रुचिका विवाद पर सौरव दास का बयान, बोले- लोग चलते-फिरते गाली देते हैं
सीजेपी प्रवक्ता सौरव दास ने रुचिका सिंह का बचाव करते हुए पीएम मोदी पर की गई टिप्पणी को लेकर पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठाए हैं. उन्होंने कहा कि इस देश में गाली देना, कबसे अपराध हो गया.

4पीएम न्यूज नेटवर्क: सीजेपी प्रवक्ता सौरव दास ने रुचिका सिंह का बचाव करते हुए पीएम मोदी पर की गई टिप्पणी को लेकर पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठाए हैं. उन्होंने कहा कि इस देश में गाली देना, कबसे अपराध हो गया. यहां लोग चलते-फिरते गाली देते हैं. उन्होंने कहा कि देश के सांसदों पर गंभीर अपराध के आरोप लगे हैं, उनपर सरकार कुछ क्यों नहीं करती है?
सीजेपी प्रवक्ता सौरव दास ने रुचिका सिंह के पीएम मोदी पर अभद्र टिप्पणी करने को लेकर उनका बचाव किया. सौरव ने कहा कि अगर प्रोटेस्ट में किसी ने गाली दी है तो आप उसकी एक तरीके से निंदा कर सकते हो, लेकिन ऐसे करके आप क्रिमिनल मशीनरी का इस्तेमाल करेंगे. उन्हें पुलिस के द्वारा टार्गेट करेंगे, तो ये बिल्कुल भी सही बात नहीं है. सौरव ने सवाल पूछा कि इस देश में गाली देना कबसे क्रिमिनल ऑफेंस बन चुका है? लोग चलते-फिरते यहां पर गाली देते हैं.
सौरव ने लोकसभा सांसदों का जिक्र करते हुए कहा कि जितने लोग संसद के सदस्य हैं उन्हें से 50 प्रतिशत पर तो आपराधिक चार्ज लगे हुए हैं और ये गंभीर मामलों पर लगाए गए हैं, इन सभी विषयों पर तो आप कुछ नहीं कर रहे हैं.सौरव ने कहा कि किसी ने गाली दे दी और आप उन्हें ऐसे टार्गेट करेंगे तो इसकी कड़ी आलोचना की जानी चाहिए.
पुलिस का दुरुपयोग बंद करें’
सौरव ने सरकार और पुलिस से अपील की है कि वो छात्रों के परेशान करना बंद कर दें और ये जो लड़की है आप उसको भी अकेले छोड़ दें. इस तरह के मामलों में पुलिस का दुरुपयोग करना बिल्कुल भी स्वीकार करने योग्य नहीं है.
रुचिका सिंह ने 23 जुलाई को जंतर-मंतर पर आपत्तिजनक टिप्पणी की थी और बुधवार को इस संबंध में शिकायत दर्ज कराई गई. शिकायतकर्ता का कहना है कि उनकी टिप्पणियों से प्रधानमंत्री कार्यालय की गरिमा को ठेस पहुंची और इससे अशांति फैल सकती है तथा सार्वजनिक शांति भंग हो सकती है.
नोएडा के एक्सप्रेसवे पुलिस स्टेशन में एक ‘जीरो FIR’ (जो किसी भी पुलिस स्टेशन में दर्ज की जा सकती है, चाहे अपराध कहीं भी हुआ हो) दर्ज की गई. ये FIR शांति भंग करने के लिए उकसाने, सार्वजनिक अशांति फैलाने वाले बयान देने और मानहानि से संबंधित धाराओं [भारतीय न्याय संहिता की धारा 352, 353(1) और 356(1)] के तहत दर्ज की गई.



