मोदी के घर गुजरात में हाहाकार! पानी से बिगड़े हालात, सवालों में सरकार

गुजरात मॉडल..यह वो शब्द था जिसने 2014 में पूरे देश की उम्मीदों को पंख दिए थे...वादा था कि जैसा विकास गुजरात में हुआ.

4पीएम न्यूज नेटवर्क: गुजरात मॉडल..यह वो शब्द था जिसने 2014 में पूरे देश की उम्मीदों को पंख दिए थे…वादा था कि जैसा विकास गुजरात में हुआ.

वैसा ही देश का चप्पा-चप्पा चमकेगा….लेकिन आज 2026 में जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं…तो सवाल उठता है कि क्या वो मॉडल केवल चमकदार सड़कों और गगनचुंबी इमारतों तक सीमित था?…क्या उस मॉडल में इंसान की सबसे बुनियादी जरूरत….साफ पानी…के लिए कोई जगह थी?…आज स्थिति ये है कि डबल इंजन की सरकार वाले राज्यों में विकास की परतें उखड़ रही हैं….पहले मध्य प्रदेश में दूषित पानी ने तांडव मचाया और अब वही कहानी गुजरात की गलियों में दोहराई जा रही है….ये महज इत्तेफाक नहीं, बल्कि शासन और प्रशासन की उस लापरवाही का नतीजा है…जिसने जनता को सिर्फ एक वोट बैंक समझ लिया है…

गुजरात का मॉडल हर देश में लागू करेंगे……ये नारा आज भी लोगों के कानों में गूंजता है…साल 2014 में जब गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बने…तो दावा किया गया कि गुजरात जैसा विकास अब पूरे देश में दिखेगा…चमकती सड़कों, उद्योगों और तेज फैसलों की तस्वीर दिखाई गई…लेकिन 10 साल बाद सवाल ये है कि क्या गुजरात मॉडल सच में लोगों की ज़िंदगी बेहतर बना पाया या ये सिर्फ प्रचार का चमकदार कवर था?

किसी भी सरकार का असली इम्तिहान बड़े-बड़े प्रोजेक्ट नहीं…बल्कि आम आदमी की बुनियादी ज़रूरतें होती हैं….और वो बुनियादी जरूरतें हैं रोटी, पानी, स्वास्थ्य और सुरक्षा….लेकिन, अगर नल से आने वाला पानी ही जहर बन जाए…तो फिर विकास के दावे किस काम के?….बीते कुछ समय में मध्य प्रदेश और अब गुजरात से जो खबरें सामने आई हैं….उन्होंने पूरे विकास मॉडल पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं……

पहले बात मध्य प्रदेश की करते हैं…यहां गंदे और दूषित पानी की वजह से कई इलाकों में लोग बीमार पड़े….बच्चों, बुज़ुर्गों और महिलाओं पर इसका सबसे ज़्यादा असर हुआ…..उल्टी-दस्त, टाइफाइड और पीलिया जैसी बीमारियां तेजी से फैलीं…कई मामलों में लोगों की जान तक चली गई……और ये कोई प्राकृतिक आपदा नहीं थी…बल्कि सीधी-सीधी प्रशासनिक लापरवाही का नतीजा था.

मध्य प्रदेश में जब मौतें होने लगीं…तब जाकर प्रशासन हरकत में आया…पानी के सैंपल लिए गए….अफसर मौके पर पहुंचे….जांच के आदेश हुए….लेकिन, सवाल ये है कि क्या हमेशा किसी की जान जाने के बाद ही सरकार जागेगी?….क्या पहले से पानी की गुणवत्ता की जांच नहीं होनी चाहिए थी?….और क्या ये सरकार की Priority में नहीं था?…..

मध्य प्रदेश में बीजेपी की डबल इंजन सरकार है…राज्य में भी बीजेपी, केंद्र में भी बीजेपी…..फिर भी अगर साफ पानी जैसी बुनियादी चीज नहीं मिल पा रही…तो डबल इंजन का फायदा क्या हुआ?…ये सवाल इसलिए जरूरी है क्योंकि यही मॉडल पूरे देश में लागू करने का दावा किया जाता है…आमतौर पर किसी राज्य में हुई बड़ी चूक से दूसरे राज्यों को सबक लेना चाहिए…लेकिन यहां उल्टा हुआ.

मध्य प्रदेश की घटना से सीखने के बजाय वही लापरवाही अब गुजरात में भी सामने आ रही है…यानी जिस मॉडल को देश-दुनिया के सामने बेचा गया….प्रचार किया गया…उसी मॉडल के केंद्र में लोग गंदा पानी पीने को मजबूर हैं……आपने अकसर देखा होगा कि…गुजरात को हमेशा एक आदर्श राज्य की तरह पेश किया गया…कहा गया कि यहां प्रशासन चुस्त है…सिस्टम मजबूत है और फैसले तेज होते हैं…लेकिन हालिया घटनाओं ने इस छवि को झकझोर कर रख दिया है…कई इलाकों से शिकायतें सामने आई हैं कि पीने का पानी दूषित है और लोग बीमार पड़ रहे हैं…

गुजरात के गांधीनगर में टाइफाइड के मामलों ने स्वास्थ्य विभाग की चिंता बढ़ा दी है…सैंपल की जांच रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि पिछले एक हफ्ते में शहर के अलग-अलग इलाकों से टाइफाइड के संदिग्ध मामलों में तेजी से बढ़ोतरी हुई है…सिविल अस्पताल की चिकित्सा अधीक्षक डॉ. मीता पारिख ने बताया कि सेक्टर 24, 25, 26, 28 और आदिवाड़ा क्षेत्र से बच्चों समेत कई लोगों को अस्पताल में भर्ती कराया गया है…

हालांकि, राहत की बात ये है कि सभी मरीजों की हालत फिलहाल स्थिर है…..जानकारी के अनुसार, इलाके में टाइफाइड के 67 मामले सेक्टर 24, 26, 27, 28 और आदिवासी इलाके में टाइफाइड के संदिग्ध मामले सबसे ज्यादा सेक्टर 24 के इंदिरानगर में टाइफाइड के मामले सामने आए हैं…नगर निगम का स्वास्थ्य निभाग घर-घर जाकर निगरानी कर रहा है…राज्य सरकार के अनुसार, अब तक गांधीनगर में टाइफाइड के 113 संदिग्ध मामले सामने आ चुके हैं…

गुजरात में भी लोग पीलिया, टाइफाइड और पेट की गंभीर बीमारियों की शिकायत कर रहे हैं….स्थानीय लोग कह रहे हैं कि नलों से बदबूदार और गंदा पानी आ रहा है….लेकिन सवाल ये है कि जल आपूर्ति विभाग और स्वास्थ्य विभाग क्या कर रहा था?…क्या उन्हें ये पता नहीं था या फिर पता होते हुए भी आंखें मूंद ली गईं?…सरकारें अक्सर आंकड़ों का खेल खेलती हैं….कह दिया जाता है कि स्थिति नियंत्रण में है या कोई बड़ी समस्या नहीं है…लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बताती है…

जब अस्पतालों में मरीजों की लाइन लग जाए…तब ये कहना कि सब ठीक है कि लोगों के जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा है….अब सवाल ये उठता है कि जिम्मेदार कौन है?…क्या सिर्फ स्थानीय अधिकारी ही इसके लिए जिम्मेदार हैं?…या फिर वो सरकार…जो सालों से सत्ता में है और खुद को सबसे सक्षम बताती है?….पानी की सप्लाई, सीवरेज सिस्टम और स्वास्थ्य सेवाएं सीधे सरकार के दायरे में आती हैं…तो फिर इस नाकामी की जवाबदेही तय क्यों नहीं होती?….

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद गुजरात मॉडल के सबसे बड़े ब्रांड एंबेसडर रहे हैं…लेकिन अगर उसी गुजरात में लोगों को साफ पानी नहीं मिल पा रहा…तो पूरे देश में लागू किए गए मॉडल की हालत क्या होगी?….क्या सिर्फ प्रचार से ही देश चलाया जा सकता है?…सरकार के साथ-साथ एक बड़ा सवाल गोदी मीडिया की भूमिका पर भी है….क्या इन मुद्दों पर उतनी बहस हो रही है…..जितनी होनी चाहिए? या फिर विकास की चमक के आगे गंदे पानी से हो रही मौतें छोटी खबर बनकर रह जाती हैं?…

आम आदमी के पास विकल्प क्या है?…उसे वही पानी पीना है….जो नल से आएगा….वो मिनरल वाटर नहीं खरीद सकता…..जब सरकार अपने सबसे बुनियादी कर्तव्य में फेल हो जाए, तो आम आदमी कहां जाए?…..चुनाव के वक्त तो बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं कि…हर घर नल से जल मिलेगा….लेकिन जमीनी सच्चाई ये है कि नल तो है….पर पानी ज़हरीला है.

क्या यही है विकास?…….सबसे दुखद बात ये है कि मौतें भी सिस्टम को पूरी तरह नहीं झकझोर पातीं…कुछ दिन हंगामा होता है….जांच बैठती है और फिर सब कुछ ठंडे बस्ते में चला जाता है…न कोई बड़ा अफसर सज़ा पाता है और न ही कोई मंत्री जिम्मेदारी लेता है……

गुजरात मॉडल की जो चमक दिखाई जाती है…उसके पीछे की परतें अब खुलती जा रही हैं…अगर ये मॉडल इतना ही सफल होता…तो आज गुजरात और मध्य प्रदेश में लोग गंदा पानी पीकर बीमार नहीं पड़ते…ये सवाल सीधे मोदी सरकार से है कि…क्या विकास सिर्फ इमारतों और निवेश के आंकड़ों का नाम है?…या फिर लोगों की ज़िंदगी सुरक्षित करना भी सरकार की जिम्मेदारी है?

जब तक सरकार की प्राथमिकता प्रचार रहेगी और जमीनी हकीकत से आंखें मूंदी जाएंगी…तब तक ऐसी घटनाएं होती रहेंगी…लेकिन, सवाल ये है कि कब आम आदमी की जान को सच में प्राथमिकता दी जाएगी?…अब वक्त आ गया है कि सिर्फ जांच के आदेश नहीं…बल्कि ठोस कार्रवाई हो….दोषी अधिकारियों और जिम्मेदार नेताओं पर कार्रवाई होनी चाहिए…वरना ये सिलसिला यूं ही चलता रहेगा…

मध्य प्रदेश से गुजरात तक गंदे पानी की वजह से लोगों की तबीयत बिगड़ना और जान जाना….ये सिर्फ दो राज्यों की कहानी नहीं है…ये पूरे सिस्टम की नाकामी है…गुजरात मॉडल के बड़े-बड़े दावों के बीच ये सवाल हमेशा रहेगा कि…..अगर साफ पानी भी नहीं दे सकते, तो विकास का दावा किस मुंह से करते हैं?…..क्योंकि पानी हर किसी की बुनियादी जरूरत है…और अगर वही पानी जहरीला होगा…..तो इन सभी विकास मॉडल का जनता क्या करेगी?

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