वनवासी नहीं, हम मूलनिवासी..! शाह के बयान पर भड़का आदिवासी समाज, पुतला फूंका
गृह मंत्री अमित शाह के वनवासी बयान पर देशभर में विवाद तेज हो गया है... आदिवासी कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने विरोध प्रदर्शन करते हुए पुतला फूंका...

4पीएम न्यूज नेटवर्कः देश के गृह मंत्री अमित शाह द्वारा आदिवासी समुदाय को वनवासी कहने पर पूरे देश में विरोध की लहर दौड़ गई है.. गुजरात के छोटाउदेपुर जिले में आदिवासी कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने इस बयान का पुरजोर विरोध किया.. कार्यकर्ताओं ने अमित शाह का पुतला जलाकर प्रदर्शन किया.. और नारे लगाए वनवासी नहीं, स्वदेशी हमारी पहचान है.. आदिवासी मूलनिवासी हैं, वनवासी नहीं.. जानकारी के मुताबिक यह घटना दिल्ली में बिरसा मुंडा की जयंती पर आयोजित जनजातीय महाकुंभ के दौरान हुई.. अमित शाह ने वहां आदिवासियों को बार-बार वनवासी संबोधित किया.. इस पर आदिवासी समाज में आक्रोश फैल गया.. छोटाउदयपुर जैसे आदिवासी बहुल इलाकों में यह आक्रोश सड़कों पर उतर आया..
दिल्ली के लाल किला मैदान के पास बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती पर एक बड़ा कार्यक्रम आयोजित किया गया.. हजारों आदिवासी वहां इकट्ठा हुए.. गृह मंत्री अमित शाह ने इस कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि आदिवासी समाज सनातन परंपरा का अभिन्न अंग है.. उन्होंने अपनी पूरी स्पीच में वनवासी शब्द का इस्तेमाल किया.. एक बार भी आदिवासी शब्द नहीं बोला.. आदिवासी नेता और कार्यकर्ता इस बात से नाराज हो गए.. उनका कहना है कि वनवासी शब्द उन्हें जंगलों तक सीमित कर देता है.. इससे उनकी पहचान, इतिहास और सम्मान को ठेस पहुंचती है.. वे खुद को भारत के मूलनिवासी मानते हैं.. न कि सिर्फ जंगलों में रहने वाले..
छोटाउदयपुर गुजरात का एक महत्वपूर्ण आदिवासी क्षेत्र है.. यहां राठवा, भील और अन्य जनजातीय समुदाय बड़ी संख्या में रहते हैं.. जब अमित शाह के बयान की खबर पहुंची तो स्थानीय आदिवासी कांग्रेस ने तुरंत एक्शन लिया.. कार्यकर्ता सुबह से ही इकट्ठा होने लगे.. दोपहर तक सैकड़ों की संख्या में लोग मुख्य बाजार और तहसील क्षेत्र में पहुंच गए.. और उन्होंने अमित शाह का बड़ा पुतला बनाया.. पुतले पर काला कोट और टोपी पहनाई गई.. फिर नारेबाजी शुरू हुई..
आदिवासी कांग्रेस के स्थानीय नेताओं ने भाषण दिए.. हम हजारों साल से इस देश की मिट्टी से जुड़े हैं.. हम जंगलों के नहीं, इस पूरे राष्ट्र के मूल निवासी हैं.. वनवासी कहकर हमें छोटा करके दिखाया जा रहा है.. यह स्वीकार नहीं है.. प्रदर्शनकारियों ने पुतला जलाया.. पुलिस ने स्थिति नियंत्रण में रखने की कोशिश की.. कुछ जगहों पर हल्की धक्का-मुक्की भी हुई.. लेकिन कोई बड़ी घटना नहीं घटी.. प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहा..
आपको बता दें कि यह विवाद नया नहीं है.. लंबे समय से आदिवासी और वनवासी शब्दों पर बहस चल रही है.. आदिवासी शब्द का मतलब है.. आदि मतलब पहले और वासी मतलब रहने वाले.. यानी भारत के सबसे पहले रहने वाले लोग.. ये समुदाय खुद को देश के मूल निवासी मानते हैं.. उनकी अपनी भाषाएं, संस्कृति, परंपराएं, त्योहार और जीवनशैली है.. जो हजारों साल पुरानी है.. वनवासी शब्द का मतलब है.. जंगलों में रहने वाले.. यह शब्द उन्हें सिर्फ जंगलों तक सीमित कर देता है.. आदिवासी नेता कहते हैं कि इससे उनकी व्यापक पहचान मिट जाती है.. जैसे-जैसे जंगल कम होंगे, उनकी पहचान भी खत्म हो जाएगी..
आरएसएस और भाजपा से जुड़े संगठन लंबे समय से वनवासी शब्द का इस्तेमाल करते रहे हैं.. उनका तर्क है कि आदिवासी शब्द से लगता है कि बाकी भारतीय बाहर से आए हैं.. जबकि वे मानते हैं कि सभी भारतीय इस भूमि के मूल निवासी हैं.. कांग्रेस और आदिवासी संगठन इसे राजनीतिक साजिश मानते हैं.. उनका कहना है कि वनवासी कहकर आदिवासियों की अलग पहचान को कमजोर किया जा रहा है.. उन्हें हिंदू संस्कृति में विलीन करने की कोशिश की जा रही है..
सरकार को आदिवासी शब्द का इस्तेमाल करना चाहिए.. आदिवासी इलाकों में भूमि हड़पने और खनन कंपनियों के खिलाफ सख्ती हो.. आदिवासी क्षेत्रों में स्कूल, अस्पताल और रोजगार की बेहतर सुविधाएं दी जाएं.. उनकी भाषाओं, परंपराओं और त्योहारों को बचाया जाए.. अमित शाह और सरकार आदिवासी समाज से सार्वजनिक माफी मांगें..
राष्ट्रीय आदिवासी कांग्रेस के अध्यक्ष डॉ. विक्रांत भूरिया जैसे नेताओं ने पूरे देश में इस मुद्दे पर प्रदर्शन का आह्वान किया.. छोटाउदयपुर का प्रदर्शन उसी का एक हिस्सा था.. आदिवासी समुदाय भारत की आबादी का करीब 8.6% है.. यानी लगभग 12 करोड़ लोग.. वे मुख्य रूप से मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, गुजरात, राजस्थान.. और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में रहते हैं.. उनकी जिंदगी प्रकृति से जुड़ी हुई है.. वे जंगल, नदियां और पहाड़ों की पूजा करते हैं.. उनकी कहानियां, गीत, नृत्य और कला बेहद समृद्ध हैं.. बिरसा मुंडा, तिलका मांझी और रानी दुर्गावती जैसे महानायक उनके गर्व हैं..
वहीं आधुनिक विकास ने उन्हें कई चुनौतियां दी हैं.. जंगल कम हो रहे हैं, खनन कंपनियां जमीन ले रही हैं.. युवा रोजगार की तलाश में शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं.. फिर भी वे अपनी पहचान से मजबूती से जुड़े हुए हैं.. कांग्रेस ने इस मुद्दे को भाजपा सरकार के खिलाफ उठाया है.. उनका कहना है कि भाजपा आदिवासियों की भावनाओं को ठेस पहुंचा रही है.. भाजपा का पक्ष है कि वे आदिवासियों के विकास के लिए काम कर रहे हैं.. पीएम मोदी ने भी आदिवासी कल्याण से जुड़ी कई योजनाएं शुरू की हैं.. वनवासी कल्याण आश्रम जैसे संगठन लंबे समय से आदिवासी क्षेत्रों में काम कर रहे हैं..



