शंकराचार्य और यूजीसी विवाद भाजपा को करेगा बर्बाद !

- शंकराचार्य कौन, वाइस-चांसलर कौन, तय करेगा कौन?
- गरमाई राजनीति : बीजेपी के लिए एक तरफ कुंआ दूसरी तरफ खाई वाली हालत
- यूजीसी का विरोध चरम पर, शंकराचार्य के समर्थन में इस्तीफा
4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। धर्म हो या शिक्षा दोनों की ताकत हमेशा से ही उनकी स्वतंत्रता रही है। लेकिन आज के इस हाइटेक दौर में धर्म और शिक्षा दोनों को ही कंट्रोल किये जाने के आरोप अब पब्लिक डोमेन से लगने शुरू हो गये हैं। ताजा उदहारण स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और यूजीसी विवाद के तौर पर सामाने आया है। विवाद के बाद सवाल यह नहीं रहे कि नियम क्या कहते हैं सवाल यह उठना शुरू हो गये हैं कि नियम कौन लिख रहा है? और किस मकसद से नियम लिखे जा रहे हैं? जब एक संत को प्रशासनिक नोटिस के जरिए उसकी पहचान समझाई जाए और जब एक प्रोफेसर को अध्यादेश के जरिए उसकी हैसियत बताई जाए तब यह सिर्फ़ विवाद नहीं रहता यह सत्ता के स्वभाव का बयान बन जाता है।
एक तरफ कुआं दूसरी तरफ खाई
भारतीय जनता पार्टी इस वक्त ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहां आगे कदम बढ़ाना भी जोखिम है और पीछे हटना भी। एक तरफ यूजीसी अध्यादेश को लेकर सवर्ण असंतोष सुलग रहा है तो दूसरी तरफ स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद विवाद ने उस वैचारिक जमीन को हिला दिया है जिसे बीजेपी अपनी सबसे सुरक्षित शरणस्थली मानती रही है। धर्म और परंपरा यही वह स्थिति है जिसे राजनीति की भाषा में कहा जाता है कि एक तरफ कुआं दूसरी तरफ खाई।
विपक्ष की बल्ले-बल्ले
विपक्ष के लिए यह विवाद किसी आंदोलन से कम नहीं। कांग्रेस और अन्य दल खुलकर सवर्ण असंतोष को हवा भी नहीं दे सकते और संत समाज के नाम पर राजनीति भी सावधानी से करनी पड़ती है लेकिन वह एक बात बारबार दोहरा रहे हैं कि यह सरकार हर संस्था को अपने हिसाब से ढालना चाहती है। यह नैरेटिव अगर टिक गया तो यह चुनावी नहीं बल्कि दीर्घकालिक वैचारिक नुकसान होगा। विपक्ष जानता है कि बीजेपी को हराने का रास्ता सीधे वोट से नहीं बल्कि भरोसे में सेंध से निकलता है।
नाटकीय घटनाक्रम में अधिकारी का इस्तीफा
एक नाटकीय घटनाक्रम में बरेली नगर मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने नए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के नियमों के तहत पूजनीय संतों के साथ किए जा रहे व्यवहार और कथित तौर पर उच्च जातियों के साथ भेदभाव को लेकर चिंता व्यक्त करते हुए अपने पद से इस्तीफा दे दिया अग्निहोत्री ने उत्तर प्रदेश के राज्यपाल को अपना इस्तीफा सौंपते हुए कहा है कि उनका यह निर्णय किसी व्यक्तिगत या व्यावसायिक स्वार्थ के बजाय आत्मसम्मान, अंतरात्मा और समाज के प्रति जवाबदेही पर आधारित है। अपने इस्तीफे पत्र में उन्होंने प्रयागराज माघ मेले में हुई घटना की कड़ी निंदा की है जहां मौनी अमावस्या पर पवित्र स्नान के लिए संगम में प्रवेश को लेकर विरोध प्रदर्शन कर रहे ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के शिष्यों के साथ कथित तौर पर मारपीट की गई और उन्हें बालों से घसीटा गया। इस कृत्य को ब्राह्मणों और संतों का घोर अपमान बताते हुए अग्निहोत्री ने सवाल उठाया कि क्या प्रशासन मौन रूप से उत्पीडऩ का समर्थन कर रहा है। उन्होंने पत्र में भी कड़े शब्दों का प्रयोग किया जिसे उन्होंने लक्षित उत्पीडऩ और भेदभाव करार दिया। उन्होंने इस घटना को मानवता पर कलंक बताया। इस विवाद को व्यापक शिकायतों से जोड़ते हुए अग्निहोत्री ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने संबंधी विनियम 2026 की आलोचना की।
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का मामला
दूसरी तरफ स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का मामला है। यहां सवाल धर्म का नहीं बल्कि धर्म पर नियंत्रण का बनता जा रहा है। शंकराचार्य परंपरा जैसी संस्था में प्रशासनिक हस्तक्षेप की आहट ने साधु संत समाज को असहज किया है। बीजेपी की राजनीति का बड़ा आधार यह विश्वास रहा है कि वह धर्म की रक्षक है लेकिन जब वही सत्ता यह तय करती दिखे कि कौन वैध धार्मिक प्रतिनिधि है और कौन नहीं तो समर्थन की जगह संदेह जन्म लेता है। यह वही क्षेत्र है जहां बीजेपी आमतौर पर निहत्थी नहीं उतरती लेकिन इस बार तलवार दोधारी साबित हो रही है। इन दोनों विवादों को जोडऩे वाली डोर साफ है। संस्थाओं की स्वायत्तता बनाम सत्ता का नियंत्रण। फर्क बस इतना है कि एक में संस्था विश्वविद्यालय है दूसरी में धर्मपीठ। और दोनों ही मामलों में बीजेपी पर आरोप यह बन रहा है कि वह व्यवस्थापक नहीं नियंता की भूमिका में दिख रही है। यही वह बिंदु है जहां विपक्ष को मौका मिलता है।
कुंद हो सकती है वैचारिक धार
यूजीसी अध्यादेश पर विरोध सिर्फ नीति का नहीं है यह सामाजिक शक्ति संतुलन का विरोध है। उच्च शिक्षा में नियुक्ति, प्रमोशन और नियंत्रण को लेकर जो संकेत इस अध्यादेश से मिलते हैं उन्होंने सवर्ण तबके को बेचैन कर दिया है। यह वही तबका है जो दशकों से विश्वविद्यालयों अकादमिक परिषदों और बौद्धिक मंचों पर अपनी निर्णायक मौजूदगी बनाए हुए था। बीजेपी जानती है कि यह वर्ग वैचारिक रूप से उसका समर्थक है लेकिन यही वर्ग जब असंतोष में जाता है तो शोर भी करता है और नैरेटिव भी गढ़ता है। खतरा यही है वोट भले न टूटे लेकिन वैचारिक धार कुंद हो सकती है।
केशव मौर्य के तीखे बयान, संत के चरणों में प्रणाम
यूपी के डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य ने एक बार फिर तीखे बयान देकर सियासी और धार्मिक हलकों में हलचल बढ़ा दी है। केशव मौर्य ने साफ शब्दों में कहा कि वह शंकराचार्यों का सम्मान करते हैं लेकिन कुछ लोग इस मुद्दे का राजनीतिक फायदा उठाने की कोशिश कर रहे हैं। डिप्टी सीएम ने कहा मैं तो बस उनके चरणों में प्रणाम करता हूं। उन्होंने शंकराचार्य को लेकर चल रहे विवाद पर दो टूक कहा कि ऐसे लोगों को किसी भी तरह का राजनीतिक लाभ मिलने वाला नहीं है।
बीजेपी में खींचतान शुरू
इसी दबाव के बीच बीजेपी के भीतर की खींचतान भी सतह पर आ गई है। उत्तर प्रदेश में केशव प्रसाद मौर्य का मोर्चा संभालना सिर्फ़ संगठनात्मक सक्रियता नहीं है यह एक संकेत है कि पार्टी के भीतर सब कुछ एकसुर में नहीं चल रहा। बीजेपी अपने सामाजिक संतुलन को नए सिरे से साधने की कोशिश कर रही है। लेकिन यही कोशिश सवर्ण नेतृत्व को और असहज करती है। अंदरखाने टकराव का यह स्तर भले सार्वजनिक बयानबाज़ी में न दिखे लेकिन रणनीति की हर परत में मौजूद है। हकीकत यह है कि बीजेपी इस वक्त जिस संकट से जूझ रही है वह विरोध का नहीं विश्वास के पुनर्संतुलन का संकट है। सवर्ण, पिछड़ा, संत समाज सब अलग अलग कारणों से सवाल पूछ रहे हैं।




