SC की सख्त टिप्पणी, कहा- हर धार्मिक रिवाज कोर्ट में नहीं लाया जा सकता

कोर्ट ने कहा कि हर धार्मिक रीति-रिवाज को अदालत में चुनौती देने से मुकदमों की झड़ी लग जाएगी,

4पीएम न्यूज नेटवर्क: सुप्रीम कोर्ट ने धर्म से जुड़ी याचिकाओं पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है. कोर्ट ने कहा कि हर धार्मिक रीति-रिवाज को अदालत में चुनौती देने से मुकदमों की झड़ी लग जाएगी,

जिससे देश के धर्म और सभ्यता की बुनियाद को खतरा हो सकता है. कोर्ट ने जोर दिया कि धार्मिक रिवाजों में बदलाव समाज के भीतर से आना चाहिए, न कि अत्यधिक न्यायिक हस्तक्षेप से. यह टिप्पणी सबरीमाला मामले की सुनवाई के दौरान आई.

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को धर्म से जुड़ी याचिकाओं को लेकर एक अहम टिप्पणी की है. कोर्ट ने कहा कि अगर हर धार्मिक रीति-रिवाज को अदालत में चुनौती दी जाने लगेगी, तो मुकदमों की कभी न खत्म होने वाली झड़ी लग जाएगी. इससे देश के धर्म और सभ्यता की बुनियाद को खतरा पैदा हो सकता है. यह बात मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुवाई वाली नौ न्यायाधीशों की बेंच ने कही है. बेंच सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश और धार्मिक आज़ादी (अनुच्छेद 25 व 26) से जुड़े मामलों की सुनवाई कर रही थी.

जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि भारतीय समाज और संस्कृति में धर्म का गहरा असर है. अगर अदालतें बहुत ज़्यादा दखल देंगी, तो हर छोटे-बड़े रिवाज के खिलाफ याचिकाएं आने लगेंगी. जस्टिस सुंदरेश ने यह भी पूछा कि अदालतें इतने विविधताओं वाले देश में कितना हस्तक्षेप करें?

सुधार समाज के भीतर से आना चाहिए

कोर्ट ने कहा कि धार्मिक रिवाजों में बदलाव सबसे पहले उसी धर्म के लोगों के भीतर से आना चाहिए. जस्टिस नागरत्ना ने यह भी कहा कि भारत की संस्कृति उसकी सहनशीलता (बहुलवाद) पर टिकी है. अदालत के लिए यह तय करना मुश्किल है कि धार्मिक प्रथाओं की जांच कहां तक की जाए.

इस बेंच की अध्यक्षता भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत कर रहे थे, जिसमें न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना, एम.एम. सुंदरेश, अहसानुद्दीन अमनुल्लाह, अरविंद कुमार, ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, प्रसन्ना बी. वराले, आर. महादेवन और जॉयमाल्य बागची शामिल थे.

हर इंसान के अधिकार बराबर

कोर्ट में पेश हुए वरिष्ठ वकील जयदीप गुप्ता ने कहा कि संविधान में हर इंसान के अधिकार सबसे ऊपर हैं. जस्टिस बागची ने कहा कि संविधान किसी एक इंसान की अंतरात्मा को दूसरे से ऊपर नहीं मानता. वहीं याचिकाकर्ता का तर्क था कि सिर्फ पुरानी परंपरा के नाम पर उन रिवाजों को नहीं चलने दिया जा सकता, जो संविधान के खिलाफ हों.

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