राहुल गांधी ने विदेश नीति पर की मोदी की मिमिक्री, भाजपाइयों को लग गई मिर्ची
राहुल गांधी प्रधानमंत्री मोदी की 'गले मिलने वाली' विदेश नीति पर जमकर बरसे। उन्होंने 'रचनात्मक कांग्रेस राष्ट्रीय सम्मेलन' के मंच पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मिमक्री की।

4पीएम न्यूज नेटवर्क: आज के समय में विदेश नीति का क्या स्तर हो गया है ये बात किसी से छुपी तो है नहीं। मोदी जी विदेशी नेताओं के गले ऐसे लगते हैं मानों वर्षों के बिछड़े दोस्त हों लेकिन ये बात सिर्फ वीडियो तक ही सीमित रहती है।
असल में उनके कितने दोस्त हैं और कितना भारत के हित में सोचते हैं ये बात जनता बखूबी समझती है। खैर मोदी के चाटुकार इसे भले ही जस्टिफाई करते हों लेकिन विपक्ष इसका खंडन करते हैं।
वहीं इसी बीच मोदी की विदेश नीति पर राहुल गांधी ने जोरदार हमला बोला है। राहुल गांधी प्रधानमंत्री मोदी की ‘गले मिलने वाली’ विदेश नीति पर जमकर बरसे। उन्होंने ‘रचनात्मक कांग्रेस राष्ट्रीय सम्मेलन’ के मंच पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मिमक्री की। राहुल गांधी मंच पर ही पार्टी नेता संदीप दीक्षित की ओर दौड़कर गए और उन्होंने उन्हें गले लगाया। अपने भाषण के दौरान उन्होंने विदेश नीति, चीन, पाकिस्तान, संसद, छात्र आंदोलन और केंद्र सरकार के कामकाज को लेकर कई सवाल उठाए।
अपने संबोधन में राहुल गांधी ने इस पर हैरानी जताई कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को विदेशी नेताओं से गले मिलने की विदेश नीति का यह विचार कहां से आया। उन्होंने कहा, ‘मुझे समझ नहीं आता कि उन्हें यह ख्याल कहां से आया कि विदेश नीति का मतलब जबरदस्ती गले मिलना है।’ इतना कहने के बाद राहुल गांधी मंच पर मौजूद वरिष्ठ कांग्रेस नेता संदीप दीक्षित की ओर तेजी से दौड़े और उन्हें गले लगा लिया। उनके इस अंदाज को प्रधानमंत्री मोदी के विदेशी नेताओं से गले मिलने की शैली की मिमिक्री के रूप में देखा गया।
वहीं राहुल गांधी ने अपने भाषण में हाल के अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम का ज़िक्र करते हुए कहा कि भारत ने एक बड़ा कूटनीतिक अवसर गंवा दिया है। उन्होंने कहा कि यदि आज इंदिरा गांधी जैसा नेतृत्व होता तो भारत अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभा सकता था।
साथ ही राहुल गांधी ने चीन के साथ सीमा विवाद का मुद्दा उठाते हुए कहा कि चीन ने भारतीय सैनिकों को अपनी ही जमीन पर गश्त करने से रोका, लेकिन सरकार ने इस मामले को दबाने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि गलवान घाटी की घटना के बाद प्रधानमंत्री ने कहा था कि भारत की एक इंच जमीन पर किसी का कब्जा नहीं है, जबकि सेना की स्थिति अलग थी।
अब राहुल गांधी के इस बयान के बाद सियासी गलियारों में चर्चा तेज हो गई है। और भाजपाइयों को राहुल के इस बयान से मिर्ची लग गई है। इस पूरे मामले को लेकर बीजेपी कांग्रेस पर हमलावर है. बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने एक्स पर पोस्ट कर कहा कि आपको लगता है कि राहुल गांधी जी की मानसिक स्थिति ठीक है? उन्होंने आगे कहा कि झारखंड के रांची में कांके इनके लिए ठीक जगह है.
वहीं केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद जोशी ने भी पीएम मोदी पर राहुल गांधी की टिप्पणी पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा, ‘राहुल गांधी में हताशा, निराशा और मायूसी साफ तौर पर देखी जा सकती है. जब परीक्षा का पेपर लीक होने और जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन के मुद्दों पर चर्चा की मांग उठी, तो विपक्ष भाषण सुनने के लिए भी तैयार नहीं था.
लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए प्रधानमंत्री के खिलाफ राहुल गांधी जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल करते हैं, उसे देखिए. विरोधी नेताओं की आलोचना करते समय हमेशा एक बुनियादी शिष्टाचार और सभ्य भाषा का इस्तेमाल किया जाता रहा है, चाहे वह प्रधानमंत्री हों या विपक्ष के नेता. उन्होंने उस शिष्टाचार को पूरी तरह से छोड़ दिया है क्योंकि उनमें इसकी कमी है.”
इसके साथ ही शिवराज सिंह ने भी अपनी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा जिस ढंग से नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी विदेश नीति की बात करते हुए अपने ही दल के नेता को गले लगाते हैं और उसके बाद एक स्वतंत्र एवं संप्रभु राष्ट्र की महिला प्रधानमंत्री के लिए गलत भाषा का प्रयोग होता है, वह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। यह पूरी दुनिया की माताओं-बहनों का अपमान है।
गौरतलब है कि विदेश नीति का मतलब सिर्फ फोटो खिंचवाना, गले मिलना और भाषण देना नहीं होता। इसका मतलब होता है देश की सुरक्षा, व्यापार के फायदे, सीमाओं की रक्षा और वैश्विक मंच पर सम्मान। मोदी जी गले मिलने में माहिर हैं, लेकिन जब चीन सीमा पर दबाव बनाता है तो जवाब कमजोर पड़ता है।
अरुणाचल में चीनी सेना गश्त रोक देती है तो भारत चुप रहता है। पड़ोसी देशों में भारत का प्रभाव घटता दिखता है। नेपाल, श्रीलंका, बांग्लादेश जैसे देशों में चीन की पैठ बढ़ती है, लेकिन मोदी सरकार के पास मजबूत जवाब नहीं।राहुल गांधी ने सही सवाल उठाया है। क्या गले मिलने से चीन लद्दाख से पीछे हट जाएगा?
क्या गले मिलने से पाकिस्तान आतंकवाद रोक देगा? क्या गले मिलने से अमेरिका-ईरान जैसे मुद्दों पर भारत की आवाज सुनी जाएगी? जवाब साफ है—नहीं। मोदी की कूटनीति दिखावे वाली है। विश्व नेताओं से मिलकर तस्वीरें छपवाई जाती हैं, लेकिन वास्तविक फायदा देश को कम मिलता है। व्यापार समझौतों में भारत के किसानों और व्यापारियों के हित पीछे रह जाते हैं। ऊर्जा सुरक्षा, पेट्रोल-डीजल की कीमतें, खाद की उपलब्धता जैसे मुद्दों पर विदेश नीति का असर सीधा पड़ता है, लेकिन सरकार इन पर ध्यान कम देती है।
मोदी सरकार गले मिलने को विदेश नीति बताकर जनता को गुमराह कर रही है। वास्तविकता यह है कि देश की सीमाएँ असुरक्षित हैं, पड़ोसी देशों में प्रभाव घट रहा है और वैश्विक संकटों में भारत की भूमिका कमजोर है।
मोदी सरकार 12 साल से सत्ता में है। इतने लंबे समय में विदेश नीति को मजबूत बनाने का मौका था, लेकिन नतीजा निराशाजनक है। चीन के साथ सीमा विवाद सुलझा नहीं, पाकिस्तान के साथ तनाव बना रहता है, पश्चिम एशिया में भारत की आवाज कमजोर है। गले मिलने से दोस्ती नहीं बनती, ठोस नीति और मजबूत नेतृत्व से बनती है। राहुल गांधी की मिमिक्री ने इस सच्चाई को हल्के अंदाज में लेकिन तीखे तरीके से सामने रख दिया।



