जा रहा है कि रूस ने सहायता को अज़रबैजान पहुंचाया, जहां से इसे जमीनी रास्ते से ईरान ट्रांस्फर किया जाएगा।

मतलब यह खेप अज़रबैजान में ईरानी अधिकारियों को सौंपी जाएगी जहां से वो इसे ईरान ले जाएंगे। इसमें दवाएं, प्राथमिक चिकित्सा किट और अन्य महत्वपूर्ण चिकित्सा सामग्री शामिल है। आपको बता दें कि तनाव के बीच ईरान को सहायता भेजने वाला रूस पहला देश बना है। मतलब अभी तक किसी देश ने इतनी हिम्मत नहीं दिखाई है।

आखिरकार इस पूरे घटनाक्रम ने दुनिया की राजनीति और ताकत के संतुलन को लेकर कई बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। जिस जंग को अमेरिका और इजराइल ने शायद एक आसान सैन्य अभियान समझा था, वही जंग अब उनके लिए एक ऐसी चुनौती बनती दिख रही है जिसका कोई सीधा और आसान समाधान नजर नहीं आ रहा। ईरान ने जिस तरह से लगातार जवाबी हमले किए हैं और खाड़ी क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाया है, उससे साफ दिखाई दे रहा है कि तेहरान अब दबाव में आने वाला नहीं है।

दूसरी तरफ अमेरिका की रणनीति भी सवालों के घेरे में आ गई है। अगर सच में अमेरिकी सैन्य ठिकाने और उपकरण इस तरह के हमलों से प्रभावित हो रहे हैं तो यह अमेरिका की उस छवि को कमजोर करता है जो दशकों से खुद को दुनिया की सबसे ताकतवर सैन्य शक्ति के रूप में पेश करता आया है।

यही वजह है कि अब खाड़ी के कई देश भी असहज महसूस कर रहे हैं और उन्हें लगने लगा है कि जिस सुरक्षा की गारंटी अमेरिका देता रहा है, वह उतनी मजबूत नहीं है जितनी दिखाई जाती थी। उधर रूस का ईरान के पक्ष में खड़ा होना इस पूरे संघर्ष को और भी ज्यादा जटिल बना सकता है।

भले ही अभी रूस ने मानवीय सहायता भेजी हो, लेकिन इसका राजनीतिक संदेश बहुत बड़ा है कि वैश्विक शक्ति संतुलन बदल रहा है और अब हर मुद्दे पर अमेरिका अकेले फैसले नहीं कर सकता।

ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह जंग अब और लंबी चलेगी या फिर आने वाले दिनों में कोई कूटनीतिक रास्ता निकलेगा। लेकिन फिलहाल जो हालात दिखाई दे रहे हैं, उनसे इतना जरूर कहा जा सकता है कि इस टकराव ने पूरी दुनिया को एक बार फिर यह एहसास करा दिया है कि मध्य पूर्व की आग अगर भड़कती है तो उसकी लपटें सिर्फ एक इलाके तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि पूरी दुनिया की राजनीति और अर्थव्यवस्था को हिला कर रख देती हैं।

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