‘सहिया की लड़ाई अब अदालत में, हार नहीं मानूंगा : संजय शर्मा

- कपिल सिब्बल ने फिल्म देखी बोले- तिनका बराबर भी ऐसा कुछ नहीं जिसे रोकने का आधार बने
4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। हार नहीं मानूंगा… काल के कपाट पर नये गीत लिखता जाऊंगा। पूर्व पीएम अटल बिहारी वाजपेयी की यह पंक्ति सिर्फ कविता नहीं है यह उस जिद का ऐलान है कि रास्ते में कितनी ही दीवारें खड़ी हों कितने दरवाजे बंद कर दिए जाएं और कितने ही ताकतवर लोग सामने हो हार नहीं माननी है। सहिया फिल्म के निर्माता निर्देशक संजय शर्मा ने भी हार मानने के बजाय अगली जंग की तैयारी शुरू कर दी है।
फिल्म को सेंसर बोर्ड द्वारा रोके जाने के बाद अब लड़ाई अदालत की चौखट पर होगी और इस लड़ाई में संजय शर्मा की पैरवी देश के जाने माने अधिवक्ता और पूर्व केंद्रीय कानून मंत्री कपिल सिब्बल करेंगे। यानी सहिया की अगली लड़ाई अब सिर्फ एक फिल्म के रिलीज सार्टिफिकेट तक सीमित नहीं रह गयी है। मामला अब उस बड़े सवाल तक पहुंच गया है कि किसी क्रिएटिव फिल्म के रिलीज की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी होनी चाहिए और क्या किसी फिल्म को ऐसे आधार पर रोका जा सकता है जिसे कानून और निर्धारित नियमों की कसौटी पर ठहराया ही न जा सके।
सामने मोगेम्बो हो या फिर बाप जी, डरना नहीं है झुकना नहीं है
फिल्म मेकर संजय शर्मा के सामने रास्ता आसान नहीं है। एक ओर प्रमाणन की प्रक्रिया से जुड़ा विवाद है तो दूसरी ओर अब अदालत का रास्ता खुल रहा है। सामने संस्थागत ताकत है लंबी कानूनी प्रक्रिया है और स्वाभाविक तौर पर वह दबाव भी है जिसके आगे बहुत से लोग बीच रास्ते में कदम पीछे खींच लेते हैं। लेकिन संजय शर्मा ने ऐसा करने के बजाय कानूनी लड़ाई लडऩे का फैसला किया है। उनका रुख साफ है मामला सिर्फ सहिया का नहीं उस अधिकार का भी है जिसके तहत एक निर्माता अपनी बात को नियमों और कानून के दायरे में दर्शकों तक पहुंचा सके। उनका मानना है कि सामने मोगेम्बे हो या बाप जी संजय शर्मा पीछे हटने को तैयार नहीं हैं। उनके लिए यह लड़ाई किसी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा की लड़ाई से कहीं आगे बढ़ चुकी है। सवाल यह है कि अगर किसी फिल्म में आपत्तिजनक सामग्री नहीं है तो उसके प्रमाणन में अड़चन क्यों और किस आधार पर? और अगर आपत्ति है तो उसके पीछे स्पष्ट कानूनी और तथ्यात्मक आधार क्या है?
इसी का जवाब अब अदालत में मांगा जाएगा
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि संजय शर्मा ने इस लड़ाई को भावनाओं या आरोपों तक सीमित रखने के बजाय कानून के रास्ते पर ले जाने का फैसला किया है। देश के वरिष्ठ अधिवक्ता और पूर्व केंद्रीय कानून मंत्री कपिल सिब्बल का फिल्म देखने के बाद यह कहना कि उन्हें इसमें ऐसा कुछ नजर नहीं आया जिसके आधार पर उसे सेंसर किया जाना उचित हो इस पूरे विवाद को एक नया संदर्भ देता है। अब अगला कदम अदालत का है। वहां बहस होगी दस्तावेज सामने आएंगे और तय होगा कि सहिया के प्रमाणन को लेकर उठे सवालों का कानूनी आधार कितना मजबूत है। संजय शर्मा के लिए रास्ता लंबा हो सकता है लेकिन रुख स्पष्ट है कि लड़ाई से पीछे नहीं हटना है। सहिया की अगली लड़ाई अब अदालत में होगी और इस बार फैसला तर्क दस्तावेज और कानून की कसौटी पर मांगा जाएगा। सहिया देखकर कपिल सिब्बल बोले डरने की जरूरत नहीं फिल्म में ऐसा कुछ नहीं जिसे रोका जाए।
- संजय शर्मा — कपिल सिब्बल साहब आपने फिल्म देखी। सबसे पहले आपका शुक्रिया। वक्त निकालकर फिल्म देखी यह मेरे लिए बड़ी बात है।
- कपिल सिब्बल — शुक्रिया की कोई जरूरत नहीं। बहुत दिनों बाद एक उम्दा फिल्म देखने को मिली और अच्छी बात यह कि इसके लिए थिएटर जाने की जरूरत नहीं पड़ी। आपने घर बैठे मुझे एक अच्छी फिल्म देखने का मौका दे दिया।
- संजय शर्मा — कैसी लगी फिल्म?
- कपिल सिब्बल — बहुत अच्छी। मुझे फिल्म काफी पसंद आयी। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मुझे इसमें ऐसी कोई चीज दिखाई नहीं दी जो फिल्म के प्रमाणन में रुकावट का आधार बन सके।
- संजय शर्मा — मैं सच कहूं तो फिल्म बनाते समय मुझे अंदाजा नहीं था कि इसे लेकर इतना विवाद खड़ा हो सकता है। आप फिल्म देखते हुए क्या सोच रहे थे?
- कपिल सिब्बल — मैं फिल्म देख रहा था और यही सोच रहा था कि आखिर इसमें ऐसा क्या है जिसे लेकर किसी को डर हो सकता है। फिल्म अपनी बात कहती है कहानी कहती है भावनाएं सामने रखती है। लेकिन ऐसा कुछ नजर नहीं आया जिसे देखकर यह कहा जाए कि इसे रोकना जरूरी है।
- संजय शर्मा — आप खुद भी गानों से जुड़े रहे हैं। गीत लिखे हैं संगीत और फिल्म इंडस्ट्री से आपका पुराना रिश्ता रहा है। समीर अंजान साहब ने मुझे बताया कि आज गीतकारों और संगीत से जुड़े लोगों को अपने अधिकारों का लाभ मिल रहा है तो उसके पीछे आपकी कोशिशों का भी योगदान है। आपने इस संबंध में संसद में कोई विधेयक भी लाया था?
- कपिल सिब्बल — हां फिल्म और संगीत उद्योग से जुड़े लोगों के अधिकारों को लेकर संसद में विधायी पहल हुई थी। इंडस्ट्री बहुत बड़ी है लेकिन इसके पीछे काम करने वाले गीतकार संगीतकार और दूसरे रचनात्मक लोग भी अपने अधिकारों के हकदार हैं। रचनाकार को उसका अधिकार मिलना चाहिए।
- संजय शर्मा — लेकिन आज सबसे बड़ी समस्या यही है कि रचनाकार अपनी बात लेकर कहां जाए? फिल्म की स्क्रीनिंग से पहले फोन रखवा लिए जाते हैं। निर्माता को इस तरह माहौल में फिल्म दिखाई जाती है जैसे वह कोई अपराध करने आया हो। मेरे साथ भी ऐसी स्थिति बनी। यहां तक कहा गया कि अगर यही फिल्म उत्तर प्रदेश में बनायी गई होती तो कोई समस्या नहीं होती। आखिर ऐसी बात क्यों कही जाती है?
- कपिल सिब्बल — आपको डरने की जरूरत नहीं है। फिल्म मैंने देखी है। मुझे इसमें ऐसा कुछ नहीं लगा जिसे लेकर आपको भयभीत होने की जरूरत हो। अगर कोई सवाल है तो उसका जवाब कानून के दायरे में होना चाहिए।
- संजय शर्मा — अभिव्यक्ति को रोका जा रहा है?
- कपिल सिब्बल — बीजेपी के शासन में ऐसा बहुत हो रहा है बहुत शिकायते सुनने को मिल रही है । लेकिन अच्छी बात यह है कि काकरोचों ने अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया है इस देश का युवा इस बात को समझ चुका है देश का महौल बदलेगा।
निर्माता पक्ष का सबसे बड़ा सवाल इसी आदेश पर है
उनका कहना है कि अगर फिल्म इतनी गंभीर संवैधानिक सीमाओं का उल्लंघन करती है तो बोर्ड को यह स्पष्ट करना चाहिए कि कौन सा दृश्य, कौन सा संवाद और फिल्म का कौन सा हिस्सा ऐसा करता है। कानूनी तैयारी में भी यही एक प्रमुख मुद्दा है कि बोर्ड के आदेश में किसी विशिष्ट दृश्य, संवाद, विजुअल या टाइम-कोड को उन गंभीर निष्कर्षों से स्पष्ट रूप से नहीं जोड़ा गया।
पहले पूरी फिल्म ही कर दी गई थी खारिज
‘सहियाÓ को लेकर विवाद तब शुरू हुआ जब सेंसर बोर्ड की रिवाइजिंग कमेटी ने 27 अगस्त 26 को फिल्म को प्रमाणपत्र देने से इनकार कर दिया। बोर्ड के आदेश में प्रमाणन दिशानिर्देशों के गंभीर प्रावधानों का उल्लेख किया गया। बोर्ड ने आशंका जताई कि फिल्म का कथानक सशस्त्र विद्रोह को महिमामंडित या रोमांटिक कर सकता है, राज्य और सुरक्षा एजेंसियों के प्रति असंतोष पैदा कर सकता है और आदिवासी समुदाय को राज्य-विरोधी रूप में प्रस्तुत कर सकता है।
23 अगस्त को अंतिम प्रत्यावेदन, उसके बाद भी इंतजार
अब एक और बड़ा सवाल सेंसर बोर्ड की प्रक्रिया और देरी को लेकर खड़ा हो गया है। फिल्म देखने के बाद 23 अगस्त को अंतिम प्रत्यावेदन सेंसर बोर्ड के समक्ष दिया गया। निर्माता पक्ष का कहना है कि लागू प्रक्रिया के अनुसार इस प्रत्यावेदन पर पांच दिन के भीतर विचार कर अपना मत दिया जाना चाहिए था। लेकिन 23 अगस्त के बाद आज 14 सितंबर तक 22 दिन गुजर चुके हैं। अगर पांच दिन की अपेक्षित समय-सीमा पूरी होने के बाद की देरी को देखें तो भी करीब 17-18 दिन अतिरिक्त गुजर चुके हैं। निर्माता पक्ष का आरोप है कि इतने समय बाद भी सेंसर बोर्ड की तरफ से यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि फिल्म को पुन: देखा गया है या नहीं, अंतिम प्रत्यावेदन पर क्या विचार हुआ और आगे बोर्ड का निर्णय क्या है। यानी सवाल अब सिर्फ फिल्म को रोकने का नहीं है, बल्कि उस प्रक्रिया का भी है जिसके जरिए एक फिल्म निर्माता को अपने काम पर अंतिम निर्णय पाने का अधिकार मिलता है। संबधित खबर पेज 8 पर




