चुनाव आयोग के नए सॉफ्टवेयर पर उठे सवाल, रिपोर्ट में हुए खुलासे से मचा हड़कंप!
भारत के चुनाव आयोग द्वारा शुरू की गई स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी SIR प्रक्रिया ने आज करोड़ों भारतीयों को इसी असमंजस के मुहाने पर खड़ा कर दिया है..भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है...

4पीएम न्यूज नेटवर्क: भारत के चुनाव आयोग द्वारा शुरू की गई स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी SIR प्रक्रिया ने आज करोड़ों भारतीयों को इसी असमंजस के मुहाने पर खड़ा कर दिया है..भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है…
यहां वोट का अधिकार सिर्फ एक कानूनी हक नहीं…बल्कि नागरिक होने की पहचान है…लेकिन अब यही पहचान करोड़ों लोगों के लिए खतरे में दिख रही है…जिसकी वजह है…चुनाव आयोग द्वारा इस्तेमाल किया गया…एक नया सॉफ्टवेयर….जिसे स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी SIR प्रक्रिया के तहत लागू किया गया…ये सॉफ्टवेयर…जो मतदाता सूची को शुद्ध करने के नाम पर लाया गया…अब खुद सवालों के घेरे में है…
SIR प्रक्रिया के लिए चुनाव आयोग द्वारा इस्तेमाल किए गए एक सॉफ्टवेयर ने करोड़ों मतदाताओं के भविष्य पर संकट खड़ा कर दिया है…..द रिपोर्टर्स कलेक्टिव की रिपोर्ट के मुताबिक…बिना किसी पूर्व टेस्टिंग और लिखित दिशा-निर्देशों के लागू किए गए इस मैपिंग सॉफ्टवेयर ने पश्चिम बंगाल में 1 करोड़ 31 लाख और मध्य प्रदेश में 2 करोड़ 35 लाख वोटरों को संदिग्ध घोषित कर दिया है…वहीं दूसरी तरफ ज्ञानेश कुमार इसे तकनीकी उपलब्धि बता रहे हैं…
दरअसल, चुनाव आयोग की तरफ से स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी SIR के लिए इस्तेमाल किए गए एक नए सॉफ्टवेयर ने देश के करोड़ों वोटर्स के भविष्य पर सवालिया निशान लगा दिए हैं…रिपोर्ट के मुताबिक, दिसंबर 2025 के मध्य तक पश्चिम बंगाल में लगभग 1.31 करोड़ वोटर्स को संदिग्ध माना गया…वहीं मध्य प्रदेश में 2.35 करोड़ वोटर्स के डाटा में सॉफ्टवेयर ने लॉजिकल गड़बड़ी पाई…और ये गड़बड़ी यहीं तक सीमित नहीं है…ये बिहार समेत 10 अन्य राज्यों में भी करोड़ों वोटर्स पर इसी तरह का खतरा मंडरा रहा है…
इस सॉफ्टवेयर का एल्गोरिदम उम्र, रिश्तों और पारिवारिक लिंक के आधार पर डेटा का मिलान करता है…अगर किसी वोटर की उम्र, पिता-माता की उम्र या पारिवारिक संबंध एल्गोरिदम के तय मानकों से मेल नहीं खाते…तो उसे रेड फ्लैग कर दिया जाता है….समस्या ये है कि भारत जैसे देश में नामों की वर्तनी, उम्र के अनुमान और रिकॉर्ड की गलतियां आम हैं…2003 की वोटर लिस्ट आज से करीब 20 साल पुरानी है…इस दौरान करोड़ों लोगों की मौत हो चुकी है…नए वोटर्स जुड़े हैं….परिवार बंटे हैं…शादियां हुई हैं और लोग एक राज्य से दूसरे राज्य में गए हैं…ऐसे में पुराने रिकॉर्ड से सटीक डिजिटल मिलान की उम्मीद करना अपने-आप में अव्यावहारिक लगता है…
जानकारों का कहना है कि अगर कंप्यूटर किसी पुराने रिकॉर्ड को ठीक से रीड नहीं कर पाया…तो उसने सही वोटर को भी गलत घोषित कर दिया…यानी गलती इंसान की नहीं…सिस्टम की हो सकती है…लेकिन सजा वोटर को भुगतनी पड़ रही है…इस पूरे मामले में सबसे गंभीर बात ये है कि चुनाव आयोग ने अब तक कोई लिखित स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर जारी नहीं किया है…यानी जिन करोड़ों लोगों को संदिग्ध बताया गया है…उनकी जांच कैसे होगी, इसका कोई स्पष्ट नियम नहीं है…चुनाव आयोग ने जांच की पूरी जिम्मेदारी बूथ लेवल ऑफिसर्स पर डाल दी है…उन्हें अपनी समझ और विवेक से तय करना है कि कौन असली वोटर है और कौन नहीं…सवाल ये है कि क्या एक BLO, जिसके पास सीमित समय और संसाधन होते हैं…करोड़ों मामलों में निष्पक्ष और सटीक फैसला कर सकता है?…
पश्चिम बंगाल में कुछ समय बाद संदिग्ध वोटर्स की संख्या अचानक कम हो गई…लेकिन ये कमी कैसे हुई…किस आधार पर हुई और किन मामलों में सुधार किया गया…इसका कोई पब्लिक रिकॉर्ड या ट्रांसपेरेंट डेटा उपलब्ध नहीं है…यही बात संदेह को और भी ज्यादा गहरा करती है…ये शायद पहली बार है…जब भारत में बिना किसी मैनुअल जांच के, सिर्फ एक अदृश्य एल्गोरिदम के आधार पर करोड़ों नागरिकों के वोटिंग अधिकारों पर सवाल खड़े हुए हैं…न एल्गोरिदम सार्वजनिक है…न उसका ऑडिट और न ये बताया गया है कि वो किन मानकों पर फैसला लेता है…..
लेकिन, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार इस पूरी प्रक्रिया को एक तकनीकी उपलब्धि बता रहे हैं….उनका कहना है कि तकनीक से वोटर लिस्ट ज्यादा साफ और भरोसेमंद बनेगी…लेकिन जमीनी हकीकत ये है कि आम वोटर डरा हुआ है…उसे डर है कि कहीं उसका नाम वोटर लिस्ट से कट न जाए…अगर किसी नागरिक का नाम वोटर लिस्ट से कट जाता है…तो वो सिर्फ एक प्रशासनिक गलती नहीं होती…ये उसके लोकतांत्रिक अधिकारों पर सीधा हमला होता है…
भारत जैसे देश में….जहां वोट ही आम आदमी की सबसे बड़ी ताकत है…वहां इस तरह की तकनीकी गलती गंभीर परिणाम ला सकती है….इस मुद्दे पर विपक्षी दलों ने आवाज उठानी शुरू कर दी है…उनकी मांग है कि इस सॉफ्टवेयर का स्वतंत्र ऑडिट कराया जाए…एल्गोरिदम को सार्वजनिक किया जाए और पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता लाई जाए..
ये मामला सिर्फ वोटर लिस्ट का नहीं, बल्कि डेटा प्राइवेसी का भी है…जहां करोड़ों लोगों का व्यक्तिगत डेटा एक ऐसे सिस्टम के हवाले किया गया है…जिसके काम करने के तरीके पर ही सवाल हैं…अगर डेटा गलत तरीके से प्रोसेस हुआ…तो उसका असर सीधे नागरिकों पर पड़ेगा…क्योंकि, तकनीक अपने आप में न अच्छी होती है और न ही बुरी…
सवाल उसके इस्तेमाल का होता है….अगर तकनीक बिना टेस्टिंग, बिना नियम और बिना जवाबदेही के लागू की जाए….तो वो समाधान नहीं, बल्कि समस्या बन जाती है…अब निगाहें चुनाव आयोग पर टिकी हैं…क्या आयोग इस सॉफ्टवेयर की समीक्षा करेगा?…क्या कोई स्पष्ट SOP जारी होगी?……क्या प्रभावित वोटर्स को राहत मिलेगी?….या फिर ये प्रक्रिया चुपचाप आगे बढ़ती रहेगी?
ये सारे सवाल इसलिए उठ रहे हैं…क्योंकि, SIR सॉफ्टवेयर का मामला सिर्फ एक तकनीकी प्रयोग नहीं है…ये भारत के लोकतंत्र, नागरिक अधिकारों और संस्थागत पारदर्शिता की परीक्षा है….अगर समय रहते सवालों के जवाब नहीं दिए गए….तो ये संकट आने वाले चुनावों में एक बड़े विवाद का रूप ले सकता है…..क्योंकि, लोकतंत्र में तकनीक सहायक हो सकती है…लेकिन अंतिम फैसला हमेशा इंसान और कानून को करना चाहिए किसी अदृश्य एल्गोरिदम को नहीं…….
ऐसे में सबसे गंभीर बात ये है कि इन करोड़ों संदिग्धों की जांच कैसे होगी…इसके लिए चुनाव आयोग ने कोई लिखित SOP जारी नहीं किया है…सारा जिम्मा बूथ लेवल अधिकारियों पर छोड़ दिया गया है कि वो अपनी समझ से फैसला करें….पश्चिम बंगाल में संदिग्धों की संख्या अचानक घट गई…लेकिन ये कैसे हुआ इसका कोई ट्रांसपेरेंट रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है…
जानकारों का कहना है कि ये पहली बार है जब बिना किसी मैनुअल जांच के सिर्फ एक अदृश्य एल्गोरिदम के आधार पर करोड़ों नागरिकों के वोटिंग अधिकारों को खतरे में डाल दिया गया है….जहां मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार इसे टेक्निकल उपलब्धि बता रहे हैं…वहीं जमीन पर ये प्रक्रिया लाखों अवैध वोटरों के नाम कटने का डर पैदा कर रही है…..
जिसे लेकर विपक्ष और प्राइवेसी एक्टिविस्ट अब इस सॉफ्टवेयर के ऑडिट और पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता की मांग कर रहे हैं……..ऐसे में अब इस मामले में चुनाव आयोग क्या करता है…..ये तो देखने वाली बात होगी और इस पूरे मामले में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की ओर से क्या सफाई सामने आएगी……ये भी देखना काफी दिलचस्प होगा…….



