जिंदा चिता पर लेटे लोग, सरकार के खिलाफ चली विरोध की आंधी
मध्य प्रदेश में लोग अपनी ही चिता पर जिंदा लेटकर विरोध कर रहे हैं...और ये कोई फिल्म का सीन नहीं है....न ही कोई प्रतीकात्मक प्रदर्शन है...ये उस हद तक पहुंची हुई बेबसी है...

4पीएम न्यूज नेटवर्क: इन दिनों देश के हालातों को अगर एक लाइन में बयान करना हो…तो वो लाइन होगी…आवाज़ें उठ रही हैं…लेकिन सुनने वाला कोई नहीं है.
मध्य प्रदेश में लोग अपनी ही चिता पर जिंदा लेटकर विरोध कर रहे हैं…और ये कोई फिल्म का सीन नहीं है….न ही कोई प्रतीकात्मक प्रदर्शन है…ये उस हद तक पहुंची हुई बेबसी है…
जहां इंसान अपनी जान को दांव पर लगाकर भी सिस्टम को झकझोरना चाहता है…सोचिए, एक आम नागरिक किस मानसिक स्थिति में होगा…जब उसे लगे कि न्याय पाने का कोई रास्ता नहीं बचा…जब उसकी शिकायतें दफ्तरों में दब जाती हैं…जब उसकी पुकार सत्ता के गलियारों तक पहुँचने से पहले ही दम तोड़ देती है…ये सिर्फ एक राज्य की तस्वीर नहीं है…ये उस पूरे देश का आईना है…जिसमें आम आदमी की कीमत लगातार कम होती जा रही है…
मध्य प्रदेश के छतरपुर और पन्ना जिलों में आदिवासी समुदाय केन-बेतवा लिंक परियोजना के कारण प्रस्तावित विस्थापन और जल-जंगल-जमीन के नुकसान के विरोध में चिता आंदोलन समेत तमाम तरह के आंदोलन कर रहे हैं…वो जिंदा चिता पर लेटकर सरकार से परियोजना को रद्द करने, अपनी जमीन और आजीविका की रक्षा करने की मांग कर रहे हैं…वो जंगल, जमीन और घर छीनने वाली परियोजना को रोकने की मांग कर रहे हैं और उनके अस्तित्व की रक्षा करने की अपील कर रहे हैं…
उनका कहना है कि वो विनाशकारी विकास के बजाय अपना गांव, घर और आजीविका बचाना चाहते हैं…….लेकिन उनकी सुनने वाला कोई नहीं है…और हैरानी की बात ये है कि इस आंदोलन को…इस प्रदर्शन को मेन स्ट्रीम मीडिया नहीं दिखा रहा है…क्योंकि वो तो पश्चिम बंगाल में पीएम मोदी की खाई हुई झालमुड़ी के फाएदे गिनाने में बिजी है…….सोचिए कि 5 अप्रैल से शुरू हुआ ये आंदोलन…16 अप्रैल तक चला…यानी पूरे 12 दिन लोगों ने आंदोलन किया……लेकिन उनकी सुध लेने तक कोई नहीं पहुंचा….
चलिए इस 12 दिन के आंदोलन को भी भूल जाते हैं…..बात करते हैं मणिपुर की…वहां जो कुछ हो रहा है…वो किसी एक दिन या एक घटना का परिणाम नहीं है…पिछले तीन सालों से वहां हिंसा और डर का माहौल बना हुआ है…घर जलाए जा रहे हैं…लोग विस्थापित हो रहे हैं…समुदायों के बीच खाई गहरी होती जा रही है…लेकिन राष्ट्रीय हित में उसकी चर्चा में मणिपुर की जगह उतनी मजबूत नहीं है…
जितनी होनी चाहिए…ये सवाल उठता है कि क्या देश के कुछ हिस्से सिर्फ इसलिए नजरअंदाज किए जा रहे हैं…क्योंकि वो राजनीतिक रूप से जरूर नहीं हैं?…क्या वहां के लोगों की परेशानी, दर्द कम है?…जब किसी राज्य में इतने लंबे समय तक अशांति बनी रहती है…तो ये सिर्फ कानून-व्यवस्था की विफलता नहीं…बल्कि राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी को भी दिखाता है………जहां इसपर बात करने से ज्यादा जरूरी शायद झालमुड़ी है….
ठीक है मणिपुर को भी छोड़िए….प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गृह राज्य गुजरात की बात करते हैं….जहां गुजरात से मजदूर पलायन कर रहे हैं…सोचिए, जिस राज्य को विकास का मॉडल बताया जाता है…वहां से अगर मजदूर काम छोड़कर जा रहे हैं…तो ये सिर्फ आर्थिक मुद्दा नहीं है…ये सामाजिक और सुरक्षा से जुड़ा सवाल भी है…मजदूर किसी शौक से पलायन नहीं करते…वो तब जाते हैं…
जब उन्हें लगता है कि उनके लिए वहां कोई सुरक्षित भविष्य नहीं है…ये लोग देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं…लेकिन उनकी आवाज अक्सर सबसे कम सुनी जाती है…उनकी समस्याएं हैं…कम मजदूरी, असुरक्षित काम का माहौल, भेदभाव…..जिस तरह से मजदूर कह रहे हैं कि उन्हें गैस न मिल पाने से खाने की दिक्कत हो रही है…जिसकी वजह से वो अपने-अपने घरों को लौट रहे हैं और कह रहे हैं कि अब गैस की दिक्कत भले ही ठीक हो जाए…फिर भी वो शायद ही वापस लौटें…..अब इन पर कितनी बार राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा होती है?…
गुजरात में पलायन हो रहा है….ओडिशा में लोग सड़कों पर उतर आए हैं…जहां ओडिशा में मुख्य रूप से रायगढ़ा जिले के सिजिमाली क्षेत्र में आदिवासियों द्वारा वेदांता समूह की बॉक्साइट खनन परियोजना के लिए सड़क निर्माण का विरोध गया…आदिवासी विस्थापन, वन अधिकारों के हनन और आजीविका खोने के डर से सड़क निर्माण का विरोध कर रहे हैं…
जिससे पुलिस के साथ हिंसक झड़पें हुई हैं…ये अपने आप में एक बड़ा संकेत है कि असंतोष अब दबा हुआ नहीं रह गया है…जब लोग सड़कों पर आते हैं…तो वो सिर्फ विरोध नहीं कर रहे होते…वो एक संदेश दे रहे होते हैं कि अब बहुत हो गया…ये स्थिति तब पैदा होती है जब संवाद के सारे रास्ते बंद हो जाते हैं…लोकतंत्र में विरोध एक अधिकार है…लेकिन जब विरोध ही एकमात्र विकल्प बन जाए…तो ये सिस्टम के फेलियर को दिखाता है…सरकार का काम सिर्फ कानून लागू करना नहीं…बल्कि लोगों की समस्याओं को समझना और समय पर समाधान देना भी है…
अब बात करते हैं नेतृत्व की…जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जैसे पद पर बैठे व्यक्ति से देश को बहुत उम्मीदें होती हैं…ये सिर्फ एक राजनीतिक पद नहीं है…बल्कि करोड़ों लोगों के विश्वास का केंद्र है…ऐसे समय में जब देश के कई हिस्सों से संकट की खबरें आ रही हों…तो जनता ये उम्मीद करती है कि उनका नेता सामने आएगा…स्थिति पर खुलकर बोलेगा…
ठोस कदमों की घोषणा करेगा और लोगों को भरोसा दिलाएगा कि सरकार उनके साथ खड़ी है…लेकिन जब ऐसे समय में पब्लिक इमेज, हल्के-फुल्के वीडियो, या प्रतीकात्मक गतिविधियां ज्यादा चर्चा में आ जाएं…तो लोगों के मन में सवाल उठना लाजमी है…उन्हें लगता है कि असली मुद्दों से ध्यान भटकाया जा रहा है और ये भावना धीरे-धीरे असंतोष में बदल जाती है…
मीडिया की भूमिका इस पूरे मामले में बेहद अहम है…मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ इसलिए कहा जाता है क्योंकि वो सत्ता और जनता के बीच एक मीडिएटर का काम करता है…लेकिन जब यही मीडिएटर कमजोर पड़ने लगे…जब मीडिया का फोकस गंभीर मुद्दों से हटकर सतही खबरों पर चला जाए…तो लोकतंत्र की नींव हिलने लगती है…अगर प्राइम टाइम पर ये चर्चा हो कि किसने क्या खाया…किसने क्या पहना, और पीएम ने कितने रुपए की चीज खरीदी…जबकि देश के अलग-अलग हिस्सों में लोग संघर्ष कर रहे हों…तो ये सिर्फ पत्रकारिता का फेलियर नहीं, बल्कि नैतिक जिम्मेदारी से भी पीछे हटना है…
मीडिया का काम सिर्फ खबर दिखाना नहीं…बल्कि सही सवाल पूछना भी है…सरकार से जवाब मांगना, नीतियों की समीक्षा करना, और जनता की आवाज को मंच देना…ये उसकी बेसिक जिम्मेदारियां हैं…लेकिन जब मीडिया इन जिम्मेदारियों से हटकर सिर्फ इमेज बिल्डिंग का जरिए बन जाए…तो वो लोकतंत्र के बजाय सत्ता का खिलौना बन जाता है और ये स्थिति खतरनाक है…क्योंकि तब जनता के पास सच जानने का कोई trustable माध्यम नहीं बचता…
इस पूरे माहौल में सबसे चिंताजनक बात है…संवेदनहीनता का बढ़ना….जब बार-बार बड़े मुद्दों को नजरअंदाज किया जाता है…तो धीरे-धीरे समाज भी उन्हें सामान्य मानने लगता है…लोग ये सोचने लगते हैं कि ऐसा तो चलता रहता है…और यही वो मानसिकता है…जो किसी भी लोकतंत्र को अंदर से कमजोर करती है…क्योंकि जब अन्याय सामान्य लगने लगे…तो उसका विरोध भी कम हो जाता है……
मतलब सरकार की जिम्मेदारी सिर्फ योजनाएं बनाना या घोषणाएं करना नहीं है…असली जिम्मेदारी है….जमीनी स्तर पर बदलाव लाना…..हर नागरिक को ये महसूस कराना कि उसकी जिंदगी की कीमत है…उसकी समस्याएं महत्वपूर्ण हैं…अगर कोई राज्य जल रहा है….अगर लोग जिंदा होते हुए भी चिका पर लेटने को मजबूर हो रहा है…अगर मजदूर पलायन कर रहे हैं…तो ये सिर्फ आंकड़े नहीं हैं…ये इंसानी जिंदगियां हैं…और हर एक जिंदगी की जिम्मेदारी उस सिस्टम पर है…जिसे जनता ने चुना है…
आखिर में मेरा सवाल सिर्फ कौन जिम्मेदार है का नहीं है…बल्कि कौन जवाब देगा का भी है…क्योंकि लोकतंत्र में सत्ता जनता से आती है और जवाबदेही भी जनता के प्रति ही होती है…अगर सरकार और मीडिया दोनों ही अपनी-अपनी भूमिकाओं से पीछे हटेंगे…तो जनता का विश्वास टूटेगा और एक बार ये विश्वास टूट गया…तो उसे वापस लाना आसान नहीं होता.
इसलिए आज जरूरत है कि प्राथमिकताएं बदली जाएं, असली मुद्दों पर ध्यान दिया जाए और उस भरोसे को फिर से बनाया जाए जो धीरे-धीरे कमजोर होता जा रहा है….देखने वाली बात होगी कि क्या देश के जिम्मेदार इस ओर ध्यान देंगे या नहीं और अगर ये सब ऐसे ही चलता रहा तो क्या हमले देश को सच में सही हाथों में दिया है.


